Thursday, February 17, 2011

मिस्र संकट से अर्थव्यवस्थाओं पर खतरे


नई वैश्विक आर्थिक चिंताओं से बचने के लिए एक ओर विश्व के प्रभावशाली देश मुबारक पर सत्ता सौंपने की शांतिपूर्वक प्रक्रिया शुरू करने का दबाव बनाएं वहीं दूसरी ओर विश्व आर्थिक मंच के तहत वित्तीय क्षेत्र के सुधार पर ध्यान देकर ऐसी एक मजबूत व्यवस्था तैयार की जाए, जो विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं की आवश्यकताओं को भी ठीक ढंग से समझ सके और इन देशों में गरीबी, बेकारी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं के समाधान के लिए कारगर प्रयास करे। जी-20 समूह को भी वैश्विक आर्थिक चिंताओं को रोकने के लिए विकासशील देशों में गरीबी, बेकारी और भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए अपनी नई भू्मिका निभानी होगी
इन दिनों मिस्र में सत्ता परिवर्तन की मांग को लेकर चलाए जा रहे विशाल जनआंदोलन और राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के द्वारा तुरंत सत्ता छोड़ने से इंकार के कारण वैश्विक आर्थिक परिदृश्य चिंताजनक हो गया है। इससे भारत और दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित हो रही हैं। मिस्र में स्थित भारत और दुनिया के कई देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपनी औद्योगिक इकाइयों में उत्पादन कार्य रोक दिया है। इनमें से अनेक कंपनियों ने पश्चिमी एशियाई देशों के लिए नई कारोबारी योजनाएं बनानी शुरू कर दी हैं।
बिगड़ेगा तेल का खेल
यद्यपि मिस्र दुनिया का प्रमुख तेल उत्पादक देश नहीं है, लेकिन इसके निकटवर्ती तेल उत्पादक राष्ट्रों में भी शासकों के खिलाफ मिस्र की तरह का विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है। लिहाजा तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और पश्चिम एशिया से आने वाले तेल पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं क्योंकि तेल मार्ग मिस्र के रास्ते से ही गुजरते हैं। स्वेज नहर और स्वेज-भूमध्य पाइप लाइन पर मिस्र का नियंतण्रहै। 192 किलोमीटर लंबे स्वेज नहर मार्ग पर रोजाना 20 लाख बैरल कच्चे तेल की आवाजाही होती है। मिस्र संकट से कच्चे तेल की ऐसी आवाजाही असामान्य होने की आशंका बढ़ गई है। इसी के मद्देनजर कच्चे तेल का मूल्य एक अक्टूबर 2008 के बाद पहली बार फरवरी, 2011 के पहले सप्ताह में उच्चतम स्तर 103 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी इस आशंका में भी हुई कि पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में अस्थिरता फैल सकती है। इन दोनों इलाकों में कुल वैश्विक तेल उत्पादन का एक तिहाई उत्पादित होता है।
भारत के लगे हैं बड़े दाव
गौरतलब है कि अमेरिका, इटली और सऊदी अरब के बाद मिस्र भारत का चौथा सबसे बड़ा व्यापार सहयोगी है। भारत के द्वारा मिस्र को मुख्यत: इस्पात, जूट, प्लास्टिक, रबड़, इंजीनियरिंग के सामान, कृषि उपकरण, सूचना तकनीक तथा रसायनों का निर्यात किया जाता है। जबकि भारत मिस्र से पेट्रोलियम और गैस का आयात करता है। भारत से मिस्र को करीब एक अरब 40 करोड़ डॉलर मूल्य का सालाना निर्यात किया जाता है। इसके साथ-साथ भारत मिस्र में 12वां सबसे बड़ा निवेशक है तथा भारत ने मिश्र में 750 मिलियन डॉलर से भी ज्यादा मूल्य का निवेश किया हुआ है।
डांवाडोल होते शेयर बाजार
मिस्र सत्तर के दशक से ही मध्य पूर्व एशिया में अमेरिका का घनिष्ठ सहयोगी रहा है। मौजूदा समय में इस्रइल के बाद मिस्र को ही अमेरिका से सबसे ज्यादा विदेशी मदद मिलती है और दुनिया के कई देश मिस्र के आर्थिक सहयोगी हैं। ऐसे में मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के खिलाफ भड़की विरोध की लपटों ने उभरते देशों के शेयर बाजारों को अपनी चपेट में ले लिया है। दरअसल निवेशकों को इस बात की चिंता सता रही है कि इस राजनीतिक संकट का असर मध्य एशिया और तेल की बढ़ती कीमतों पर पड़ रहा है। ऐसे में निवेशक जोखिम वाले बाजारों से निकलकर पारंपरिक तौर पर सुरक्षित माने-जाने वाले निवेश मसलन बहुमूल्य धातु और अमेरिकी ट्रेजरी का रुख कर रहे हैं।
महंगाई में हो सकता है इजाफा
