संभव है कि मिस्र में जो हो, उसका असर पूरे अरब जगत पर पड़े। जब एक करोड़ की आबादी वाले ट्यूनीशिया के जन विद्रोह ने मिस्र से लेकर जॉर्डन, यमन आदि तक में हलचल मचा दी है, तो मिस्र से आगे बढ़ी लहर का क्या असर होगा, इसका अंदाजा कौन लगा सकता है? अगर मिस्र में जन आकांक्षाओं की ऐसी मजबूत लहरें उठ सकती हैं, तो क्या सऊदी अरब और मोरक्को जैसे अमेरिकी हितों के अड्डों को पूरी तरह सुरक्षित माना जा सकता है
मिस्र के विदेश मंत्री का टेलीविजन पर आकर ओबामा प्रशासन पर बरसने का संदेश साफ है कि अमेरिका ने मिस्र के अपने आसामी शासक पर से अपनी छतछ्राया हटा ली है। मिस्री विदेश मंत्री अबुल घेइत ने एक इंटरव्यू में आरोप लगाया कि अमेरिका ‘एक महान देश’ पर अपनी मर्जी ‘थोपना’ चाहता है। उसके पहले ह्वाइट हाउस के प्रवक्ता रॉबर्ट गिब्स ने कहा था कि मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक की तरफ से राजनीतिक सुधार के जो प्रस्ताव रखे गए हैं, वे परिवर्तन की मांग कर रहे लोगों को संतुष्ट करने के लिए काफी नहीं हैं। इसके अलावा ऐसी र्चचा भी रही है कि मिस्र में जनक्रांति के नजारे के बीच अमेरिका परिवर्तन को नियंत्रित करने की कोशिशों में जुटा है। इन खबरों का निहितार्थ यही है कि अमेरिका की कोशिश मिस्र में भी ट्यूनीशिया जैसा फौरी हल ढूंढ लेने की है। जिससे सत्ता परिवर्तन तो हो जाए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंधों और आर्थिक मामलों में देश की नीतियों में कोई बुनियादी बदलाव न आए।
बुनियादी बदलाव की संभावना नगण्य
अरब देशों में जन क्रांति की उठी मौजूदा लहर की शुरु आत ट्यूनिशिया से ही हुई। लाखों लोगों के सड़कों पर उतर आने का नतीजा यह हुआ कि वहां के राष्ट्रपति जाइन अल अबिदीन बेन अली को देश छोड़कर भागना पड़ा। लेकिन 23 साल से सत्ता पर कब्जा जमाए बैठे बेन अली के पिछले 14 जनवरी को देश से जाने के बाद उनके ही सत्ता तंत्र का हिस्सा रहे लोगों ने नई सरकार बना ली और इस तरह वहां किसी बुनियादी बदलाव की संभावना फिलहाल टल गई है। ट्यूनिशिया के इस घटनाक्रम पर ब्रिटिश पत्रिका द इकॉनोमिस्ट ने यह माकूल शीर्षक दिया- अली बाबा तो भागा, लेकिन उसके चालीस चोरों का क्या होगा? यह सवाल मिस्र में भी है। 25 जनवरी से शुरू हुई मौजूदा जन क्रांति अगर सफल हुई तो किस रूप में होगी? क्या राष्ट्रपति मुबारक के सत्ता से हटने को ही इस क्रांति की सफलता मान ली जाएगी? अपने मजबूत इरादों के साथ लाखों की संख्या में सड़कों पर उतरे और जमे लोगों के नजरिए से तो शायद ऐसा नहीं होगा, मगर अमेरिका की मंशा साफ तौर पर इस बदलाव को उतने पर ही सीमित कर देने की है।
अमेरिका-इस्रइल के हितों का रक्षक है मिस्र
तीस साल से अमेरिकी हितों की सेवा कर रहे होस्नी मुबारक और उनके सहयोगियों के लिए इस अमेरिकी मंशा को समझना कठिन नहीं है। इसीलिए उनकी तरफ से अब उस देश पर सीधा निशाना साधा गया है, जिसकी छतछ्राया पाने के लिए वे अब तक अपने देश तथा पास-पड़ोस के खामोश जनमत को कुचलते रहे हैं। मिस्र के मौजूदा शासकों ने अमेरिका की यह छतछ्राया 1978 में कैंप डेविड समझौते के साथ हासिल की थी, जिसके तहत मिस्र ने फिलस्तीन को स्वतंत्र देश बनाने के मकसद को ताक पर रखते हुए इजराइल से समझौता कर लिया था। उसी समझौते से भड़के गुस्से का शिकार मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सादात बने थे, जिनकी हत्या के बाद उनके जूनियर मुबारक सत्ता में आए और जोर-जबरदस्ती से आज तक वहां बने हुए हैं। कैंप डेविड समझौते के बाद से मिस्र लगातार फिलस्तीन तथा अन्य हर प्रासंगिक मुद्दे पर अरब जगत या पश्चिम एशिया के आम जनमत से अलग चलता रहा है। तब से वह उस क्षेत्र में अमेरिका और इजराइल के हितों का रक्षक है।
