वैश्विक शक्तियां कूटनीति के क्षेत्र में लगभग हमेशा ही ‘महान खेलों’ का आश्रय लेती हैं, इसलिए उनके बीच घटित हो रही घटनाओं का सही आकलन करना कई बार मुश्किल हो जाता है। पहले भी साम्यवादी सोवियत रूस और पूंजीवादियों के बीच कुछ ऐसा ही ग्रेट गेम चला। मुसोलिनी और हिटलर को भी छुपकर पूंजीवादियों द्वारा साम्यवाद के खात्मे के बाद मदद पहुंचायी गयी लेकिन विश्वयुद्ध में सोवियत संघ रोम-बर्लिन-टोकियो धुरी के खिलाफ पूंजीवादी खेमे में नजर आया। उदारवादी लोकतंत्र के नाम पर शीतयुद्ध के दौर में पश्चिम के उदारवादियों ने लोकतांत्रिक सत्ताओं का तख्तापलट करवाया और सैनिक तानाशाहों को सत्तासीन करा दिया अथवा राजशाही व्यवस्था को संरक्षण प्रदान किया। वैश्विक राजनीति के फलक पर ऐसे बहुत से कारनामें हैं जिनका खुलासा होने पर कई सिद्धांतों और व्यवहारों के बीच खिंची हुई विभाजक रेखाओं का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। आजकल यह ग्रेट गेम अमेरिका और चीन के बीच चलता नजर आ रहा है। इसके अंतिम परिणाम क्या होंगे, यह अभी से कहना मुश्किल है। लेकिन इसका सबसे अधिक प्रभाव दक्षिण एशिया पर पड़ने वाला है इसलिए एशिया के देशों, खासकर भारत को अपने आंख- कान अच्छी तरह से खोलकर रखने चाहिए। वास्तव में यह विषय बड़ा ही भ्रममूलक है कि अमेरिका और चीन के बीच इस समय किस तरह के रिश्ते हैं और इन रिश्तों के भावी परिणाम क्या होंगे। क्या ये रिश्ते कुछ उसी तरह के हैं जिस प्रकार के शीतयुद्ध के दौर में सोवियत संघ और अमेरिका के थे अथवा नहीं। ऐसा लगता है कि अमेरिका इस समय किन्हीं कारणों से वैसे रिश्ते नहीं चाहता। इसका अंदाजा उसके एक दस्तावेज से लगाया जा सकता है। पिछले दिनों अमेरिका द्वारा सैन्य रणनीति का खुलासा किया गया। उसने अपनी नई सैन्य रणनीति के तहत भारत के साथ विस्तृत सैन्य सहयोग और चीन के साथ सकारात्मक, सहयोगात्मक और व्यापक सम्बंध बनाने की नीति की बात कही है। उसकी इस नई राष्ट्रीय सैन्य रणनीति में कहा गया है कि चूंकि एशिया में सैन्य क्षमता बढ़ रही है लिहाजा हम अधिक से अधिक क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को गति देने के नए रास्ते तलाशेंगे। वर्ष 2004 के बाद से अब तक अमेरिकी सैन्य रणनीति में यह पहला परिवर्तन है। यह नीति इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा सकती है क्योंकि एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी के मुताबिक आने वाले समय में एशिया- प्रशांत क्षेत्र अधिक महत्वपूर्ण होगा। उसके अनुसार एशिया में दो उभरती ताकते हैं- भारत और चीन और इनके साथ-साथ क्षेत्रीय स्तर पर ताकतवर देश हैं। इस क्षेत्र में अमेरिकी क्षमताओं का पलायन हो सकता है। इस लिहाज से दक्षिण पूर्व एवं दक्षिण एशिया में नये तरीके से ध्यान देने और संसाधनों के निवेश करने की वकालत भी इस नीतिगत दस्तावेज में की गयी है। दस्तावेज में कहा गया है कि अपनी सामूहिक शक्ति का इस्तेमाल कर हम पूरे क्षेत्र में बहुपक्षीय अभ्यासों की भागीदारी एवं अवसर बढ़ाएंगे। इस रणनीति को सफल बनाने के लिए अमेरिका चीन के साथ गहरा सम्बंध चाहता है ताकि आपसी हित एवं लाभ के क्षेत्र