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि स्वेज नहर बाधित होने के कारण भारतीय निर्यात बुरी तरह प्रभावित होंगे। यूरोप और पूर्वी अमेरिका से साथ भारत का विदेश व्यापार स्वेज नहर के जरिए होता है। स्वेज नहर बंद होने पर जहाजों को दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन से होकर गुजरना होगा। इससे माल की पहुंच में 15 से 20 दिन अधिक लगेंगे और मालभाड़े में भी वृद्धि होगी। इतना ही नहीं केपटाउन से गुजरने के कारण जहाजों के लिए सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ाना होगी। ऐसी स्थिति में कुछ निर्यात आदेश भी रद्द हो सकते हैं। कुल भारतीय निर्यात का 5वां हिस्सा स्वेज नहर से गुजरता है इसलिए स्वेज नहर के बाधित होने से करीब 40 अरब डॉलर का भारतीय निर्यात प्रभावित होगा। भारत का शेयर बाजार मिस्र संकट से और अधिक प्रभावित हो सकता है। आर्थिक विशेषज्ञ यह भी मान रहे हैं कि भारत में वैश्विक निवेशकों ने जनवरी 2011 में महंगाई से जुड़ी चिंता के कारण भारतीय शेयर बाजार से 5,500 करोड़ रुपए निकाले थे। ऐसे में यदि मिस्र संकट जारी रहा तो ये निवेशक भारतीय शेयर बाजार से रुपए और निकाल सकते हैं। मिस्र में उथलपुथल जैसी नकारात्मक खबरों से भारत में पहले ही बढ़ी हुई महंगाई दर और बढ़ जाने की आशंका है।
सरकारों के लिए संकट का सबब
स्थिति यह है कि मिस्र संकट के कारण दुनिया के अनेक देश एक बार फिर आर्थिक मंदी की वापसी से चिंतित हो गए हैं। वस्तुत: विश्व आर्थिक मंच की जनवरी 2011 में आयोजित 41वीं सालाना बैठक में भी यह स्वीकार किया गया है कि अभी भी दुनिया 2008 के वित्तीय संकट से पूरी तरह उबर नहीं पायी है। यूरोप के कई देश अभी भी सरकारी कर्ज के बोझ से जूझ रहे हैं। यूनान, पुर्तगाल और स्पेन की सरकारें भारी सरकारी आर्थिक संकट का सामना कर रही हैं। यह संकट केवल यूरोप तक सीमित नहीं है। इस संकट से एक बार फिर अमेरिका का आवासीय बाजार बुरी तरह लुढ़क गया है। अमेरिका में नौकरियों की स्थिति खराब बनी हुई है। ऐसे में अब यह साफ-साफ समझा जाना होगा कि जिस तरह मिस्र में राष्ट्रपति मुबारक के खिलाफ बढ़ती बेरोजगारी, बढ़ती गरीबी और बढ़ता भ्रष्टाचार जनआंदोलन के प्रमुख कारण हैं, वे ही कारण दुनिया के कई देशों की सरकारों को डगमग करते हुए दिखाई दे सकते हैं।
करने होंगे निरोधात्मक उपाय
अर्थ विशेषज्ञों का कहना है कि मिस्र के नए संकट से मंदी के प्रभाव से मुक्त होती हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था को फिर से चिंताजनक स्थिति में जाने से रोकने के लिए कई बातों पर ध्यान देने होगा। यह जरूरी है नई वैश्विक आर्थिक चिंताओं से बचने के लिए एक ओर विश्व के प्रभावशाली देश मुबारक पर सत्ता सौंपने की शांतिपूर्वक प्रक्रिया शुरू करने का दबाव बनाएं वहीं दूसरी ओर विश्व आर्थिक मंच के तहत वित्तीय क्षेत्र के सुधार पर ध्यान देकर ऐसी एक मजबूत व्यवस्था तैयार की जाए, जो विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं की आवश्यकताओं को भी ठीक ढंग से समझ सके और इन देशों में गरीबी, बेकारी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं के समाधान के लिए कारगर प्रयास करे। जी-20 समूह को भी वैश्विक आर्थिक चिंताओं को रोकने के लिए विकासशील देशों में गरीबी, बेकारी और भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए अपनी नई भू्मिका निभानी होगी। यह भी उपयुक्त होगा कि ओपेक (ऑग्रेनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिग कन्ट्रीज) संगठन तेल बाजारों पर सतर्क निगाह रखकर तेल मूल्यों की सट्टेबाजी को रोकें।
वैश्विक संगठनों के सक्रियता की दरकार
अंत में यहां यह कहा जाना उपयुक्त होगा कि मिस्र के राजनीतिक संकट का हल न केवल मिस्र के लिए वरन पूरी दुनिया की आर्थिक खुशहाली बनाए रखने के लिए जरूरी है। ऐसे में दुनिया के वैश्विक संगठनों और अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन और भारत सहित दुनिया के प्रभावपूर्ण देशों के द्वारा मिस्र के गृहयुद्ध को रोकने और लोगों को लोकतांत्रिक हक दिलाने के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता से प्रयास करने होंगे। हम आशा करें कि आने वाले दिनों में मिस्र की सड़कों पर प्रदर्शित हो रहे जनविद्रोह से जन्म लेने वाला मुबारक का उत्तराधिकारी अपनी नई नीतियों से न केवल मिस्र की वरन पूरी अरबी दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक तस्वीर बदलते हुए दिखाई देगा।

No comments:

Post a Comment