अब सत्ता परिवर्तन का कोईबहुत व्यापक अर्थ नहीं है
मेरी आंखें काहिरा के तहरीर चौक की तसवीरें देख रहीं थीं। लेकिन कानों में इकबाल बानो की अद्भुत आवाज गूंज रही थी- हम देखेंगे.../लाजिम है कि हम भी देखेंगे/वो दिन कि जिसका वादा है/जो लौह-ए-अजल में लिखा है।
एक क्षण के लिए मन अटका। क्या वाकई जिस दिन का वायदा था, वह दिन लौह-ए-अजल में लिखा है? क्रांति इस दुनिया का शाश्वत नियम है? काहिरा के जास्मिन रेवोल्यूशन ने यह सवाल पूछने पर मजबूर किया है।
बेशक काहिरा से इस्कंदरिया तक जनता जनार्दन का उभार क्रांति के पुराने सपने को जगाता है। पाकिस्तान के क्रांतिकारी कवि फैज अहमद फैज की यह मशहूर गजल हमारे उपमहाद्वीप में ही नहीं, पूरी दुनिया में तानाशाही के जुल्म-ओ-सितम के खिलाफ लड़ने वालों के लिए प्रेरणा गीत बन चुकी है। शायद लोकतंत्र की कीमत भारत से ज्यादा पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल के लोग समझते हैं। जाहिर है, उन्होंने तानाशाही झेली है। हुस्नी मुबारक के सत्ता छोड़कर भाग जाने पर काहिरा में किसी न किसी के होंठ पर तो फैज के बोल आए होंगे-जब जुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां/रुई की तरह उड़ जाएंगे।
मन फिर पहाड़ और रुई के इस रूपक पर अटकता है। कौन नहीं जानता कि मुबारक की तानाशाही के सिर पर दुनिया भर को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने वाले अमेरिका और उसके यूरोपीय दुमछल्लों का वरदहस्त था। तानाशाह के रुखसत होने पर इस्राइल की चिंता और फलस्तीनियों का उल्लास मिस्र, इस्राइल और अमेरिका के हुक्मरानों के नापाक रिश्तों का खुलासा करता है। अगर आप पिछले दस दिन से तेल के दाम का खेल देख रहे हों, तो समझ जाएंगे कि धरती के नीचे खनिज होना धरती पर रहने वाले मनुष्यों के लिए अभिशाप हो सकता है। पहले टूनीशिया, और फिर मिस्र में जो हुआ, उसे पहाड़ के रुई की तरह उड़ जाने के बजाय कठपुतली के धागे कटने की संज्ञा देना बेहतर होगा। अरब जगत में अमेरिका की नाक के बाल हुस्नी मुबारक अब उसकी आंख की किरकिरी बन गए थे।
विचार शृंखला फिर टूटती है। गजल अपने चरम पर पहुंच गई है : सब ताज उछाले जाएंगे/सब तख्त गिराए जाएंगे।
यह रिकॉर्डिंग लाहौर की है। उस वक्त की, जब पाकिस्तान जिया-उल-हक की तानाशाही तले पिस रहा था। गजल के इस मोड़ पर श्रोताओं की भावनाओं का विस्फोट होता है। इकबाल बानो की आवाज तालियों की गड़गड़ाहट और तानाशाह-विरोधी नारों में डूब जाती है। एक क्षण के लिए भय का साम्राज्य ढह जाता है। ठीक वैसे ही, जैसे तहरीर चौक पर पहले दिन महज दो सौ बहादुर लोगों के खड़े होने से हुआ था। ताज उछलते और तख्त गिरते देखकर मन फिर फैज के कलाम के साथ बह निकलता है-जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से/सब बुत उठवाए जाएंगे/हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम/मसनद पे बिठाए जाएंगे।
लेकिन तभी राजनीति की हकीकत कविता को विराम देती है। टूनीशिया में तख्त तो पलटा, लेकिन मसनद पर बहिष्कृत समाज नहीं बैठा। पुराने सत्ताधीशों का एक और गुट फिर सिंहासन पर काबिज हो गया। मिस्र में अंतत: क्या होगा, यह नहीं कहा जा सकता। लेकिन फिलहाल तो मसनद पर वही बैठे हैं, जिनके हाथ में बंदूक है, जो कल भी बंदूक के मालिक थे। मुबारक भले ही उठा दिए गए हों, सच के मंदिर से झूठ के पुतले उठने की कोई सूरत दिखाई नहीं देती। अगर क्रांति की चिनगारी जल्द ही बुझ न गई, तो संभव है कि सत्ता का हस्तांतरण फौज के हाथों से चुनी हुई सरकार के पास आ जाएगा। लेकिन मिस्र के शासक जिस अंतरराष्ट्रीय निजाम के हाथ में मोहरा हैं, वह नहीं बदलेगा। तेल, पूंजी और सत्ता का रिश्ता नहीं टूटेगा।
मेरी भटकन से बेखबर इकबाल बानो आगे बढ़ती जा रही थीं- और राज करेगी खुल्क-ए-खुदा/जो मैं भी हूं और तुम भी हो।
लेकिन अब फैज की कलम से बुना यह सपना हकीकत को और भी मैला किए दे रहा था। क्रांति के आधुनिक विचार का जन्म 18वीं सदी में फ्रांस की राज्यक्रांति से हुआ। 19वीं सदी के आते-आते यह संयोग एक सपना बन गया। क्रांति सिर्फ तख्ता पलट के बजाय सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन का पर्याय बन गई। 20वीं सदी में इस सपने को हकीकत के धरातल पर उतारने की अनेक कोशिशें हुईं। रूस, चीन और ईरान की क्रांतियों की चर्चा किए बिना 20वीं सदी का इतिहास नहीं लिखा जा सकता। इन क्रांतियों ने शासक वर्ग का चेहरा बदला, समाज और अर्थनीति में दूरगामी बदलाव किए। लेकिन ये प्रयोग 19वीं सदी के सपने से दूर ही रुक गए। क्रांतियां तो हुईं, लेकिन जिन लोगों और विचारों के नाम पर ये क्रांतियां हुई थीं, वे जल्द ही हाशिये पर चले गए।
21वीं सदी आते-आते क्रांति का संकल्प थक चुका था। यह हसीन सपना एक चालू मुहावरे में बदल चुका था। दुनिया भर में नाना किस्म की क्रांतियों की बात चल निकली। एक बार फिर क्रांति शब्द का अर्थ सिमटकर तख्ता पलट हो गया। पूर्व सोवियत संघ के देशों में मखमली क्रांति, फिर यूक्रेन में नारंगी क्रांति, और अब मिस्र में बेला-चमेली क्रांति। जैसे-जैसे क्रांति के विचार पर रंग और रूप मढ़े जाने लगे, वैसे-वैसे क्रांति का विचार फीका और गंधहीन होने लगा।
इकबाल बानो की आवाज थम गई थी। सामने अखबार पड़ा था। मुखपृष्ठ पर एक आंदोलनकारी की छवि थी, जो फौजी अफसर को गले लगा रहा था। अचानक छवि तरल हो गई और एक प्रश्नचिह्न बनकर तैरने लगी। क्या 21वीं सदी में क्रांति के विचार का पुनर्जन्म होगा? हम देखेंगे?
मिस्र में मुबारक भले हट गए हैं, पर वहां के शासक जिस अंतरराष्ट्रीय निजाम के मोहरा रहे हैं, वह नहीं बदलेगा।
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