निस्संदेह अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा हैरतजदा होंगे कि जिन पाकिस्तानी नेताओं को कोई अमेरिकी अधिकारी अगर सिर्फ झुकने को कहता है तो वे दंडवत कर देते हैं, आज वही नेता अमेरिकी सरकार की डांट-डपट के बावजूद नाफरमानी पर आमादा हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया कि अमेरिकी आर्थिक सहायता के बलबूते अपनी सरकार चलाने वाले पाकिस्तानी हुक्मरान अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों में आ रही कड़वाहट की जरा भी परवाह नहीं कर रहे हैं? दरअसल, दोनों देशों के बिगड़ते संबंधों की सबसे बड़ी वजह है अमेरिकी नागरिक रेमंड डेविस, जो पाकिस्तान में अमेरिकी दूतावास में कार्यरत हैं। डेविस ने जनवरी के अंत में लाहौर में दो युवकों की गोली मारकर हत्या कर दी थी। डेविस की दलील है कि उसने आत्मरक्षा के लिए दोनों युवकों पर गोली चलाई। बात तब और बिगड़ गई जब डेविस की मदद के लिए आई अमेरिकी दूतावास की गाड़ी से कुचल कर एक अन्य व्यक्ति की मौत हो गई। डेविस की गिरफ्तारी से उपजे विवाद ने न केवल अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों को पटरी से उतार दिया है, बल्कि पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में भी उथल-पुथल मचा दी है। अपने राजनयिक की गिरफ्तारी से तमतमाया अमेरिका हरसंभव दबाव बना रहा है, जिसके आगे झुककर पाकिस्तान सरकार डेविस को तुरंत रिहा कर दे। अमेरिका का कहना है कि डेविस को राजनयिक का दर्जा होने के नाते कूटनीतिक उन्मुक्तता हासिल है, जबकि पाकिस्तान का जवाब यह है कि यह निर्णय पाकिस्तानी अदालत करेगी कि डेविस को कूटनीतिक उन्मुक्तता हासिल है या नहीं। यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान में अमेरिका विरोधी भावना सिर चढ़ कर बोल रही है। अमेरिकी ड्रोन विमान पाकिस्तान के कबायली इलाकों में आए दिन आतंकियों को निशाना बना रहे हैं, जो कट्टरपंथी तत्वों को पसंद नहीं आ रहा है। ये खबरें भी पाकिस्तानी मीडिया की सुर्खियां बनती रहती हैं कि अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सीआइए और अन्य निजी सुरक्षा एजेंसियों के एजेंट पाकिस्तानी शहरों में गुपचुप तरीके से अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। डेविस मामले ने आग में घी डालने का काम किया ही है। इस्लामाबाद स्थित अमेरिकी दूतावास में डेविस के कामकाज की प्रकृति के बारे में अस्पष्टता और अनिश्चितता ने भी मामले को और उलझा दिया है। कभी उसे सीआइए के लिए अनुबंध पर कार्यरत बताया जाता है, जिसे अमेरिकी दूतावास के अधिकारियों की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया था, कभी यह दावा किया जाता है कि डेविस अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज का एक पूर्व सदस्य है, जो विवादास्पद निजी सुरक्षा एजेंसी ब्लैकवाटर के लिए कार्य कर चुका है। दरअसल, डेविस की असली पहचान को लेकर पाकिस्तान में अफवाहों का बाजार गर्म है। मारे गए एक युवक की विधवा द्वारा जहर खाकर आत्महत्या करने से मामला और पेचीदा हो गया है। अमेरिका विरोधी वर्ग इस बात को लेकर आंदोलित है कि अमेरिका ने मारे गए लोगों और आत्महत्या कर चुकी एक विधवा के प्रति हमदर्दी जताने के बजाय डेविस की कूटनीतिक उन्मुक्तता का राग अलाप कर जले पर नमक छिड़का है। अमेरिका विरोधियों का सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि डेविस को पाकिस्तान में ही फांसी पर लटकाया जाए। इसे हास्यास्पद कहा जाए या शर्मनाक कि कट्टरपंथी संगठनों ने, जो खुद को पाकिस्तान की राष्ट्रीय अस्मिता का रक्षक मानते हैं, डेविस को तो तुरंत फांसी पर लटकाने की मांग की है, लेकिन उनकी नजरों में सलमान तासीर का हत्यारा सजा नहीं, बल्कि सराहना के काबिल है। बहरहाल, डेविस की रिहाई को ओबामा प्रशासन ने अपनी नाक का सवाल बना लिया है। अमेरिका टस से मस होने को तैयार नहीं है। