Friday, February 4, 2011

गिनती के दिन हैं तानाशाही हुकूमत के


सरकार के विरुद्ध मिस्र की जनता का सड़कों पर उतर आना दुनिया के लिए एक सकारात्मक संकेत है, क्योंकि यह आंदोलन पूरी तरह जनतांत्रिक है और भ्रष्ट तानाशाही और कट्टरपंथी ताकतों का विरोध करता है। जब लाखों लोग देश और लोकतंत्र के हित में सड़कों पर उतर आते हैं तो किसी भी सत्ता के लिए उन्हें दबाना आसान नहीं होता। मिस्र में चल रहा आंदोलन इतना शक्तिशाली है कि इसे सैन्य ताकत के बल पर किसी तरह दबाना मुमकिन नहीं दिखता। 1979 में ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद शायद यह सबसे बड़ा आंदोलन है। मिस्र के ताजा हालात से तो लग रहा है कि बड़ी संख्या में सैनिक भी आंदोलन का हिस्सा बन चुके हैं और सेना निहत्थे लोगों को कुचलने से इंकार कर रही है। ऐसे में वहां के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचता और शायद अब वे अपनी सम्मानजनक विदाई का रास्ता तलाशने में लगे हैं। मिस्र ही नहीं, जॉर्डन और ट्यूनीशिया जैसे देशों की जनता ने भी दिखा दिया है कि वह लोकतंत्र की हिमायती है और सत्ता में वैसे लोगों को कतई नहीं स्वीकार कर सकती है, जिन्हें वह नहीं चाहती है। मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक ने करीब तीन दशक पहले तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सादात की हत्या के बाद देश की कमान संभाली थी। अपने तीन दशक के कार्यकाल में उन्होंने तानाशाही रवैया ही अख्तियार किया है। इस साल अपने शासन के तीस साल पूरे होने पर वह अपने पुत्र गमाल मुबारक को विरासत सौंपना चाहते थे लेकिन मिस्र की तरक्कीपसंद जनता को यह कतई स्वीकार्य नहीं है। वैसे बात केवल इतनी ही नहीं है। मिस्र वैचारिक स्तर पर काफी प्रगतिशील देश है लेकिन दूसरी ओर दशकों से यहां के लोग भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, भुखमरी और आर्थिक तंगी से परेशान हैं। वहां की बेराजगारी दर करीब 10 फीसद है। वहां की हुकूमत ने सैन्य ताकत के बल पर ही शासन किया। सत्ता लोगों की इस सोच के साथ नहीं थी कि वे आर्थिक संपन्नता के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था भी चाहते हैं। यहां अमेरिका की बात करना प्रसंगिक है, जो लोकतंत्र का समर्थक तो दिखता है लेकिन उनके कई बड़े सहयोगी तानाशाही शासक हैं। मिस्र की मुबारक सरकार को वह समर्थन देता आया है। अमेरिका मिस्र की सहायता ईरान पर नकेल कसने के रूप में करता रहा है। अगर मुबारक की सरकार जाती है तो बहुत संभव है वहां प्रमुख विपक्षी दल मुस्लिम ब्रदरहुड की सरकार बने। यह सरकार निश्चित रूप से अमेरिका विरोधी होगी और तब अमेरिका के लिए मिस्र दूसरा ईरान साबित होगा। इसी तरह जॉर्डन जैसे देश में भी अगर आंदोलन सफल रहा तो वह अमेरिकी प्रभाव से बाहर चला जाएगा। ऐसे में विश्व राजनीति में अनिश्चतता और अस्थिरता का वातावरण बन सकता है। अमेरिका का प्रभाव अगर मध्यपूर्व में कम होता है तो बहुत संभव है कि उसकी भरपाई करने को चीन तैयार बैठा मिले। बड़ी चिंता की बात केवल यही दिखती है कि मध्य पूर्व के देशों में उदारवादी ताकतें एकजुट नहीं हैं और यही कारण है कि एक आशंका व्यक्त की जा रही है कि मौजूदा शासकों के विकल्प के तौर पर सेना न आ जाए या फिर ईरान की तरह कट्टरवादी ताकतें अपनी जड़ें न जमा लें। यह भी संभव है कि वहां इंडोनेशिया और मलयेशिया की तरह जनतांत्रिक व्यवस्था लागू हो। ऐसा यदि होता है तो यह अच्छा ही होगा। बहरहाल, मिस्र, ट्यूनीशिया और जॉर्डन में विरोधियों की तादाद और उनके तौर-तरीके के विश्लेषण से इतना तो साफ है कि वहां की सत्ता ज्यादा समय तक लोगों की भावनाओं को दबा नहीं सकती। वहां और मध्यपूर्व के अन्य देशों में आने वाले समय में राजनीतिक उथल-पुथल भले ही बढ़े, लेकिन अंतत: लोकतांत्रिक व्यवस्था का ही बोलबाला होगा।

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