ट्यूनीशिया-मिस्र में जन आंदोलन से जिने अल अबेदीन बेन अली और होस्नी मुबारक की सत्ता उखड़ने के बाद यमन, बहरीन, लीबिया, जॉर्डन, ईरान सहित अरब और उत्तर अफ्रीकी देशों में सत्ता विरोधी लहर चल रही है। हालांकि इसका आंशिक प्रभाव चीन, यूनान और इटली में भी देखने को मिला, लेकिन इन देशों में छिटपुट प्रदर्शन हुए, जिन्हें अरब और उत्तर अफ्रीकी देशों की रक्तहीन क्रांति से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। वैसे यह पहली बार नहीं हो रहा, जब क्रांति की आग एक साथ कई जगह फैली हो। इससे पहले वर्ष 1848, 1968 और 1989 में भी ऐसा ही दौर अया था। वर्ष 1848 की यूरोपीय क्रांति उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए हुई। इसने पश्चिम और मध्य यूरोपीय देशों को प्रभावित किया। 1968 के दौरान मैक्सिको सिटी, पेरिस, न्यूयॉर्क सहित कई जगहों पर वामपंथी लहर चली। इसी दौर में चीन की मशहूर सांस्कृतिक क्रांति को भी दुनिया ने देखा। 1968 की इस क्रांति ने वामपंथी और कट्टरपंथी विचार का प्रसार किया। इसके बाद वर्ष 1989 में क्रांति हुई, जिसने पूर्वी यूरोप को प्रभावित किया। 1992 तक चलने वाली यह क्रांति सोवियत संघ के विघटन का कारण बनी। इस क्रांति ने साम्यवादियों को हाशिए पर पहुंचा दिया। अब 2011 की रक्तहीन क्रांति की बात करते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं कि इसका प्रभाव अरब-उत्तर अफ्रीकी देशों में है। अभी तक जिन-जिन देशों में क्रांति की यह चिंगारी पहुंची है, उनमें स्थिति लगभग समान है। सबसे पहली समानता प्रभावित देशों में या तो राजशाही है या तानाशाही। ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, बहरीन, यमन, जॉर्डन आदि में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हाल भी लगभग एक जैसा ही है। इन सभी देशों में लंबे समय से एक ही शासक का साम्राज्य स्थापित है। ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति बेन अली ने 23 वर्षो तक शासन किया तो होस्नी मुबारक मिस्र की सत्ता पर 30 वर्षो से अधिक समय तक काबिज रहे। लीबिया के शासक मुअम्मर गद्दाफी को 41 साल हो गए हैं। बहरीन का सुन्नी शाही परिवार भी वर्षो से शिया बहुल आबादी पर राज कर रहा है। मुबारक की सत्ता उखड़ने के बाद मिस्र में सेना शासन संभाल रही है तो ट्यूनीशिया में अंतरिम सरकार देश चला रही है। बाकी बचे लीबिया, बहरीन और यमन में आंदोलन अभी जारी है। इस समय जहन में एक ही सवाल चल रहा है कि क्या अरब-उत्तर अफ्रीकी देशों में रक्तहीन क्रांति रंग ला पाएगी? जो लोग मिस्र-ट्यूनीशिया में क्रांति को सफल कह रहे हैं, उन्हें समझना होगा कि इन दोनों देशों ने अभी कुछ हासिल नहीं किया, बल्कि पहली बाधा पार की है। वर्ष 1848 की यूरोपीय क्रांति की लहर ने 2011 की रक्तहीन क्रांति से भी ज्यादा देशों को अपनी चपेट में लिया था और आंदोलन की रफ्तार भी इससे कहीं तेज थी। बदलाव उस समय भी हुआ था, लेकिन परिवर्तन स्थिर नहीं रह सका, इसलिए 1848 की क्रांति को सफल नहीं माना गया। इसकी शुरुआत फ्रांस में राजशाही के खिलाफ हुई थी। परिणामस्वरूप राजशाही का खात्मा हुआ और लोकतांत्रिक सरकार गठित हुई, लेकिन चार साल बाद वहां फिर राजशाही आ गई। इसी प्रकार से यूरोप के बाकी देशों में भी परिवर्तन तो आए, लेकिन व्यवस्था में पूर्ण बदलाव का सपना अधूरा रह गया। 1848 की क्रांति का जिक्र यहां इसलिए भी अधिक हो रहा है, क्योंकि 2011 की रक्तहीन क्रांति इससे काफी मिलती है। उस वक्त भी आम आदमी अगुआ था और आज भी है। 1848 की क्रांति माओ की सांस्कृतिक क्रांति की तरह न तो संगठित थी और न ही विकल्प प्रदान करने वाली थी। 2011 की कलर रेवॉल्यूशन में शामिल देश ट्यूनीशिया, मिस्र, जॉर्डन, बहरीन, यमन व लीबिया में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति है। केवल मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड एकमात्र संगठित विपक्षी दल है, लेकिन सत्ता संभालने के लिए वह खुद को तैयार करने में लगा है। यही हाल ट्यूनीशिया का है, जबकि यमन, बहरीन, लीबिया, जॉर्डन की स्थिति और दयनीय है। ये देश तो अभी मौजूदा शासन को ही नहीं उखाड़ पाए हैं। दरअसल, सत्ता उखाड़ फेंकने के लिए इतने व्यापक प्रदर्शनों की जरूरत है कि संपूर्ण व्यवस्था पंगु हो जाए। इसके बाद प्रदर्शनकारियों का सामना सुरक्षाबलों से होता है और किसी भी क्रांति को यहीं से दिशा मिलती है। शासन या तो प्रदर्शनकारियों को कुचल देता है या फिर सेना जनता के साथ आ जाए। सेना के साथ आए बगैर मौजूदा परिदृश्य में क्रांति सफल होने के आसार कम ही हैं। मिस्र-ट्यूनीशिया में सेना के समर्थन से ही सत्ता परिवर्तन हो सका। बहरीन भी इसी राह पर है, वहां प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। आंदोलनरत शियाओं के लिए यह अच्छा संकेत है। 