अरब देशों में बह रही लोकतंत्र की लहर से बहुत कुछ बदलता देख रहे हैं लेखक
पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका के देशों में दशकों से शासन कर रहे तानाशाहों और राजाओं के विरुद्ध विद्रोह का तूफान उठ रहा है। यह तूफान ट्यूनीशिया से शुरू हुआ और देखते ही देखते अनेक अरब व अफ्रीकी देशों तक तक फैल गया। इस तूफान का सामना न कर पाने के कारण पहले ट्यूनीशिया के तानाशाह राष्ट्रपति जिने अल अबेदीन बेन अली को देश छोड़कर भागना पड़ा और फिर मिश्च के तानाशाह होस्नी मुबारक को इस्तीफा देना पड़ा। बेन अली दो दशकों और होस्नी मुबारक तीन दशकों से भी अधिक समय से सत्ता पर काबिज थे। वक्त की नजाकत को न पहचानते हुए इस लहर की सबसे पहले आलोचना लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी ने की थी, जो स्वयं कई दशकों से सत्ता पर कब्जा जमाए हुए हैं, लेकिन उनकी इस आलोचना का नतीजा यह हुआ कि लीबिया में भी जन आंदोलन शुरू हो गया। कर्नल गद्दाफी की तरह अन्य देशों के तानाशाह और बादशाह सत्ता और ऐशो-आराम के छिनने की आशंका से घबराए हुए हैं और दिखावे के लिए शासन पद्धति में थोड़े-बहुत सुधार लाने के वायदे कर रहे हैं, लेकिन दशकों से मानवाधिकारों से वंचित, भ्रष्टाचार, बेकारी और बढ़ती महंगाई से दुखी जनता के गुस्से के ज्वारभाटे के आगे वे कुछ कर नहीं पा रहे हैं। आज मोरक्को, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, लीबिया, मिश्च, यमन, जॉर्डन और बहरीन आदि कितने ही देशों में एक प्रकार की जन क्रांति शुरू हो गई है। इस जन क्रांति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बिना किसी तैयारी या संगठन के अकस्मात भड़की है और इसने बिना खूब-खराबे के एक प्रकार के अरबी सत्याग्रह को जन्म दिया है। इसकी दूसरी बड़ी विशेषता यह है कि ट्यूनीशिया और मिश्च जैसे देशों की सेनाओं ने अपने हकों के लिए लड़ रहे नागरिकों का समर्थन करते हुए उनके विरुद्ध बल प्रयोग से इनकार कर दिया है। इस जनक्रांति को फैलाने में फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्क बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। यमन इसका उदाहरण है। यमन के शासक अब्दुल्ला अली सालेह की दशकों से चली आ रही सत्ता राजधानी सना तक ही सीमित है। यमन में जितने नागरिक हैं, उनसे तीन गुना अधिक बंदूकें हैं, जिनके कारण देश में अराजकता जैसी स्थिति है। ऊपर से वहां मुस्लिम कट्टरपंथ का वर्चस्व भी बढ़ रहा है। ऐसे में फेसबुक और ट्विटर ने देश की युवा पीढ़ी को तेजी से जाग्रत किया है। जहां तक बहरीन का सवाल है, इस देश में जनविद्रोह अन्य देशों की तुलना में अधिक संगठित है। वहां आंदोलनकारियों ने स्वतंत्र मीडिया सेंटर की स्थापना तक कर ली। शिया बहुल बहरीन के शासक शाह हमद का राजपरिवार सुन्नी है। विरोध के इस प्रमुख आधार के अलावा वहां पाकिस्तान, यमन और जॉर्डन आदि अनेक देशों के अप्रवासी भारी संख्या में मौजूद हैं, जो सरकारी नौकरियों पर भी कब्जा जमाए हुए हैं। महंगाई और बेकारी के विरुद्ध बढ़ते जन असंतोष को ट्यूनीशिया और मिश्च जैसे देशों से काफी प्रेरणा मिली है और लोग भारी संख्या में राजधानी मानामा के पर्ल चौक में कई दिनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। ट्यूनीशिया और मिश्च में अभी अस्थायी या कामचलाऊ सरकारें ही बनी हैं और संविधान को बदलने की तैयारियां चल