Saturday, February 5, 2011

आखिरकार नेपाल में नया नेतृत्व


बहुदलीय लोकतंत्र को नापसंद करने वाला व्यक्ति अब नेपाल में लोकतंत्र का नेतृत्व करेगा।

ऊपर से देखने में तो यह नेपाली कांग्रेस समर्थित कम्युनिस्ट सरकार की जगह माओवादी पार्टी समर्थित कम्युनिस्ट सरकार है, पर नेपाल की राजनीति में पैदा हो गए डरावने जिच के हिसाब से माधव कुमार नेपाल की जगह झलनाथ खनाल का प्रधानमंत्री बनना बहुत बड़ी घटना है। 30 जून को माधव नेपाल ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया था और तब से 16 दौर के चुनाव के बाद भी नेपाली संसद नया प्रधानमंत्री नहीं चुन पाई थी। इस लिहाज से चाहे हम माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड की कूटनीतिक चालाकी को बड़ा बताएं या खनाल द्वारा अपनी पूरी पार्टी को साथ लेने की सफलता को, लेकिन उनकी जीत के बाद नेपाल में नए सिरे से उम्मीदें जगी हैं। कम्युनिस्ट पार्टी-एकीकृत माओवादी लेनिनवादी में हर किसी बड़ी पार्टी की तरह कई धाराएं हैं और माधव नेपाल अगर सबसे बड़ी माओवादी पार्टी की जगह नेपाली कांग्रेस और मधेशी पार्टियों से सहयोग के पक्षधर थे, तो उनकी जगह प्रधानमंत्री बने खनाल माओवादी दल के साथ जाने की वकालत करते रहे हैं। इसलिए इस फैसले के लिए सिर्फ प्रचंड द्वारा खुद को दौर से बाहर करने की होशियारी ही जिम्मेदार नहीं है-खनाल अपनी पूरी पार्टी को साथ लेने में सफल रहे हैं। लंबे समय तक भूमिगत और जेलों में रहे खनाल भी पर्याप्त अनुभवी और समझदार नेता हैं, जिनकी राजनीतिक सोच और रुझान भी साफ हैं। माओवादी नेता प्रचंड से उनकी दोस्ती निजी नहीं है-यह काफी कुछ वैचारिक है। वह भी बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली को पसंद नहीं करते, जबकि उनकी पार्टी ने मोहन भंडारी द्वारा दी गई लाइन को मानकर ऐसा किया था। जब-तब लिखे लेखों, किताबों और पार्टी दस्तावेजों से भी उनकी राय जाहिर है। ऐसे में उनके लिए एक लोकतांत्रिक शासन की अगुवाई करना, एकदम पक्के पोजीशन ले चुके दलों वाले संसद में सर्वानुमति बनाना, नेपाल में शासन को बहाल करना और सबसे बढ़कर इस संसद द्वारा नया संविधान लिखवा लेना बहुत बड़ी चुनौती का काम है। नेपाल की आर्थिक, प्रशासनिक और राजनीतिक बदहाली किसी से छिपी नहीं है और हालत यह हो गई कि सिर्फ न्यस्त स्वार्थ ही नहीं, लोगों का एक बड़ा हिस्सा भी पुरानी राजशाही को याद करने लगा था। प्रचंड का फैसला भी उनकी पार्टी में स्पष्ट विरोध और मतभेद केबीच हुआ, जबकि अधिकांश मधेशी पार्टियों और नेपाली कांग्रेस का समर्थन हासिल करना अपने आप में टेढ़ी खीर है। पर ये चुनौतियां न होतीं, तो प्रधानमंत्री पद का चुनाव सात महीने तक नहीं लटकता। संविधान बनाना, लोकतांत्रिक संस्थाओं को जमाना और बदहाल लोगों के लिए इतना कुछ करने को पड़ा है कि खनाल का पद दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण पदों में एक बन गया है।


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