राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के सत्ता छोड़ने पर मिश्चवासी जश्न मना रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इजराइल को छोड़कर किसी अन्य देश ने मुबारक को विदा करने में एक भी आंसू नहीं गिराया। इजराइल का दुख भी मुबारक से किसी लगाव के कारण नहीं, बल्कि अपने संकीर्ण स्वाथरें के कारण था। मुबारक को हटाने के लिए लाखों नागरिकों ने आंदोलन किया। सुरक्षा बलों से संघर्ष में सैकड़ों लोग मारे गए और घायल हुए। इन सभी नागरिकों को हमारा सलाम! इसके बावजूद मिश्च के संघर्ष के सही मूल्यांकन के लिए इसकी सीमाओं की ओर ध्यान देना जरूरी है। इस तरह लोगों का भ्रष्ट सत्ता के विरुद्ध अचानक लामबंद होना बहुत उत्साहवर्धक तो लगता है, पर यह जानना जरूरी है कि ऐसे अधिकांश मामलों में प्राय: अंदर ही अंदर कुछ और भी खिचड़ी पक रही होती है। एक ओर तो मुबारक के सबसे बड़े मित्र अमेरिका का यह प्रयास था कि मुबारक के स्थान पर जो ताकत आए वह भी अमेरिकी हितों के अनुकूल ही हो। दूसरी ओर मिश्च में प्रतिरोध की सबसे संगठित शक्ति मुस्लिम ब्रदरहुड का प्रयास था कि बदलाव की इस बयार का लाभ उसे भी मिल जाए। इसी तरह मिश्च की सेना, गुप्तचर संस्थाओं व उनसे अच्छे संबंध रखने वाले सबसे धनी परिवारों व पूंजीपतियों के प्रयास भी साथ-साथ चल रहे थे कि मुबारक बेशक जाएं पर विषमता व भ्रष्टाचार पर आधारित व्यवस्था का लाभ जिन व्यक्तियों ने सर्वाधिक उठाया है, उनसे ज्यादा छेड़छाड़ न हो। जो घटनाक्रम टीवी के स्क्रीन पर दुनियाभर ने देखा, उसमें पर्दे के पीछे कहीं न कहीं इन सब ताकतों की अपनी सक्रियता थी। इस सक्रियता का ही नतीजा था कि चुनावों से पहले के दौर में आम सहमति की राष्ट्रीय सरकार नहीं बनी है बल्कि सेना ने चुनावों से पहले तक के समय के लिए सत्ता संभाली है। अत: चुनावों से पहले तुष्टीकरण के प्रयास तो हो सकते हैं पर समता, न्याय व लोकतंत्र की दिशा में कोई बड़े बदलाव होने की उम्मीद नहीं है। चुनाव के बाद क्या होगा, यह चुनाव के परिणामों पर निर्भर करेगा। एक संभावना यह भी है कि सबसे बड़ी संगठन शक्ति होने के कारण मुस्लिम ब्रदरहुड ही चुनावों के बाद सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन के रूप में उभरे। यदि ऐसा हुआ तो मिश्च अपनी धर्म निरपेक्षता की विरासत को छोड़कर कट्टरवाद की ओर बढ़ेगा। मुबारक को हटाना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है पर अभी तक मिश्च में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिससे यह निश्चित तौर पर कहा जा सके कि लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता, न्याय व समता के व्यापक उद्देश्यों को पूरा करने वाली कोई नई व्यवस्था कायम होने वाली है। दूसरी ओर यदि निरंतरता से वास्तविक लोकतंत्र, न्याय, समता व पंथनिरपेक्षता की ताकतों को संगठित करने का प्रयास लंबे समय से हो रहा होता तो यह ताकत बदलाव की इस बयार का पूरा लाभ उठा सकती थी और तब हम विश्वास के साथ कह सकते थे कि मिश्च में समता, न्याय व लोकतंत्र के नए दौर की संभावना है। अत: जो लोग समाज में व देश में टिकाऊ सार्थक बदलाव लाना चाहते हैं, उन्हें इसके लिए सुनियोजित कार्यक्रम बनाकर वषरें तक काम करना होगा। तभी वे अचानक उत्पन्न हुई परिस्थितियों का लाभ उठा सकेंगे। जनता के बीच इस कार्य का मुख्य उद्देश्य यह है कि बढ़ती संख्या में लोग समता, न्याय, लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता व पर्यावरण रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हों और इसके लिए निरंतरता से कार्य करें। एक बार समाज में यह ताकत पैदा हो जाए तो फिर अनुकूल अवसर पैदा होने पर यह ताकत जनपक्षीय व न्यायसंगत जनाधार तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। पर ऐसी बड़ी व संगठित ताकत के अभाव में तानाशाह के हटने के बाद भी न्यायसंगत बदलाव की कोई गारंटी नहीं दी जा सकती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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