विस्तृत हो सकें लेकिन क्या चीन भी ऐसी मंशा रखता है? क्या चीन अमेरिका के साथ मिलकर समृद्धि का मार्ग तलाशने में रुचि रखता है। चीन के रणनीतिक पक्षों को देखते हुए तो यह बिल्कुल नहीं लगता, खासकर तब जब उसका उद्देश्य एशिया में अमेरिकी प्रभाव को समाप्त करना हो। चीनी रवैया अमेरिकी नीति के उलट दिखायी दे रहा है क्योंकि चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी मानती है कि अमेरिका ‘एंटी चाइना एलायंस’ बना रहा है। गौरतलब है कि कम्युनिस्ट पार्टी की पत्रिका ‘क्यूशी’ ने चीन की आर्थिक हैसियत के प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए सात कदम उठाने की रणनीति का सुझाव दिया है ताकि दक्षिण एशिया में अमेरिका के बढ़ते असर को कम किया जा सके। इसमें कहा गया है कि अमेरिका चीन के पड़ोसी देशों- जापान, वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस, इंडोनेशिया, कोरिया और भारत के साथ मिलकर उसके खिलाफ मोर्चा खोल चुका है। पत्रिका का दावा है कि इन देशों का या तो चीन के साथ युद्ध हो चुका है या फिर हितों को लेकर टकराव है। पत्रिका ने अमेरिका के उन छह कदमों के बारे में बताया है जिनके जरिए वह चीन को रोकना चाहता है। ये कदम हैं-कारोबारी जंग, विनिमय दर को लेकर युद्ध, पब्लिक ओपीनियन वॉर, सैन्य अभ्यास, चीन के खिलाफ अभियान और चीन के पड़ोसी देशों के साथ गठबंधन। इसलिए पत्रिका ने अमेरिका को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए सात कदम उठाने का सुझाव दिया है। इसमें दक्षिण अमेरिका और यूरोप के उन देशों के साथ बेहतर तालमेल कर सैन्य अभ्यास करने का सुझाव दिया गया है जो अमेरिका के ज्यादा करीब नहीं माने जाते हैं। इसके साथ ही चीन यह प्रदर्शन करने की कोशिश भी कर रहा है कि वह किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। पिछले दिनों चीन की कम्युनिस्ट पार्टी सरकार ने कहा कि हमें राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा को सबसे ऊपर रखना होगा। उसका कहना था कि हमारे 23 लाख सैनिक आधुनिक हथियारों से लैस हैं और वे किसी भी क्षेत्रीय सैन्य विवाद से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। चीन के पास अमेरिका के 15 मिलियन सैनिकों के मुकाबले 23 मिलियन सैनिक हैं। पिछले दशक में चीन की सेना को आधुनिक बनाने पर बहुत अधिक खर्च बढ़ा है। यही नहीं, चीन लगातार एशिया की प्रमुख ताकत बनने की ओर अग्रसर है, और उसका प्रमुख उद्देश्य है एशिया में अमेरिकी शक्ति को काउंटर बैलेंस करना तथा भारत को दबाये रखना। कहने का तात्पर्य यह है कि दोनों के मध्य स्थिति जटिल है। लेकिन फिर पीपुल्स डेली की उस टिप्पणी को किस नजरिए से देखा जाए जिसमें कहा गया है कि 21वीं सदी के इस दूसरे दशक की शुरुआत में अमेरिका-चीन की निकटता विश्व को बेहतर बनाने के अनुकूल है। नये विश्व की स्थितियों और नयी चुनौतियों का सामना करने तथा समान हितों के संवर्धन व वृहत उत्तरदायित्वों के निर्वहन के लिए दोनों देश प्रतिबद्ध हैं। क्या वास्तव में सम्बंधों की यह जटिलता किसी ग्रेट गेम का हिस्सा है।
Sunday, February 20, 2011
चीन और अमेरिका का ग्रेट गेम