1979 की ईरानी क्रांति के समय भी ऐसा ही हुआ था। युवाओं ने पूरी व्यवस्था ठप कर दी थी और वे व्यवस्था में संपूर्ण बदलाव कर पाए। हालांकि लीबिया में स्थिति अलग है, वहां सेना बंटी हुई है। इसके अलावा वहां इस्लामिक मिलिशिया सशस्त्र विद्रोह कर रहे हैं, इसलिए लीबिया में जो रहा है, वहां रक्तहीन क्रांति का प्रभाव तो है, लेकिन इसे रक्तहीन क्रांति कहना उचित नहीं होगा। लीबिया में मौजूदा क्रांति को खूनी विद्रोह कहना ठीक होगा। विशेष रूप से अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है। हालांकि वे पूरी कोशिश कर रहे हैं कि आंदोलन का परिणाम लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना के रूप में निकले, क्योंकि वे कट्टरपंथियों को मौके का लाभ उठाने से रोकना चाहते हैं। यह कहना मुश्किल है कि अमेरिका या बाकी पश्चिमी देश उन्हें निश्चित रूप से रोक पाएंगे, क्योंकि मौजूदा बदलाव में उनकी भूमिका आंशिक है। अरब-अफ्रीकी देशों में 2011 की रक्तहीन क्रांति का मतलब पश्चिम के लिए आज भी वैसा ही है, जैसा 1950 से लेकर 1970 के दौरान था। उस वक्त भी अरब-अफ्रीकी देशों में विदेशी ताकतों के समर्थन से चल रहे साम्राज्य उखाड़ फेंके गए। गद्दाफी ने 1969 में विदेशी समर्थन प्राप्त राजशाही समाप्त कर सत्ता संभाली। ईरान में भी 1979 में ऐसा ही हुआ, लेकिन अरब-अफ्रीकी मुस्लिम देशों का दुर्भाग्य रहा कि परिवर्तन के बाद भी उनका शासन विदेशी ताकतों के हाथों में ही रहा। दरअसल, वहां जब-जब सत्ता विरोधी लहर चली, तब-तब जनता के पास विकल्प मौजूद नहीं रहे। इसका परिणाम यह निकला कि कोई छोटा समूह, व्यक्ति विशेष या सेना ने मौके का लाभ उठाया। इराक-बहरीन जैसे शिया बहुल देशों में सुन्नी शाही शासक सद्दाम हुसैन और हमाद बिन ईसा अल खलीफा का साम्राज्य स्थापित होना इसी समस्या को दर्शाता है। मिस्र में भी पूर्व की क्रांति का हाल ऐसा ही रहा। हाल में पद छोड़ने वाले होस्नी मुबारक ने 30 वर्षो तक राज किया। वह अनवर अल सादत की हत्या के बाद सत्ता में आए। सादत मिस्र के तीसरे राष्ट्रपति थे, वह उस फ्री ऑफिसर्स संगठन में शामिल थे, जिसने 1952 में हुई मिस्र की क्रांति के दौरान मोहम्मद अली के साम्राज्य का अंत किया। इसके बाद गमाल अब्देल नसीर राष्ट्रपति बने। नसीर के भरोसेमंद सादत ने 1970 से 1981 तक राज किया। उनके बाद होस्नी मुबारक ने कमान संभाली और उन्होंने भी वही किया। इसी प्रकार से लीबिया में गद्दाफी क्रांति के नायक बनकर उभरे और 41 वर्षो से सत्ता पर काबिज हैं। फ्रांस से आजादी पाने के बाद ट्यूनीशिया में हबीब बुर्गिबा ने 1957 में कमान संभाली, लेकिन उन्होंने जीवनभर फ्रांस के इशारे पर कार्य किया। बुर्गिबा से लोग त्रस्त हो गए तो बेन अली ने फ्रांस के इशारे पर उनका तख्तापलट किया। इस बार भी परिवर्तन का परिणाम वही हुआ। इसमें शक नहीं कि 2011 की कलर रेवॉल्यूशन और पिछले सत्ता परिवर्तनों में काफी अंतर है। इस बार क्रांति का नायक कोई सैन्य कमांडर नहीं है, लेकिन विकल्प की पुरानी समस्या बरकरार है। ऐसे में अराजकता फैलने का भी भय बना हुआ है। अरब-अफ्रीकी देशों की जनता जिस प्रकार का बदलाव चाहती है, उसके लिए चार बातें अहम हैं। सबसे पहले जिन-जिन देशों में क्रांति जारी है, वहां मौजूदा शासन खत्म होना चाहिए। इसके बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर बहस हो और फिर आम चुनाव से पहले विकल्प के तौर पर सुसंगठित दल सामने आएं। बाद में लोकतांत्रिक सरकार गठित हो और फिर जो दल सरकार बनाए वह जनता की इच्छा का सम्मान कर लोकतंत्र की डगर पर चले, तब जाकर अरब-अफ्रीकी देशों में जारी यह रक्तहीन क्रांति हो पाएगी। (लेखक दैनिक जागरण से जुड़े हैं)
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