विश्व आर्थिक पटल पर तेजी से उभरते भारत की तरक्की कई देशों को अखरने लगी है। इनमें पारम्परिक रूप से भारत विरोधी देश तो हैं ही, वे देश भी हमसे अपनी जलन नहीं छुपा पा रहे हैं जो विकसित होने का खिताब पहले ही अपने नाम कर चुके हैं। लिहाजा ऐसे देश कभी जलवायु और पर्यावरण संतुलन के नाम पर भारत को घेरने की कोशिश करते हैं तो कहीं उनकी बौखलाहट दुनिया में बढ़ते आर्थिक असंतुलन के नाम पर दिखाई देती है। हालांकि इन देशों को विकास के मसले पर न तो स्वयं के बयानों का कोई ध्यान है और न ही दोहा से लेकर कानकुन तक विश्व व्यापार और पर्यावरण को लेकर अलग-अलग दौर की सामूहिक वार्ताओं तथा सहमतियों का। संतोष इस बात का है कि भारत इन देशों की सभी चालों को समझता लग रहा है और उसने इनका सटीक जवाब देने के लिए जरूरी कदम उठाये हैं। वैश्विक आर्थिक असंतुलन से निपटने के उपायों पर पेरिस में सम्पन्न जी-20 के वित्तमंत्रियों के दो दिवसीय सम्मेलन में वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने साफ तौर पर कहा है कि इस असंतुलन के लिए भारत जिम्मेदार नहीं है। उन्होंने विकसित देशों को आगाह भी किया कि समस्या के हल के लिए सभी को एक ही लाठी से हांकने से काम नहीं चलने वाला। इन देशों (जिनमें चीन भी है) को उन्होंने प्रकारांतर में खबरदार किया कि जी-20 न केवल संकट के समय खड़े होने वाले फोरम बल्कि ढांचागत समस्याओं का हल ढूंढने वाले मंच की भी पहचान न खोये। उल्लेख जरूरी है कि भले चीनी प्रधानमंत्री ने पिछले साल अपने व्यापारिक हितों को साधने की गरज से दिल्ली आकर हमारी किस्सागोई की हो लेकिन अंतराष्ट्रीय मंचों पर चीन हमें घेरने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देने की ही नीति पर चलता है। मुद्दा चाहे सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का हो, या हमारी आर्थिक विकास दर का जो इस माली साल में अभी 8.6 फीसद की दर पर है। दुनिया में पर्यावरण को खतरा विकसित देशों की एकाधिकारवादी औद्योगिक नीतियों से सर्वाधिक बढ़ा है पर वे इसका जिम्मा विकासशील देशों पर थोपकर हमें विकास की उस दौड़ से बाहर कर देना चाहते हैं जिसकी आबादी व संसाधनों की कमी के बरक्स हमें सर्वाधिक जरूरत है। इसके पीछे ‘छद्म शत्रुओं’ की मुख्य चिंता यह है कि यदि हर मामले में हमने संसाधन बना लिये तो विकसित देशों का सारा किया-धरा बेकार जाएगा। अभी जल-थल से लेकर नभ तक सभी जरूरतों के लिए भारत दुनिया में सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है। दूर पेरिस से इतर, इधर दिल्ली में विश्व के चार दर्जन अल्प विकसित देशों को सामूहिक मंच देने के मकसद से हुए भारत प्रवर्तित सम्मेलन का महत्व कम नहीं है जिसमें खाद्यान्न सुरक्षा को बड़ी चुनौती बताते हुए जारी घोषणा पत्र से हमारी वैश्विक सोच और साख को नई मजबूती मिली है। यत्न बरकरार रखा गया तो यह हमारे गुप्त शत्रुओं को तगड़ा जवाब हो सकता है।
Monday, February 21, 2011
भारत का सटीक जवाब
विश्व आर्थिक पटल पर तेजी से उभरते भारत की तरक्की कई देशों को अखरने लगी है। इनमें पारम्परिक रूप से भारत विरोधी देश तो हैं ही, वे देश भी हमसे अपनी जलन नहीं छुपा पा रहे हैं जो विकसित होने का खिताब पहले ही अपने नाम कर चुके हैं। लिहाजा ऐसे देश कभी जलवायु और पर्यावरण संतुलन के नाम पर भारत को घेरने की कोशिश करते हैं तो कहीं उनकी बौखलाहट दुनिया में बढ़ते आर्थिक असंतुलन के नाम पर दिखाई देती है। हालांकि इन देशों को विकास के मसले पर न तो स्वयं के बयानों का कोई ध्यान है और न ही दोहा से लेकर कानकुन तक विश्व व्यापार और पर्यावरण को लेकर अलग-अलग दौर की सामूहिक वार्ताओं तथा सहमतियों का। संतोष इस बात का है कि भारत इन देशों की सभी चालों को समझता लग रहा है और उसने इनका सटीक जवाब देने के लिए जरूरी कदम उठाये हैं। वैश्विक आर्थिक असंतुलन से निपटने के उपायों पर पेरिस में सम्पन्न जी-20 के वित्तमंत्रियों के दो दिवसीय सम्मेलन में वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने साफ तौर पर कहा है कि इस असंतुलन के लिए भारत जिम्मेदार नहीं है। उन्होंने विकसित देशों को आगाह भी किया कि समस्या के हल के लिए सभी को एक ही लाठी से हांकने से काम नहीं चलने वाला। इन देशों (जिनमें चीन भी है) को उन्होंने प्रकारांतर में खबरदार किया कि जी-20 न केवल संकट के समय खड़े होने वाले फोरम बल्कि ढांचागत समस्याओं का हल ढूंढने वाले मंच की भी पहचान न खोये। उल्लेख जरूरी है कि भले चीनी प्रधानमंत्री ने पिछले साल अपने व्यापारिक हितों को साधने की गरज से दिल्ली आकर हमारी किस्सागोई की हो लेकिन अंतराष्ट्रीय मंचों पर चीन हमें घेरने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देने की ही नीति पर चलता है। मुद्दा चाहे सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का हो, या हमारी आर्थिक विकास दर का जो इस माली साल में अभी 8.6 फीसद की दर पर है। दुनिया में पर्यावरण को खतरा विकसित देशों की एकाधिकारवादी औद्योगिक नीतियों से सर्वाधिक बढ़ा है पर वे इसका जिम्मा विकासशील देशों पर थोपकर हमें विकास की उस दौड़ से बाहर कर देना चाहते हैं जिसकी आबादी व संसाधनों की कमी के बरक्स हमें सर्वाधिक जरूरत है। इसके पीछे ‘छद्म शत्रुओं’ की मुख्य चिंता यह है कि यदि हर मामले में हमने संसाधन बना लिये तो विकसित देशों का सारा किया-धरा बेकार जाएगा। अभी जल-थल से लेकर नभ तक सभी जरूरतों के लिए भारत दुनिया में सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है। दूर पेरिस से इतर, इधर दिल्ली में विश्व के चार दर्जन अल्प विकसित देशों को सामूहिक मंच देने के मकसद से हुए भारत प्रवर्तित सम्मेलन का महत्व कम नहीं है जिसमें खाद्यान्न सुरक्षा को बड़ी चुनौती बताते हुए जारी घोषणा पत्र से हमारी वैश्विक सोच और साख को नई मजबूती मिली है। यत्न बरकरार रखा गया तो यह हमारे गुप्त शत्रुओं को तगड़ा जवाब हो सकता है।
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