वैश्विक शक्तियां कूटनीति के क्षेत्र में लगभग हमेशा ही ‘महान खेलों’ का आश्रय लेती हैं, इसलिए उनके बीच घटित हो रही घटनाओं का सही आकलन करना कई बार मुश्किल हो जाता है। पहले भी साम्यवादी सोवियत रूस और पूंजीवादियों के बीच कुछ ऐसा ही ग्रेट गेम चला। मुसोलिनी और हिटलर को भी छुपकर पूंजीवादियों द्वारा साम्यवाद के खात्मे के बाद मदद पहुंचायी गयी लेकिन विश्वयुद्ध में सोवियत संघ रोम-बर्लिन-टोकियो धुरी के खिलाफ पूंजीवादी खेमे में नजर आया। उदारवादी लोकतंत्र के नाम पर शीतयुद्ध के दौर में पश्चिम के उदारवादियों ने लोकतांत्रिक सत्ताओं का तख्तापलट करवाया और सैनिक तानाशाहों को सत्तासीन करा दिया अथवा राजशाही व्यवस्था को संरक्षण प्रदान किया। वैश्विक राजनीति के फलक पर ऐसे बहुत से कारनामें हैं जिनका खुलासा होने पर कई सिद्धांतों और व्यवहारों के बीच खिंची हुई विभाजक रेखाओं का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। आजकल यह ग्रेट गेम अमेरिका और चीन के बीच चलता नजर आ रहा है। इसके अंतिम परिणाम क्या होंगे, यह अभी से कहना मुश्किल है। लेकिन इसका सबसे अधिक प्रभाव दक्षिण एशिया पर पड़ने वाला है इसलिए एशिया के देशों, खासकर भारत को अपने आंख- कान अच्छी तरह से खोलकर रखने चाहिए। वास्तव में यह विषय बड़ा ही भ्रममूलक है कि अमेरिका और चीन के बीच इस समय किस तरह के रिश्ते हैं और इन रिश्तों के भावी परिणाम क्या होंगे। क्या ये रिश्ते कुछ उसी तरह के हैं जिस प्रकार के शीतयुद्ध के दौर में सोवियत संघ और अमेरिका के थे अथवा नहीं। ऐसा लगता है कि अमेरिका इस समय किन्हीं कारणों से वैसे रिश्ते नहीं चाहता। इसका अंदाजा उसके एक दस्तावेज से लगाया जा सकता है। पिछले दिनों अमेरिका द्वारा सैन्य रणनीति का खुलासा किया गया। उसने अपनी नई सैन्य रणनीति के तहत भारत के साथ विस्तृत सैन्य सहयोग और चीन के साथ सकारात्मक, सहयोगात्मक और व्यापक सम्बंध बनाने की नीति की बात कही है। उसकी इस नई राष्ट्रीय सैन्य रणनीति में कहा गया है कि चूंकि एशिया में सैन्य क्षमता बढ़ रही है लिहाजा हम अधिक से अधिक क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग को गति देने के नए रास्ते तलाशेंगे। वर्ष 2004 के बाद से अब तक अमेरिकी सैन्य रणनीति में यह पहला परिवर्तन है। यह नीति इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा सकती है क्योंकि एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी के मुताबिक आने वाले समय में एशिया- प्रशांत क्षेत्र अधिक महत्वपूर्ण होगा। उसके अनुसार एशिया में दो उभरती ताकते हैं- भारत और चीन और इनके साथ-साथ क्षेत्रीय स्तर पर ताकतवर देश हैं। इस क्षेत्र में अमेरिकी क्षमताओं का पलायन हो सकता है। इस लिहाज से दक्षिण पूर्व एवं दक्षिण एशिया में नये तरीके से ध्यान देने और संसाधनों के निवेश करने की वकालत भी इस नीतिगत दस्तावेज में की गयी है। दस्तावेज में कहा गया है कि अपनी सामूहिक शक्ति का इस्तेमाल कर हम पूरे क्षेत्र में बहुपक्षीय अभ्यासों की भागीदारी एवं अवसर बढ़ाएंगे। इस रणनीति को सफल बनाने के लिए अमेरिका चीन के साथ गहरा सम्बंध चाहता है ताकि आपसी हित एवं लाभ के क्षेत्र