Monday, February 28, 2011

छंटे नहीं हैं आशंकाओं के बादल


अभी दो हफ्ते पहले मिस्त्र की शांतिपूर्ण क्रांति के बारे में बहुत उत्साह से बात की जा रही थी। उसे रक्तहीन जनक्रांति कहा जा रहा था। आशा और उत्साह के उस अतिरेक पर शंका करने वालों को सनातन सनकी कहकर चुप रहने को मजबूर कर दिया गया था। कहा जा रहा था कि यह जमात कभी सकारात्मक पहलू देख ही नहीं सकती। यह ठीक है भी कि हालिया इतिहास में जनता की ऐसी एकता वाकई बहुत लंबे समय के बाद देखने को मिली थी, लेकिन आततायी सत्ता के प्रतीक होस्नी मुबारक के सत्ता छोड़ देने के उत्साह में लोग इस तथ्य पर ध्यान नहीं दे रहे थे कि इस बदलाव की बागडोर जनता को नहीं, बल्कि सेना को सौंपी गई है। ऐसा नहीं था कि यह सब दबे छिपे ढंग से हो रहा था, लेकिन जनता की हिम्मत और प्रतिबद्धता के इस विराट प्रदर्शन के आगे कोई सोच नहीं पा रहा था कि आखिर अंतरिम सत्ता सेना को क्यों सौंपी जा रही है। यह अपने आप में एक खतरनाक फैसला था। जिस बदलाव के लिए लाखों लोग महीनों तहरीर चौक पर खुले आसमान के नीचे राजकीय हिंसा को झेलते रहे, उसकी यह परिणति कैसे हुई कि सेना को लोकतांत्रिक संक्रमण का वाहक स्वीकार कर लिया गया? असल में जिस बात का डर था, वह अब शायद हकीकत बनने लगी है। 25 फरवरी को तहरीर चौक पर लोकतांत्रिक सुधारों की मांग करने आए प्रदर्शनकारियों के साथ सेना और पुलिस ने जैसा सुलूक किया उससे यह डर और गहरा ही होता है कि सेना कहीं जनता के इस स्वत: स्फूर्त आंदोलन का बीच में ही अपहरण न कर ले। सोशल मीडिया पर आने वाली रिपोर्टो से पता चल रहा है कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध करने वाले लोगों पर पुलिस और सेना ने बिजली के कोडे़ इस्तेमाल किए, लोगों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया और महिलाओं के साथ बदतमीजी की गई। ध्यान रहे, मुबारक विरोधी प्रदर्शनों के दौरान महिला प्रदशर्नकारियों के साथ बेहद सम्मनाजनक व्यवहार किया गया था। विरोध का नेतृत्व करने वाले समूह ने महिलाओं से कहा था कि यौन हिंसा से बचने के लिए वे दोहरे कपडे़ पहनकर आएं, ताकि पुलिस और सेना के यौन हमलों से सुरक्षित रह सकें। यही नहीं, तब सेना ने भी निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने से इनकार कर दिया था, लेकिन अब सेना के हाथ में सत्ता आने के बाद महिला प्रदर्शनकारियों खिलाफ फिर वही कुत्सित खेल शुरू हो गया है। मिस्त्र की इस क्रांति को इतिहास के फलक पर रखकर देखें तो हैरानी इस बात की होती है कि प्रदशर्नकारी संक्रमण काल के दौरान शासन का कामकाज सेना को सौंपने पर शायद इसलिए सहमत होना पड़ा, क्योंकि वहां लोकतांत्रिक संस्थाओं का ढांचा मौजूद नहीं था। इसे पता नहीं विडंबना कहा जाए या एक तार्किक परिणति कि मिस्त्र में अंदर ही अंदर उबल रहे इस जन-असंतोष के संगठनकर्ताओं ने पिछली सदी के उपनिवेश विरोधी आंदोलन से कोई सबक नहीं लिया। याद करें कि चौथे-पांचवें दशक के दौरान दुनिया के तमाम उपनिवेश राजनीतिक रूप से तो आजाद होने लगे थे, लेकिन वहां शासन का ढांचा लोकतांत्रिक नहीं बन पा रहा था। ज्यादातर देशों में सेना सत्ता में भागीदार होती जा रही थी और इसकी अहम वजह यह थी कि तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व ने यह तथ्य समझने के लिए जरूरी होमवर्क नहीं किया था कि लोकतांत्रिक चेतना को गहराई में रोपे बिना और जनता को स्व-शासन का अधिकारी माने बिना सेना के संभावित हस्तक्षेप से बचा नहीं जा सकता। हमारे सामने एशिया और अफ्रीका के उन तमाम पूर्व उपनिवेशों के उदाहरण हैं, जहां विदेशी शोषण से मुक्ति पाने का