विवादित गिलगित-बास्टिस्तानक्षेत्र में बढ़ती चीनी गतिविधियों के चलते भारत-चीन संबंध के लिए खतरे की घंटी के साथ ही इस क्षेत्र की शांति पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर इंटरनेशनल पॉलिसी के कार्यकारी निदेशक सेलिग हैरिसन ने कहा, मेरे दृष्टिकोण से यह चिंतित करने वाली गतिविधि है, जिससे भारत और चीन के बीच संबंधों पर असर पड़ने के साथ ही एशिया में शांति पर भी असर पड़ेगा। पिछले साल द न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित आलेख में हैरिसन ने कहा था कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के कम से कम 7,000 जवान गिलगित-बाल्टिस्तान की सीमा पर कुंजराग दर्रे पर काराकोरम राजमार्ग निर्माण के लिए लगे कर्मचारियों की रक्षा के लिए तैनात थे। हैरिसन, जॉन हॉपकिंस स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज की साउथ एशिया स्टडीज प्रोगाम द्वारा आयोजित गिलगित-बाल्टिस्तान में चीन की बढ़ती उपस्थिति विषय पर सम्मेलन में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। उनकी बातों पर हेरिटेज फाउंडेशन की लिजा कर्टिस ने कहा कि यह अभी कहना जल्दबाजी होगा कि चीन गिलगित और बाल्टिस्तान पर अधिकार स्थापित करना चाहता है। हैरिसन ने कहा कि चीन पाकिस्तान के माध्यम से आर्थिक संबंध बढ़ाना चाहता है, ताकि क्षेत्र, और अंतत: बलूचिस्तान प्रांत में ग्वादर के पाकिस्तानी बंदरगाह के रास्ते पश्चिम एशिया में व्यापार में बढ़ोतरी हो। हैरिसन ने कहा कि यह ध्यान में रखना चाहिए कि गिलगित और बाल्टिस्तान आर्थिक तौर पर अविकसित और सामाजिक तौर पर खंडित हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, यहां तक की चीन की छोटी सी भी उपस्थिति ऐसे अविकसित समाज पर बुरा प्रभाव डाल सकती है। स्टिमसन सेंटर एन्वायरमेंटल सिक्यूरिटी के सैयद इकबाल हसनैन ने चेताया कि गिलगित और बाल्टिस्तान में बडे़-बड़े बांध बनाए जा रहे हैं, जिससे भूकंप और सैकड़ों गांवों के डूबने का खतरा है। इंटरनेशनल सेंटर फोर पीस एंड डेमोक्रेसी के कार्यकारी निदेशक मुमताज खान ने कहा कि पाक अधिकृत कश्मीर में चीनी सेना की खतरनाक रूप से बढ़ रही उपस्थिति पर ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि चीन ने पाकिस्तान के हिस्से में आने वाले कश्मीर के समूचे विवादित हिस्से पर एक प्रकार से कब्जा जमा लिया है।
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