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने कुछ दिन पहले म्युनिख में पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी से प्रस्तावित बैठक निरस्त कर दी। अमेरिकी सांसदों ने धमकी दे डाली कि अगर डेविस को रिहा नहीं किया गया तो पाकिस्तान को मिलने वाली भारी-भरकम आर्थिक सहायता पर रोक लगा दी जाएगी। अमेरिकी में पाकिस्तान के राजदूत हुसैन हक्कानी को अमेरिका से बाहर फेंकने की धमकी दे दी गई। जब इतने दबाव से भी कोई असर नहीं हुआ तो प्रभावशाली सीनेटर जॉन कैरी ने इस्लामाबाद आकर डेविस का जोरदार बचाव किया। कैरी ने साफ कर दिया कि डेविस को हासिल कूटनीतिक उन्मुक्तता पर पाकिस्तानी अदालतें कोई फैसला नहीं कर सकतीं। आखिर में राष्ट्रपति ओबामा को सार्वजनिक रूप से यह कहना पड़ गया कि डेविस को तो रिहा करना ही होगा। राष्ट्रपति जरदारी और प्रधानमंत्री गिलानी भी करें तो क्या करें? गौरतलब है कि पाक सरकार की सेहत खस्ताहाल है। सरकार और विपक्ष में ठनी हुई है, कट्टरपंथी दल रोज अपनी ताकत सड़कों पर दिखा रहे हैं और फौज तो पहले से ही बेकाबू है। ऐसे में रेमंड डेविस विवाद जितना उलझेगा, राष्ट्रपति जरदारी की मुश्किलें उतनी ही बढ़ेंगी। विवाद ने सत्तारूढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) की आंतरिक राजनीति को भी गरमा दिया है। शाह महमूद कुरैशी को विदेश मंत्रालय से चलता कर दिया गया, क्योंकि उन्होंने पीपीपी के आधिकारिक रुख से अलग रवैया अख्यियार कर डेविस को राजनयिक छूट देने का विरोध किया था। डेविस मुद्दे पर कुरैशी की सार्वजनिक बयानबाजी से जहां एक ओर गिलानी सरकार की किरकिरी हो रही है, वहीं दूसरी ओर कुरैशी को मीडिया का एक वर्ग ऐसे नायक के तौर पर पेश कर रहा है, जिसने अमेरिकी धमकियों के आगे घुटने नहीं टेके। डेविस को राजनयिक दर्जा प्राप्त है या नहीं, इस बारे में न तो विदेश मंत्रालय और न ही सरकार का कोई प्रतिनिधि कुछ बोलने को तैयार है। पीपीपी की प्रवक्ता फौजिया वहाब ने डेविस को छूट हासिल होने की बात कह तो दी, लेकिन इसके बाद उन पर इतना दबाव पड़ा कि उन्हें इस्तीफा देना पड़ गया। तालिबान ने यह धमकी देकर पाकिस्तान सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी है कि जो भी डेविस की रिहाई में मददगार बनेगा, उसे जान से मार दिया जाएगा। जाहिर है कि रेमंड डेविस पाकिस्तानी सरकार के गले की फांस बन चुका है। नेशनल असेंबली में प्रधानमंत्री गिलानी ने यह उम्मीद जताई कि अमेरिका और पाकिस्तान दोनों ही देश डेविस केस को अपने आपसी रिश्तों के बीच दीवार नहीं बनने देंगे, लेकिन गिलानी को यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका कभी भी पाकिस्तान के साथ रिश्ते मधुर बनाने के लिए डेविस की बलि नहीं देगा। दास्तान-ए-डेविस में कितने ही मोड़ क्यों न आएं, लेकिन इसका अंत तो उनकी रिहाई से ही होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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