संघर्ष कितनी जल्दी सेना की सत्ता आकांक्षाओं की बलि चढ़ गया। भारत को छोड़कर लगभग हर जगह यही हालात सामने आए। इन उपनिवेशों में जनता के पक्ष में लड़ने वाले लोग दरअसल लोकतांत्रिक विचार और संस्थाओं में यकीन नहीं करते थे। उनके लिए आजादी का मतलब सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण था। सत्ता के चरित्र में आमूल बदलाव लाना उनकी प्रतिबद्धता नहीं थी। उदाहरण के लिए इंडोनेशिया का अनुभव देखें तो वहां सुकर्णो लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे। वे पश्चिमी साम्राज्यवाद के प्रखर विरोधी भी थे और अपने देश को धार्मिक जड़ता से निकालना चाहते थे, लेकिन देश की सैन्य राजनीति से पार पाना उनके लिए मुश्किल होता गया। अंतत: उनके खिलाफ सैन्य षड्यंत्र हुआ और सत्ता सैनिक कमांडर सुहार्तो के हाथों में आ गई। इस तरह आखिर में एक देश की लोकतांत्रिक आकांक्षा एक राजनीतिक विपर्यय में बदलकर रह गई। इसके बाद वहां जो शासकीय ढांचा उभरा, वह सेना की मौजूदगी से बुरी तरह त्रस्त था। आज भी इंडोनेशिया की संसद में सेना के लिए काफी सीटें आरक्षित रहती हैं। लगभग ऐसे ही हालात थाईलैंड में भी हैं। वहां पिछले साल लोकतंत्र समर्थकों और सेना के बीच बार-बार हिंसक टकराव हुए। अफ्रीका के नवस्वाधीन देशों में भी लोकतंत्र का यही हश्र हुआ। वहां लोकतांत्रिक चेतना करिश्माई नेताओं की स्वेच्छाचारिता का शिकार हो गई। ऐसे में भारत में लोकतंत्र के स्थायित्व का स्मरण करना एक तरह से लोकतंत्र के मूल्यगत तकाजों को भी याद करना है। यह ठीक है कि भारत में लोकतंत्र अभी भी सामाजिक बराबरी या अवसरों की समानता के रूप में स्थापित नहीं हो पाया है। आपातकाल आज भी लोकतंत्र के साथ एक छल के रूप में लोगों की स्मृति में अंकित है, लेकिन उसके बाद देश में लोकतंत्र की बहाली को हमारे संविधान निर्माताओं और स्वाधीनता आंदोलन के प्रणेताओं की दूर-दृष्टि माना जाना चाहिए कि उन्होंने शासकीय ढांचे में सेना को किसी भी ढंग से शामिल नहीं होने दिया। व्यापक निरक्षरता के बावजूद उन्होंने जनता के विवेक और उसकी स्व-शासन की आकांक्षाओं का सम्मान किया। इसके उलट भारत के आसपास या उसके बाद आजाद होने वाले देशों में यही काम नहीं किया गया। लोकतांत्रिक मूल्यों, चेतना और जनता के स्वशासन के विचार को पालने-पोसने और उसे सही दिशा देने की जिम्मेदारी नहीं उठाई गई। शायद यह भी एक कारण है कि पाकिस्तान से लेकर मिस्र तक राजनीतिक बदलाव का मतलब हमेशा कुछ करिश्माई राजनेताओं को सत्ता पर कब्जा करना फिर तख्ता पलट तक सीमित रहा। आज मिस्त्र की जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षा पर जिस तरह सेना का साया मंडरा रहा है, उसे वहां शासन के ढांचे में जनता के स्वशासन के विचार की अनुपस्थिति का परिणाम ही कहा जाएगा। लोगों का यह डर गलत नहीं है कि कहीं होस्नी मुबारक को हटाकर सेना खुद सत्ता पर काबिज न हो जाए। फिलहाल यह एक आशंका है, लेकिन आशंकाओं को हकीकत बनते देर नहीं लगती। अगर ऐसा हुआ तो इतिहास में हम मिस्त्र के इस अध्याय को एक ऐसी क्रांति के रूप में याद करेंगे, जो जनता की तमाम हिम्मत, त्याग और संकल्प के बावजूद इसलिए असफल हो गई क्योंकि वहां लोकतंत्र को शासन की सच्चाई में बदलने के लिए मूल ढांचा मौजूद नहीं था। अत: यह अलग से कहने की जरूरत नहीं है कि मिस्त्र की जनता की मुक्ति सिर्फ सेना को सत्ता से हटाकर पूरी नहीं होगी। उसके लिए जनता के पक्षधरों को लोकतंत्र के लिए जमीन भी तैयार करनी होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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