अरब राज्यों ने अपनी जनता के साथ अच्छा सुलूक नहीं किया है। तेल से मालामाल राज्यों तक ने लोगों को शिक्षित नहीं किया है और सबके लिए सामाजिक अवसर पैदा नहीं किए हैं। बहुत-सी सरकारों ने विश्व बैंक या पश्चिमी दानदाताओं के दबाव में सादगी कार्यक्रम अपनाए हैं। उन्होंने खाद्य और ईधन सब्सिडियों में और कटौतियां कर दी हैं, जिनसे लोगों की मुसीबतें बहुत बढ़ गई हैं। इससे इन राज्यों के बने रहने का बचा खुचा औचित्य भी समाप्त हो गया है। ज्यादातर नौ जवान मामूली तौर पर पढ़ेिलखे हैं पर उनको दुनिया की जानकारी है और वे आधुनिक अर्थव्यवस्था में काम करना चाहते हैं। पर वहां ऐसी नौकरियों की बे हद कमी है। नौजवानों का कोई भविष्य नहीं है। नागरिक-राजनीतिक स्वतंत्रता के अभाव में उनकी कुंठाएं और बढ़ गई हैं
जिस सुगंधित क्रांति ने ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति जिने अल अबादीन बेन को गद्दी से उतार फेंका, उसकी महक दूसरे अरब मुल्कों खास तौर पर मिस्र, यमन, जॉर्डन और लीबिया में भी फैलती जा रही है और पश्चिम एशिया तथा उत्तर अफ्रीका में जबर्दस्त राजनीतिक परिवर्तनों की शुरुआत कर रही है। हो सकता है मिस्र में होस्नी मुबारक के 30 साल लंबे अत्याचारी राज का अंत हो जाए और पड़ोस में परिवर्तनों की शुरूआत होने लगे। एक करोड़ 10 लाख की आबादी वाले ट्यूनीशिया की जेसमीन क्रांति की अहमियत किसी रूप में कम नहीं। 29 दिन के जिस विद्रोह ने बेन अली का तख्ता पलट दिया था वह अरब जगत की पहली वास्तविक क्रांति है। विद्रोहों, कर्नली इंकलाबों और दूसरी तरह के सत्ता परिवर्तनों को गलत ढंग से परिभाषित कर क्रांति का नाम दिया गया था। इसके ठीक विपरीत यह असल जन-विद्रोह है।
तानाशाहों से पीड़ित
आठ करोड़ की आबादी वाला मिस्र इस क्षेत्र का सबसे बड़ा देश है और यहां होने वाले परिवर्तन अरब जगत पर असर डालते रहे हैं या भावी परिवर्तनों की रूपरेखा बनाते रहे हैं। ट्यूनीशिया से उठी और एक टीवी चैनल अल-जजीरा के जरिए मिस्र पहुंची भूकंपीय लहरों की सबसे ज्यादा गूंज काहिरा में सुनाई दी। लेकिन उन्होंने कई दूसरी तानाशाहियों को भी हिला दिया है। इन घटनाओं से अरब के ज्यादातर नेताओं की नींद उड़ गई होगी कि इनसे प्रेरित होकर उनके अपने लोग भी उठ खड़े हो सकते हैं। इस आशंका को सबसे अच्छे ढंग से अभिव्यक्त किया है, दुनिया के सबसे ज्यादा समय तक राज करने वाले तानाशाह-लीबिया के कर्नल गद्दाफी ने। उसने ट्यूनीशिया के लोगों से यह कहने की जुर्रत की ‘उनके देश में खून-खराबा और अराजकता इसलिए फैल गई है क्योंकि उन्होंने बेन अली को गद्दी से बहुत जल्दी हटा दिया।’ पर इन विरोध प्रदर्शनों को अरब दुनिया के आम नागरिकों ने आशा के साथ देखा है। ये साधारण लोग हैं, विदेशी फौजी नहीं। अरब लीग का गठन करने वाले 22 मुल्कों में से ज्यादातर लोग ट्यूनीशिया और मिस्रवासियों की तरह भ्रष्ट तानाशाह शासकों से दुखी हैं। यह तानाशाही हुकूमत आम लोगों को न तो मूलभूत नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराती है न ही अनाज की कमी और महंगाई से कोई राहत दिलाती है।
नौजवान भविष्य को लेकर कुंठित
अरब राज्यों ने अपनी जनता के साथ अच्छा सुलूक नहीं किया है। तेल से मालामाल राज्यों तक ने अपने लोगों को शिक्षित नहीं किया है और सबके लिए सामाजिक अवसर पैदा नहीं किए हैं। बहुत-सी सरकारों ने विश्व बैंक या पश्चिमी दानदाताओं के दबाव में सादगी कार्यक्रम अपनाए हैं। उन्होंने खाद्य और ईधन सब्सिडियों में और कटौतियां कर दी हैं, जिनसे लोगों की मुसीबतें बहुत बढ़ गई हैं। इससे इनके बने रहने का बचा खुचा औचित्य भी समाप्त हो गया है। ज्यादातर अरब नौजवान मामूली तौर पर पढ़ेिलखे हैं पर उनको दुनिया की जानकारी है और वे आधुनिक अर्थव्यवस्था में काम करना चाहते हैं। पर वहां नौकरियों की बेहद कमी है। नौजवानों का कोई भविष्य नहीं है। नागरिक और राजनीतिक स्वतंत्रता के अभाव में उनकी कुंठाएं और बढ़ गई हैं।
