Monday, February 7, 2011

अमेरिका अपनी गलतियों की सजा भारतीय छात्रों को न दे


ऐसा लगता है जैसे वैश्विक तौर पर भारतीय छात्रों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं। महज कुछ महीने पहले आस्ट्रेलिया में उनके खिलाफ नस्लीय आचरण देखा गया था और अब अमेरिका में उनके साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है जो किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। वहां मौजूद करीब 1,500 छात्र कैलीफोर्निया स्थित ट्राई वैली विश्वविद्यालय (जो फर्जी पाया गया है) की धोखाधड़ी के शिकार हुए हैं। विश्वविद्यालय ने इन छात्रों के साथ स्टूडेंट वीजा को लेकर फर्जीवाड़ा किया और उसकी सजा भारतीय छात्रों को ही दी जा रही है। न्याय की ऐसी व्यवस्था अगर सबको सीख देने वाले अमेरिकी प्रशासन में हो तो यह उसकी नीतिगत खोट की ओर ही इशारा करती है। अमेरिकी प्रशासन ने विश्वविद्यालय संचालकों पर क्या कार्रवाई की, यह तो पता नहीं लेकिन कई भारतीय छात्रों को गिरफ्तार किया और कई ऐसे छात्र जो जमानत की राशि जुटा सके, उनकी रिहाई से पहले उन पर रेडियो टैग लगा दिये ताकि वे कहां जाते हैं, क्या करते हैं इसकी सारी जानकारी उपलब्ध रहे। हालत यह है कि ये भारतीय छात्र न घर के हैं और न घाट के। गौर करने वाली बात है कि इस फर्जी विश्वविद्यालय के ज्यादातर छात्र भारतीय और उनमें से भी अधिकतर आंध्रप्रदेश के हैं। सवाल उठता है कि क्या भारतीय छात्रों के साथ अपराधियों सा व्यवहार करने का अमेरिकी रवैया सही है? बात-बात पर मानवाधिकार की दुहाई और गुणवत्ता वाली व्यवस्था का पाठ पढ़ाने वाले अमेरिका की ऐसी प्रतिक्रिया सीधे-सीधे दोहरे मापदंड को दर्शाती है। दूसरे देशों में अगर अमेरिकी छात्रों के साथ ऐसा व्यवहार होता तो अब तक तूफान मच चुका हाता। हेठी तो यह कि अमेरिकी प्रशासन अब भी अपनी गलती नहीं स्वीकार रहा। घुटने के जरा ऊपर रेडियो कॉलर पहनाये जाने की बात पर कभी वह अपने कानून का हवाला देता है तो कभी यह कहता है कि इस कॉलर को भारतीय पायल और पैरों में पहने जाने वाले अन्य आभूषण की तरह समझा जाना चाहिए। दरअसल ऐसे मुद्दे पर अमेरिकी नीति में हमेशा उसकी श्रेष्ठता ग्रंथि
झलकती है। अमेरिका अगर वाकई वीजा सम्बंधी धोखाधड़ी को गम्भीरता से लेता है तो हमें इस पर कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए लेकिन भारतीय छात्र तो खुद भुक्तभोगी की भूमिका में हैं। फिर अमेरिकी प्रशासन को अपनी व्यवस्थाजनित खामियों पर फोकस करना चाहिए कि आखिर कैसे वहां ट्राई वैली जैसा विश्वविद्यालय चलाने की अनुमति मिली। फिर अगर यह चलाया भी जा रहा था तो आखिर कैसे उनकी कारगुजारियों की भनक प्रशासन तक नहीं पहुंची। अमेरिकी प्रशासन की एक बड़ी लापरवाही वीजा स्क्रीनिंग में भी दिखती है। र्वल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद वहां किसी भी छात्र को स्टूडेंट वीजा जारी करने के पहले कड़ी स्क्रीनिंग की जाती है, खासकर एशियाई छात्रों की। ऐसे में क्या अमेरिकी प्रशासन को इस फर्जी यूनिवर्सिटी की जांच तब नहीं करनी चाहिए थी जब इसमें दाखिले के लिए बड़े पैमाने पर छात्रों ने स्टूडेंट वीजा की मांग की थी। इस मुद्दे पर अमेरिकी हेकड़ी का कड़ा प्रतिकार तो जरूरी है ही, साथ ही हमें भी यह मनन करना होगा कि क्यों ऐरे-गैरे विदेशी यूनिवर्सिटी में शिक्षा पाने को हमारे छात्र उमड़ पड़ते हैं। यह सच है कि हमारी उच्च शिक्षा बहुत ज्यादा स्तरीय नहीं है लेकिन विदेष में भी कुछ यूनीवर्सिटी छोड़ दें तो बाकी की काम षिक्षा की आड़ में धंधा करना ही है। ऐसी जगहों पर दाखिला लेने को स्टेटस सिम्बलसे जोड़कर देखने से हमें बचना होगा। हमें उच्च शिक्षा और सामाजिक सोच के मोर्चे पर भी व्यापक सुधार की जरूरत है। हमें अपने यहां उच्च शिक्षा के अच्छे केंद्र खोलने चाहिए और विदेश पढ़ाई करने जाने वाले छात्रों की भी पूरी स्क्रीनिंग करनी चाहिए। यह देखना चाहिए कि वे कहां और क्यों जा रहे हैं। (विदेशी मामलों के जानकार श्री झा कई देशों में राजदूत रहे)


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