अमेरिका-इस्रइल के हितों का रक्षक है मिस्र
तीस साल से अमेरिकी हितों की सेवा कर रहे होस्नी मुबारक और उनके सहयोगियों के लिए इस अमेरिकी मंशा को समझना कठिन नहीं है। इसीलिए उनकी तरफ से अब उस देश पर सीधा निशाना साधा गया है, जिसकी छतछ्राया पाने के लिए वे अब तक अपने देश तथा पास-पड़ोस के खामोश जनमत को कुचलते रहे हैं। मिस्र के मौजूदा शासकों ने अमेरिका की यह छतछ्राया 1978 में कैंप डेविड समझौते के साथ हासिल की थी, जिसके तहत मिस्र ने फिलस्तीन को स्वतंत्र देश बनाने के मकसद को ताक पर रखते हुए इजराइल से समझौता कर लिया था। उसी समझौते से भड़के गुस्से का शिकार मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सादात बने थे, जिनकी हत्या के बाद उनके जूनियर मुबारक सत्ता में आए और जोर-जबरदस्ती से आज तक वहां बने हुए हैं। कैंप डेविड समझौते के बाद से मिस्र लगातार फिलस्तीन तथा अन्य हर प्रासंगिक मुद्दे पर अरब जगत या पश्चिम एशिया के आम जनमत से अलग चलता रहा है। तब से वह उस क्षेत्र में अमेरिका और इजराइल के हितों का रक्षक है।
मिस्र में बदलाव का होगा व्यापक असर
अमेरिका की चिंता यही है कि अगर मिस्र में कोई आम जनमत के हिसाब से चलने वाली सरकार आ गई, तो उसकी सारी गणनाएं गड़बड़ा सकती हैं। और फिर मिस्र कोई छोटा देश नहीं है। वह साढ़े आठ करोड़ की आबादी वाला उस इलाके का सबसे बड़ा देश है। यह बहुत संभव है कि मिस्र में जो हो, उसका असर पूरे अरब जगत पर पड़े। जब एक करोड़ की आबादी वाले ट्यूनीशिया के जन विद्रोह ने मिस्र से लेकर जॉर्डन, यमन आदि तक में हलचल मचा दी है, तो मिस्र से आगे बढ़ी लहर का क्या असर होगा, इसका अंदाजा कौन लगा सकता है? अगर मिस्र में जन आकांक्षाओं की ऐसी मजबूत लहरें उठ सकती हैं, तो क्या सऊदी अरब और मोरक्को जैसे अमेरिकी हितों के अड्डों को पूरी तरह सुरक्षित माना जा सकता है? और अगर उन सभी देशों में जन क्रांति का नजारा पैदा हो गया, तो संसाधन एवं सामारिक लिहाज से बेहद महत्त्वपूर्ण इस इलाके पर क्या अमेरिकी पकड़ बने रहने को लेकर कोई आश्वस्त हो सकता है?
अमेरिका ने बदली नीति
जाहिर है, अमेरिका मिस्र की जन क्रांति को ‘मैनेज’ करना चाहता है। इसके लिए अपने वफादार मुबारक की बलि चढ़ाने को अब वह तैयार हो गया दिखता है। वरना, 25 जनवरी को जब लोगों का हुजूम पहली बार उमड़ा, तो अमेरिकी उप राष्ट्रपति जो बाइडेन ने मुबारक को फोन कर अमेरिका के उनके साथ होने का संकेत दिया और अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने एलान किया कि मुबारक की सरकार ‘स्थिर’ है। लेकिन जब लगा कि यह दांव महंगा पड़ सकता है, ऐसे रु ख से प्रदशर्नकारी और भड़केंगे और अगर मुबारक को जाना पड़ा, तो नई सरकार के मन में अमेरिका विरोधी भावनाएं होंगी, तो अमेरिका ने ‘व्यवस्थित संक्रमण’ की अपील शुरू कर दी।
अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती के संकेत
लेकिन युग अमेरिका के साथ नहीं है। मिस्र या किसी अन्य देश में बनने वाली लोकतांत्रिक सरकार वैसी आसामी नहीं हो सकती, जैसी अब तक उस क्षेत्र के कई देशों की सरकारें रही हैं। जाग्रत जनमत के साथ अमेरिकी वर्चस्व की सीमाएं साफ होकर उभरने लगी हैं। टर्की पहले से इसकी एक मिसाल बना हुआ है। कहा जा सकता है कि इराक और अफगानिस्तान ने अगर अमेरिका की सैनिक शक्ति की सीमाएं साफ कर दीं, तो अब उठी लोकतंत्र की लहर से अमेरिकी वर्चस्व के दिन लदने के संकेत मिल रहे हैं।
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