Friday, February 11, 2011

कई चुनौतियां हैं खनाल के सामने


भारत के साथ सबसे गहरे रूप से जुड़ा पड़ोसी देश नेपाल आकार में भले ही छोटा है, लेकिन वहां की राजनीति कई प्रतिमान गढ़ रही है। संसदीय प्रणाली अपनाने वाले किसी देश की यह पहली घटना है, जहां संसद में 17 बार प्रधानमंत्री चयन के लिए मतदान हुआ। 17वीं बार में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनिफाइड मार्कसिस्ट लेनिनिस्ट (सीपीएन यूएमल या नेकपां यूएमएल) के झलनाथ खनाल प्रधानमंत्री चुने गए। नेपाल की राजनीति के अजूबेपन का ही परिणाम है खनाल का दो तिहाई से ज्यादा बहुमत से प्रधानमंत्री बनना। संसद के 601 सदस्यों में नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के केवल 108 सदस्य हैं। सच तो यह है कि खनाल को अपनी ही पार्टी के सभी सांसदों का समर्थन हासिल नहीं था। पर ऐसा इसलिए संभव हुआ, क्योंकि नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेता प्रचंड ने अंतिम समय में स्वयं को दौर से हटाकर खनाल का समर्थन कर दिया।
खनाल नेपाल की राजनीति में सुपरिचित नाम हैं। लोकतंत्र समर्थक आंदोलन में भी वह सक्रिय रहे। प्रचंड और उनके विचारों में एक समानता यह है कि दोनों एकदलीय शासन की पारंपरिक कम्युनिस्ट विचारधारा के पक्षधर हैं। लेकिन यह मानना भी गलत होगा कि प्रचंड एवं बाबूराम भट्टराई ने केवल इसी कारण खनाल को समर्थन दिया। खनाल को थप्पड़ मारे जाने की घटना ने भी माओवादियों के मनोविज्ञान को बदलने में अहम भूमिका अदा की। प्रचंड ने कहा कि जनता अब नेताओं को थप्पड़ मारने लगी है, अगर सरकार गठित नहीं हुई, तो पत्थर मारेगी। वास्तव में नेपाल में सरकार गठित न होने से नेताओं की सूझबूझ और क्षमता पर भी सवाल उठने लगे थे। सभी दलों में लगभग सहमति थी कि कोई न कोई सरकार गठित होनी चाहिए।
यह भी सच है कि माओवादियों में खनाल को समर्थन देने पर मतैक्य नहीं था। खासकर मोहन वैद्य इस पक्ष में नहीं थे। साफ है कि कई कारकों ने तत्कालिक सहमति बनाने में भूमिका निभाई। जाहिर है, यह स्थिति कभी भी बदल सकती है। खनाल को एक साथ जनता की आकांक्षाआें और चारों राजनीतिक पक्षों-माओवादियों, नेपाली कांग्रेस, मधेशियों एवं अपनी पार्टी की आकांक्षाओं के बीच संतुलन साधने की कुशलता दिखानी होगी। उनके सामने भी वे चुनौतियां हैं, जो माधव कुमार नेपाल के समक्ष थीं एवं जिन कारणों से माओवादियों ने उनकी सरकार से समर्थन वापस लिया। इनमें सबसे ऊपर है, सेना पर नियंत्रण का सवाल तथा पूर्व माओवादी लड़ाकों को सेना में शामिल करने की मांग। माओवादियों की मांग है कि या तो पूर्व माओवादी लड़ाकों को सेना में शामिल किया जाए या फिर सेना के चारों समूहों को मिलाकर एक विशेष बल बना दिया जाए। यह आसान नहीं है, क्योंकि माओवादी अधिक से अधिक संख्या में अपने लोगों को सेना में शामिल करना चाहते हैं।
उनकी दूसरी चुनौती संविधान निर्माण कार्य पूरा करवाने की है। इसके लिए नेपाली कांग्रेस का भी समर्थन चाहिए। पर अगर संविधान सभा पर माओवादियों का प्रभाव दिखा, तो वह कभी समर्थन नहीं करेगी। खनाल को अपनी पार्टी में भी माधव नेपाल तथा के. पी. ओली जैसे कद्दावर नेताओं के साथ तालमेल बनाना होगा। इसी प्रकार मधेशी नेताओं का तेवर भी उनके लिए चुनौती है। मधेशी नेताओं ने साफ कर दिया है कि अगर संविधान में मधेशियों की स्वायत्तता की मांग शामिल नहीं हुई, तो वे समर्थन नहीं करेंगे। इसके अलावा, भारत के साथ संबंध भी नेपाल में बहुत बड़ा राजनीतिक मुद्दा है। प्रचंड ने माधव नेपाल से समर्थन वापसी के समय भारत का नाम लिए बिना विदेशी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताई थी। खनाल को समर्थन देते समय भी उन्होंने कहा कि हम अपने पड़ोसियों से बेहतर संबंध चाहते हैं, पर हस्तक्षेप सहन नहीं करेंगे। उन्होंने अपनी सरकार के पतन के लिए भारत को जिम्मेदार बताया था। खनाल नेपाल के लिए भारत के साथ संबंधों का महत्व जानते हैं, इसलिए वह ऐसा कुछ नहीं करना चाहेंगे, जिससे भारत नाराज हो, पर माओवादियों को उन्हें संतुष्ट करना होगा।
बेशक खनाल को इन चुनौतियां का एहसास होगा। इसके लिए उन्हें अपनी राजनीतिक कुशलता प्रमाणित करनी होगी। नेपाल में लोकतंत्र की सफलता व मजबूती भारत के हित में भी है। इसलिए हम खनाल की सफलता की ही कामना करेंगे, किंतु ऐसा होना कठिन लग रहा है।


No comments:

Post a Comment