विस्तृत हो सकें लेकिन क्या चीन भी ऐसी मंशा रखता है? क्या चीन अमेरिका के साथ मिलकर समृद्धि का मार्ग तलाशने में रुचि रखता है। चीन के रणनीतिक पक्षों को देखते हुए तो यह बिल्कुल नहीं लगता, खासकर तब जब उसका उद्देश्य एशिया में अमेरिकी प्रभाव को समाप्त करना हो। चीनी रवैया अमेरिकी नीति के उलट दिखायी दे रहा है क्योंकि चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी मानती है कि अमेरिका ‘एंटी चाइना एलायंस’ बना रहा है। गौरतलब है कि कम्युनिस्ट पार्टी की पत्रिका ‘क्यूशी’ ने चीन की आर्थिक हैसियत के प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए सात कदम उठाने की रणनीति का सुझाव दिया है ताकि दक्षिण एशिया में अमेरिका के बढ़ते असर को कम किया जा सके। इसमें कहा गया है कि अमेरिका चीन के पड़ोसी देशों- जापान, वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस, इंडोनेशिया, कोरिया और भारत के साथ मिलकर उसके खिलाफ मोर्चा खोल चुका है। पत्रिका का दावा है कि इन देशों का या तो चीन के साथ युद्ध हो चुका है या फिर हितों को लेकर टकराव है। पत्रिका ने अमेरिका के उन छह कदमों के बारे में बताया है जिनके जरिए वह चीन को रोकना चाहता है। ये कदम हैं-कारोबारी जंग, विनिमय दर को लेकर युद्ध, पब्लिक ओपीनियन वॉर, सैन्य अभ्यास, चीन के खिलाफ अभियान और चीन के पड़ोसी देशों के साथ गठबंधन। इसलिए पत्रिका ने अमेरिका को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए सात कदम उठाने का सुझाव दिया है। इसमें दक्षिण अमेरिका और यूरोप के उन देशों के साथ बेहतर तालमेल कर सैन्य अभ्यास करने का सुझाव दिया गया है जो अमेरिका के ज्यादा करीब नहीं माने जाते हैं। इसके साथ ही चीन यह प्रदर्शन करने की कोशिश भी कर रहा है कि वह किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। पिछले दिनों चीन की कम्युनिस्ट पार्टी सरकार ने कहा कि हमें राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा को सबसे ऊपर रखना होगा। उसका कहना था कि हमारे 23 लाख सैनिक आधुनिक हथियारों से लैस हैं और वे किसी भी क्षेत्रीय सैन्य विवाद से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। चीन के पास अमेरिका के 15 मिलियन सैनिकों के मुकाबले 23 मिलियन सैनिक हैं। पिछले दशक में चीन की सेना को आधुनिक बनाने पर बहुत अधिक खर्च बढ़ा है। यही नहीं, चीन लगातार एशिया की प्रमुख ताकत बनने की ओर अग्रसर है, और उसका प्रमुख उद्देश्य है एशिया में अमेरिकी शक्ति को काउंटर बैलेंस करना तथा भारत को दबाये रखना। कहने का तात्पर्य यह है कि दोनों के मध्य स्थिति जटिल है। लेकिन फिर पीपुल्स डेली की उस टिप्पणी को किस नजरिए से देखा जाए जिसमें कहा गया है कि 21वीं सदी के इस दूसरे दशक की शुरुआत में अमेरिका-चीन की निकटता विश्व को बेहतर बनाने के अनुकूल है। नये विश्व की स्थितियों और नयी चुनौतियों का सामना करने तथा समान हितों के संवर्धन व वृहत उत्तरदायित्वों के निर्वहन के लिए दोनों देश प्रतिबद्ध हैं। क्या वास्तव में सम्बंधों की यह जटिलता किसी ग्रेट गेम का हिस्सा है।
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