Thursday, February 17, 2011

रिश्ते में खटास


राजनयिक ऐसा काम नहीं करते, जैसा रेमंड डेविस ने किया
महाशक्ति देश का अहंकार पाकिस्तान के कमजोर लोकतंत्र के खिलाफ बढ़ता ही जा रहा है, हालांकि अभी इसका उलटा असर पड़ रहा है। छह महीनों से भी कम समय में पाकिस्तान ने अमेरिका के साम्राज्यवादी रवैये को दूसरी बार चुनौती दी है। विगत अक्तूबर में अमेरिकी हेलीकॉप्टरों ने जब आदिवासी इलाकों में कुछ पाक सैनिकों को मारा था, तो इसलामाबाद ने नाटो की आपूर्ति लाइन रोक दी थी। अमेरिका द्वारा आधिकारिक रूप से माफी मांगने के बाद ही आपूर्ति बहाल की गई थी। लेकिन इस बार अमेरिका अपनी गलती मानने या पाकिस्तानी कानून का सम्मान करने को तैयार नहीं है। इसके बजाय वह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि पाकिस्तान उसका सबसे भरोसेमंद नहीं, बल्कि परेशान करनेवाला सहयोगी है।
यह अमेरिका के बदले हुए नजरिये का ही नतीजा है कि उसने अफगानिस्तान की स्थितियों पर विचार करने के लिए पाकिस्तान के साथ पहले से तय एक उच्च स्तरीय त्रिपक्षीय वार्ता स्थगित कर दी है। अमेरिका अगर ऐसा सोचता है, तो गलत सोचता है कि उसके इस रवैये से पाकिस्तान बदनाम अमेरिकी खुफिया एजेंट रेमंड डेविस को छोड़ देगा, जिसे दो पाकिस्तानी नागरिकों की हत्या के जुर्म में गिरफ्तार किया गया है।
अमेरिकी अधिकारी अब पाकिस्तान पर एक और दबाव डाल रहे हैं कि अगर कुछ दिनों में डेविस को नहीं छोड़ा गया, तो राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की अगले महीने होने वाली अमेरिका यात्रा रद्द कर दी जाएगी। सीआईए के दबाव पर ह्वाइट हाउस ने यह मामला सीधे अपने हाथ में ले लिया है। अब यह भी साफ हो चुका है कि रेमंड डेविस सीआईए के लिए काम करता था, क्योंकि उसकी गिरफ्तारी केबाद इस कुख्यात अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने पाकिस्तान के आदिवासी इलाकों में ड्रोन हमले रोक दिए हैं।
जानकारी यह भी है कि वाशिंगटन में पाक अधिकारियों को ह्वाइट हाउस से धमकी भरे संदेश मिल रहे हैं। वाशिंगटन स्थित पाक दूतावास ने जरदारी और गिलानी को बता दिया है कि कुछ अमेरिकी सांसद पाकिस्तान को मिल रही अमेरिकी मदद रोकने की भी योजना बना रहे हैं। इन सबके बावजूद इसलामाबाद का कहना है कि डेविस का फैसला तो पाकिस्तान की अदालत ही कर सकती है।
राष्ट्रपति जरदारी के नजदीकी एक ताकतवर केंद्रीय मंत्री ने इस लेखक को बताया कि डेविस मामले में यदि सरकार ने न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप किया, तो अदालत उसे अवमानना का नोटिस देगी और जनता उसके खिलाफ सड़कों पर उतर जाएगी और तब हश्र हुस्नी मुबारक से भी बुरा होगा। चूंकि चुनाव नजदीक है, इसलिए सत्तारूढ़ पीपीपी ऐसी कोई भूल नहीं करना चाहती, जिसका उसे खामियाजा भुगतना पड़े। उससे पूछा गया कि अगर डेविस मामले में सरकार के सभी उच्च पदस्थों में एक राय है, तो शाह महमूद कुरैशी को नए मंत्रिमंडल में विदेश मंत्रालय क्यों नहीं दिया गया। इस पर उस मंत्री ने यह तो स्वीकारा कि कुरैशी मामले से कई सवाल पैदा हुए हैं, पर उसका कहना था कि इसका जवाब सिर्फ प्रधानमंत्री दे सकते हैं।
वस्तुस्थिति यह है कि अमेरिकी रुख के बारे में कोई ताकतवर मंत्रीकिसी तरह का आधिकारिक बयान नहीं दे रहे। माना जाता है कि नए मंत्रिमंडल के ज्यादातर सदस्यों ने प्रधानमंत्री को अमेरिकी दवाब न मानने की सलाह दी है। शुरू में जरदारी ने बढ़ते अमेरिकी दबाव के मद्देनजर प्रधानमंत्री से कोई रास्ता निकालने को कहा था, लेकिन विदेश सचिव सलमान बशीर ने अपनी टिप्पणी में प्रधानमंत्री को स्पष्ट लिखकर दिया कि रेमंड डेविस कोई राजनयिक नहीं है, लिहाजा इस मामले में अमेरिकी दबाव के आगे झुककर हम अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं कर सकते। अदालत को इसका फैसला करने दीजिए। हमें एक हत्यारे को रिहा नहीं करना चाहिए।
डेविस मामले में अमेरिका के अहंवादी रवैये ने आतंकवाद के खिलाफ उसकी लड़ाई और पाकिस्तान के साथ उसके रणनीतिक संवाद की कलई खोल दी है। यह विडंबना ही है कि अमेरिका अपने एक ऐसे नागरिक को बचाना चाहता है, जिसने कथित आत्मरक्षा के नाम पर दो पाकिस्तानियों की हत्या की थी। डेविस की रिहाई की मांग करता अमेरिका आज पाकिस्तान के तमाम उपकारों को भूलने के लिए भी तैयार है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि इसलामाबाद स्थित राजनयिक समुदाय भी रेमंड डेविस मामले में अमेरिका के साथ नहीं है। अनेक यूरोपीय राजनयिकों ने इस लेखक से कहा कि राजनयिक ऐसा काम नहीं करते, जैसा डेविस ने लाहौर में किया। राजनयिकों को अवैध हथियार अपने साथ रखने का अधिकार नहीं है। एक यूरोपीय राजनयिक ने कहा कि डेविस के लिए अमेरिका ने एक बड़े देश की अपनी जिम्मेदारियों को भुला दिया है। दूसरे राजनयिक ने कहा कि कल रेमंड डेविस जैसे जासूस दूसरे देशों की राजधानियों में और ज्यादा लोगों को मारेंगे और तब अमेरिका कहेगा कि हत्यारे को राजनयिक छूट है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अमेरिकी दबाव नहीं मानना चाहिए, क्योंकि यह पूरी दुनिया में राजनयिकों के लिए ज्यादा परेशानियां खड़ी करेगा। एक अरब राजनयिक ने कहा कि हम तालिबान और अल कायदा की निंदा करते हैं, क्योंकि वे देश का कानून तोड़ते हैं। इसलिए वे उन्हें ढूंढकर दंड देते हैं, मारते हैं। लेकिन जब अमेरिकी नागरिक किसी की हत्या करते हैं, तो उन्हें गिरफ्तार कर दंड क्यों नहीं देते? तालिबान और अमेरिकी गुप्तचरों में क्या अंतर है, जबकि दोनों हमारे कानून तोड़ते हैं और निर्दोषों की हत्या करते हैं।
अपने एक नागरिक की रिहाई के लिए अमेरिका आज पाकिस्तान के तमाम उपकारों को भूलने के लिए तैयार है।

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