अरब र्वल्ड में जनतंत्र की कमी
ऐसे में मिस्र जैसा जन-उभार दूसरे अरब देशों में भी आ सकता है। इनके लोगों का दबा हुआ गुस्सा और उनकी परेशानियां तथा आजादी की कमी भी वैसी ही है। एक विद्वान दिवंगत फ्रेड हालीडे ने अपनी रचना ‘अरेबिक विदाउट दि शेख’ में अरब लोगों के दुख ददरे का विश्लेषण किया है। अपनी हालिया पुस्तकों में दिलीप हीरो ने भी यही किया है। अरब दुनिया में जनतंत्र की बहुत कमी है। चुनाव, यदि कभी कभार होते भी हैं, तो उनमें जमकर धांधली होती है, जैसा कि हाल में मिस्र में हुआ था। इनमें शासक दल ने अपने बहुमत को 75 से बढ़ाकर 95 फीसद कर लिया था।
लेबनान, फिलीस्तीन, इराक में सीमित जनतंत्र
एक हद तक जनतांत्रिक होने का दावा सिर्फ तीन अरब देश- लेबनान, फिलिस्तीन और इराक कर सकते हैं। शिया, सुन्नी, ईसाई और डूज मुस्लिमों के साथ लेबनान एक बहुधर्मी समाज हैं। यहां स्वतंत्र चुनाव होते हैं परंतु यहां भी सर्वोच्च अधिकारियों के धार्मिक समुदायों तथा प्रभावशाली परिवारों में बंटे रहने के चलते जनतंत्र की प्रकृति सांप्रदायिक है। फिलिस्तीनी इलाकों में 2006 में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हुए थे लेकिन बहुमत हासिल करने वाले हमास को पश्चिमी किनारे और येरुशलम में सरकार बनाने से अलग रखा गया। इसकी ताकत गाजा पट्टी तक ही सीमित है जो इस्रइली अधिपत्य में एक खुली जेल है और जिसकी अपनी सीमाओं और वायु सीमाओं पर हमास का कोई अधिकार नहीं है। 2003 के हमले के बाद इराक में जनतंत्र की प्रक्रिया अमेरिका द्वारा निर्देशित संविधान और नीतिगत ढांचे के अंतर्गत चलती है। पर इराकी जनतंत्र विभिन्न धार्मिक एवं जातीय समूहों के बीच सत्ता विभाजन के खेल में फंसा है। बाकी अरब राज्यों, जैसे कुवैत की निर्वाचित विधायिका लकवाग्रस्त है। इसको बहुत कम अधिकार मिले हैं और वे भी इसके शासक खानदानों की इच्छा पर निर्भर हैं। यहां चुनाव अक्सर ही जन-असंतोष की हवा निकालने के वाल्व के तौर पर कराए जाते हैं। जनतंत्र के संकेतकों में कुछ बीच के देश हैं, जैसे मोरक्को, जॉर्डन, बहरीन और अल्जीरिया, लेकिन सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान और कतर जैसे सबसे अमीर मुल्क तथा लीबिया, यमन और सूडान सबसे निचले पायदान पर हैं। ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा पैदा किया गया सऊदी अरब सबसे पिछड़े कबीलों पर टिका है जिस पर बेलगाम शाही खानदान का राज है।
पेट्रो डॉलर ने जन-भागीदारी को कमजोर किया
इसके पीछे कई कारण हैं जिसमें यूरोपियन साम्राज्यवादियों द्वारा पश्चिम-एशिया और उत्तरी अफ्रीका को तबाह करना शामिल है। इन्होंने नकली राज्यों में कबीलावाद और पैतृकवाद को; रेगिस्तानी इस्लाम की पिछड़ी प्रकृति, खासतौर पर अति रूढ़िवादी राज्यों द्वारा प्रचलित सलाफीवाद को जन्म दिया था जिसने रहस्यवादी परंपराओं का पोषण किया और तेल से आसान पैसे का बुरा असर भी इसी की देन है जो जन- भागीदारी को गैर-जरूरी बना देता है। इसके अलावा राज्य अमीरों से कर वसूल करने और राजनीति पर उनका कब्जा तोड़ने और मिस्र जैसे देश में तो विदेशी सहायता पर निर्भरता को समाप्त करने में असफल रहा है।
