पड़ोसी देश नेपाल में सोलहवें प्रयास के बाद प्रधानमंत्री का चुनाव हुआ है। नए प्रधानमंत्री बने झालनाथ खनाल के लिए यह सियासी ताज कितना सुखद होगा यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन इतना जरूर है अंत तक दुविधाओं का जंजाल उनका पीछा करता रहेगा। उनके प्रधानमंत्री बनने के पीछे माओवादी नेता कमल दहल प्रचंड का विशेष योगदान रहा है इसलिए खनाल की यह नैतिक जिम्मेदारी होगी वह प्रचंड के साथ अपने संबंध मधुर बनाए रखें। वहीं नेपाली राष्ट्रपति राम बरन यादव के साथ भी उन्हें तालमेल बिठाकर रखना होगा जो उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। अब यहां सवाल यह है कि खनाल छत्तीस के रिश्ते वाले राष्ट्रपति राम बरन यादव और माओवादी नेता कमल दहल प्रचंड से एक साथ अपने संबंध अनुकूल कैसे बनाए रख सकेंगे, यह उनके लिए बड़ी चुनौती है। सात महीने तक बिना सरकार के रहने के बाद अब नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी और एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी के नेता झालनाथ खनाल के नेतृत्व में सरकार बन गई है और उम्मीद है कि है कि नए गणतांत्रिक संविधान को लिखने का काम आगे बढ़ेगा। इसकी दूसरी समय सीमा 28 मई को खत्म हो रही है यानी इसमें करीब चार महीने बाकी हैं। कहा जा रहा है 16 बार नाकाम रहने के बाद संविधान सभा प्रधानमंत्री चुनने में इसलिए कामयाब हो सकी, क्योंकि सबसे बड़ी पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी,माओवादी के नेता कमल दहल प्रचंड ने देश हित में प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया। बहरहाल नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी, एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी, माओवादी के बीच तालमेल हुआ और खनाल प्रधानमंत्री बने हैं। जानकार बताते हैं कि इन दोनों दलों में इस मुद्दे पर समझौता हुआ है कि माओवादियों की जनमुक्ति सेना के तकरीबन 20 हजार लड़ाकों के बारे में दोनों पक्ष कोई हितकारी रास्ता निकालें। इस पर खनाल ने भी यह घोषणा कर दी है कि 90 दिन के भीतर इन लड़ाकों में से कुछ को नेपाली सेना में शामिल कर लिया जाएगा और बाकी का पुनर्वास होगा। दिलचस्प यह है कि सिर्फ प्रचंड वाली माओवादी पार्टी के अलावा देश की सभी पार्टियां इन लड़ाकों को सेना में लेने के विरुद्ध हैं। नेपाली कांग्रेस, यूएमएल और सेना के एक धड़े को आशंका है कि इन लड़ाकों को सेना में लेने से सेना और अन्य सरकारी व्यवस्था पर माओवादियों का शिकंजा कस सकता है। इतना तक कि राष्ट्रपति राम बरन यादव भी इसके पक्ष में नहीं हैं। उल्लेखनीय है कि प्रचंड ने अपनी सरकार बनाने के आठ महीने बाद बीते वर्ष मई में प्रधानमंत्री पद से इसीलिए इस्तीफ़ा दिया था। दरअसल माओवादी पार्टी की जनमुक्ति सेना के लड़ाकों को नेपाली सेना में भर्ती करने के मुद्दे पर उन्होंने सेना प्रमुख जनरल कटवाल को निकाल दिया था, लेकिन राष्ट्रपति रामबरन यादव ने प्रधानमंत्री के फैसले को पलटकर जनरल कटवाल को बहाल कर दिया। इसी विवाद से खफा होकर प्रचंड ने इस्तीफ़ा दे दिया। तब से राष्ट्रपति राम बरन यादव और माओवादी नेता कमल दहल प्रचंड के बीच शीत युद्ध चल रहा है। यूं कहें कि दोनों एक-दूसरे के परस्पर विरोधी हैं। इतना ही नहीं प्रचंड की पार्टी ने तो राष्ट्रपति के विरुद्ध आंदोलन तक चलाने की घोषणा कर रखी है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि नेपाल को हिंदू राष्ट्र से गणराज्य में तब्दील करने में पुष्पकमल दहल प्रचंड की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने दस साल तक नेपाली सेना और पुलिस के खिलाफ़ गुरिल्ला युद्ध का नेतृत्व किया। जनांदोलनों के ज्वार के बाद हुए चुनाव में उनकी पार्टी सबसे •यादा सीटों पर जीत दर्ज की और आखिर संसद ने मई 2008 में ज्ञानेंद्र शाह को राजगद्दी से हटाकर 240 साल पुरानी राजशाही का अंत किया और नेपाल पहली बार गणराज्य बना। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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