रही हैं। लीबिया के बेनगाजी जैसे शहर में भारी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। अलग-अलग देशों के जनविरोध के अपने अलग कारण हैं, जैसे लीबिया में 1996 में जेल में सुरक्षा बलों द्वारा लगभग 1200 कैदी मारे गए थे। आज वहां की जनता सत्ता-परिवर्तन के साथ-साथ उस नरसंहार की निष्पक्ष जांच कराना और दोषियों को दंड दिलाना चाहती है। अगर ईरान की बात करें तो वहां के मुल्ला-मौलवियों ने विपक्ष का गला घोंट रखा है। वहां दशकों से राजनीतिक स्वतंत्रता की लड़ाई चल रही है। इस बार जब विपक्ष ने फिर आवाज बुलंद की है तो राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने मूसावी और करूबी जैसे विपक्षी नेताओं को जेल में ठूंस दिया है। देश की जनता उन नीतियों से भी दुखी है जिनके कारण अमेरिका आदि देशों के आग्रह पर संयुक्त राष्ट्र ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं। उधर, जॉर्डन और मोरक्को जैसे देशों के बादशाहों ने जनविरोध की उमड़ती लहर को रोकने के लिए पहले से कदम उठाने शुरू किए हैं। जॉर्डन के शाह अब्दुल्ला ने जलसे-जुलूसों और लोगों के जमा होने पर लगे नियंत्रण ढीले कर दिए हैं और मोरक्को के शासक ने बढ़ती कीमतों को देखते हुए अनेक वस्तुओं पर सरकारी सब्सिडी बढ़ा दी है। एक तरफ अरब देशों में बेकारी और भ्रष्टाचार फैला हुआ है और एक बड़े वर्ग को जीवनयापन में कठिनाई हो रही है वहीं दूसरी ओर तानाशाहों और राजपरिवारों की संपत्ति और एशोआराम बढ़ते जा रहे हैं। उदाहरण के लिए मिश्च के पूर्व राष्ट्रपति मुबारक और उनकी बीवी सूजैन की निजी संपत्ति अनुमानत: 70 अरब डॉलर है। अरब शासकों की अय्याशी, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आम अरबी नागरिकों की बहुत-सी शिकायतें जायज हैं। अधिकांश अरब देशों में तेल के विशाल भंडार हैं, लेकिन जनता की ख़ुशहाली के लिए उनका बहुत कम उपयोग किया जाता है। फिर अरब तेल पर आश्रित अमेरिका और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देश हैं, जो वहां की गद्दियों पर अपने पिट्ठू तानाशाह और राजा रखना चाहते हंै। अरब देशों में अब अमेरिकी बाजी पलटती दिखाई देती है। पाश्चात्य देशों को मजबूरन अपने पिट्ठुओं का विरोध और जनता का समर्थन करना पड़ रहा है। वे अरब शासकों से व्यवस्था में परिवर्तन लाने और उसे जनता के अधिकाधिक अनुकूल बनाने के लिए कह रहे हैं। पाश्चात्य देशों का धर्मसंकट यह है कि वे लोकतंत्र के पक्षधर हैं, जबकि अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए अरब देशों में तानाशाही सरकारों को समर्थन देते हैं। अगर जनता तानाशाहों और राजाओं के विरुद्ध लोकतंत्र चाहती है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकार मांगती है और भ्रष्टाचार के उन्मूलन के अलावा रोजगार तथा काम पाना चाहती है तो वे उसकी आलोचना कैसे करें? अरब देशों में बह रही लोकतंत्र की लहर को देखते हुए आशा की जा सकती है कि आने वाले दिनों में उनका रूप काफी बदल जाएगा। वहां लोकतंत्र आएगा और वे पश्चिम के मुखापेक्षी न रहकर स्वतंत्रचेता होंगे। हालांकि अरब सरकारें सत्ता को बचाने के लिए हिंसा का भी सहारा ले रही हैं और अपने समर्थकों से जवाबी प्रदर्शन भी करवा रही हैं लेकिन क्या इस सब से जाग्रत जनता को दबाया जा सकेगा? (लेखक बीबीसी के पूर्व प्रसारक हैं)
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