अमेरिका की अगुआई में पश्चिमी ताकतों ने अरब के तानाशाही शासकों को अपने संकीर्ण, मूलत: शीतयुद्ध संबंधी स्वार्थो के चलते जीवित रखा था और तब से अपने सामरिक सहयोगियों के एक अंग के तौर पर बनाए रखा है, जिसमें केंद्रीय भूमिका इस्रइल की है और महत्व की दृष्टि से इसके बाद सऊदी अरब, मिस्र और बहरीन की। अमेरिका ने होस्नी मुबारक पर तब से भरोसा किया है जब अनवर सादात ने इस्रइल के साथ सुलह करके अरब जगत में इसके अकेलेपन को तोड़ने में मदद की थी।
मिस्र उस मॉडल की मिसाल है जिसकी नकल जन-उभार की स्थिति में अरब के दूसरे अन्य शासक कर सकते हैं। राष्ट्रपति मुबारक ने अपने मंत्रिमंडल को समाप्त करके एक भूतपूर्व गुप्तचर प्रमुख ओमर सुलेमान को इस आशा में उप राष्ट्रपति बना दिया कि इससे विरोध करने वाले शांत हो जाएंगे लेकिन इससे जनता और भी भड़क गई जिसका नेतृत्व नारे लगाते नौजवान कर रहे थे ‘हमें नहीं चाहिए नया मंत्रिमंडल। हम तुमको बाहर देखना चाहते हैं। होस्नी मुबारक, ओमर सुलेमान- तुम दोनों अमेरिकी दलाल हो।’
ओमर सुलेमान अमेरिका के भरोसेमंद दोस्त हैं और लंबे समय से सीआईए के सहयोगी हैं। उन्होंने ही तीसरी दुनिया में आतंकवाद के संदेहियों की ‘व्याख्या’ की बदनाम नीति को लागू किया था ताकि उनको सताकर अपराध स्वीकार कराया जा सके। लंबे अर्से तक मुबारक और वाशिंगटन के बीच मुख्य कड़ी रहे सुलेमान यातना के निर्मम प्रतिपादक माने जाते हैं और मिस्र इसके लिए बदनाम रहा है।
जनता का गुस्सा बुनियादी तौर पर मुबारक राजवंश, पुलिस बर्बरता, व्यापक निर्धनता, मकानों की कमी, खाद्य पदार्थो की महंगाई और बेरोजगारी के विरोध में है। मिस्र की लगभग दो तिहाई आबादी की उम्र तीस साल से कम है जिनमें से 90 फीसद के आसपास बेरोजगार हैं।
संकट में पश्चिमी देश
पश्चिमी ताकतों और इस्रइल के लिए इसका क्या अर्थ है? दरअसल, पश्चिम धर्म संकट में है। अगर वह मुबारक से दूरी बनाता है, तो यह दूसरे अरब राज्यों में विरोध प्रदर्शन उकसाने और विस्फोटक क्षेत्र में और अस्थिरता पैदा करने का जोखिम लेना है, जिसमें तेल और गैस पर उसका बड़ा दांव लगा है और अगर वह मुबारक का समर्थन करता है, जो इस क्षेत्र में उसके सबसे वफादार सहयोगी और इस्रइल के सबसे नजदीकी दोस्त हैं, तो यह आम लोगों की वैसे ही स्थाई शत्रुता को न्योता देता है जैसा 1979 में पश्चिम ने ईरान में अलोकप्रिय शाह को समर्थन देकर किया था। ऐसे में दूसरा विकल्प आत्मघाती होगा। वाशिंगटन के सामने धर्मसंकट बहुत गहरा है। अमेरिकी सरकार यह प्रमाण पत्र देने कि मिस्र सरकार स्थिर है और लोगों की न्यायोचित आवश्यकताएं तथा हितों को पूरा करने का रास्ते देख रही है, और मिस्र में एक सुव्यवस्थित संक्रमण जिसका अर्थ है मुबारक की विदाई, के बीच झूल रही है। पश्चिम एशिया-उत्तरी अफ्रीका के लिए अमेरिका के पास अब कोई सुसंगत रणनीति नहीं है। मिस्र पर इस्रइल की भी नजर जमी है। उसे अपने एक नजदीकी दोस्त को खो देने की चिंता है जिसका सहयोग न केवल गाजा में यथास्थिति बल्कि अरब जगत में विभाजन बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है। इसको डर है कि अरब स्ट्रीट का आमूल जनतंत्रीकरण फिलिस्तीन के मसले को फिर सामने ला देगा और इस्रइल के खिलाफ बैर-भाव तेज कर देगा। इससे उल्लेखनीय रूप से सफल वह रणनीति पटरी से उतर सकती है जो फिलिस्तीनी नेतृत्व पर दबाव डालती है कि वह सार्वभौम राज्य और धरती के अपने बुनियादी दावे को छोड़ दे। स्थिति के गर्भ में बड़ी संभावनाएं छिपी हैं।
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