मिस्र की त्रासदी से एक बात तो साफ है कि इतने सालों से जो तानाशाही बहुत-से देशों में चल रही है, उसके दिन अब पूरे होने वाले हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण एक मुकम्मल लोकतंत्र की स्थापना नहीं होना है, जो कि ज्यादातर देशों में है। परन्तु इसके अलावा भी कई हालिया मुद्दे हैं मसलन कहीं महंगाई है तो कहीं भ्रष्टाचार है। इसके अलावा बेरोजगारी की समस्या जैसे ठोस मुद्दे भी हैं जिन्हें वहां की जनता चाहती है कि हल हो। उन्हें लगता है कि सरकार उनकी समस्याओं का समाधान करे और ऐसा वातावरण तैयार हो जहां चीजें सही ठंग से चले। कई अरब देशों में चल रही समस्या का मूल कारण यही है। जनतंत्र
बदलेेंगे कई समीकरण
मिस्र की समस्या का न सिर्फ अरब देशों पर बल्कि इस्रइल, अमेरिका और भारत समेत कई देशों पर प्रभाव पड़ेगा। मिस्र के इस्रइल और अमेरिका के साथ अच्छे रिश्ते थे। खासकर इस्रइल और मिस्र के बीच एक अंडरस्टैंडिंग थी जिसके बीच में अमेरिका था। तीनों के बीच एक तारतम्य था कि अरब-इस्रइल वातावरण ज्यादा न बिगड़े। लेकिन अगर मिस्र में होस्नी सरकार के नेस्तानाबूद होने के बाद दूसरे लोग सत्ता में आते हैं तो इस पर बहुत गहरा असर पड़ेगा। अगर मिस्र में चुनाव होता है तो संभावना है कि मुस्लिम ब्रदरहुड ही सत्ता में आएंगे। अगर यह सत्ता में आती है तो अमेरिका और इस्रइल के मिस्र के साथ संबंध पूरी तरह बदल जाएंगे। इससे इस्रइल की सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है और उस पूरे क्षेत्र का वातावरण बिगड़ सकता है।
कट्टरपंथियों के हावी होने का खतरा
हालांकि मिस्र के मामले में अमेरिका बहुत सोच-समझकर कदम उठा रहा है। आज पूरी दुनिया को प्रभावित करने की क्षमता किसी एक राष्ट्र में है तो वह अमेरिका है और अमेरिका की तरफ से यह बयान आया है कि मसला बातचीत से ही हल होना चाहिए। मुझे लगता है कि विपक्ष और सरकार के बीच जो वार्ता हो रही है वह एक अच्छा कदम है और इसका कुछ न कुछ नतीजा जरूर निकलेगा। अब राष्ट्रपति को तो त्यागपत्र देना ही पड़ेगा और हो सकता है कि किसी दूसरी तरह का समझौता हो जाए। कम से कम इससे हिंसा में तो कमी आएगी। हालांकि इसके बाद मिस्र में पूरी तरह से लोकतांत्रिक शासन पण्राली स्थापित हो जाएगी, यह संभव नहीं दिखता। क्योंकि हमारे सामने बहुत से उदाहरण हैं, जैसे अल्जीरिया में इसी तरह के हालात पैदा हुए थे तो वहां भी चुनाव बगैरह करवाए गए। लेकिन उसके बाद वहां कट्टरपंथी ताकतें ही हावी हो गई। अभी मिस्र में भी मुस्लिम ब्रदरहुड पर बैन लगा है, फिर भी वहां पर स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में उसके 70-80 सदस्य जीतकर संसद में आ गए। अगर उनको खुले तौर पर चुनाव लड़ने का मौका मिला तो फिर निश्चित तौर पर वे ही सत्ता में आएंगे। इसलिए जैसा उदारवादी लोकतंत्र वहां होना चाहिए, वैसा होने की संभावना नगण्य है। लेकिन वहां की जनता को कम से कम यह कहने का मौका मिलेगा कि फ्री एंड फेयर चुनाव हुए और उनकी प्रजातंत्र की मांग भी पूरी हो गई। हालांकि उसका नतीजा क्या होगा, क्या सही ढंग से प्रजातंत्र आएगा या देश धार्मिंक कट्टरवाद की तरफ बढ़ेगा यह एक अलग मुद्दा है। अगर वहां एक औपचारिक लोकतंत्र की स्थापना होती है तो आगे देखना होगा कि यह क्या मोड़ लेता है।
उचित है भारत की सतर्क प्रतिक्रिया
इस मुद्दे पर भारत का रवैया साफ नहीं है क्योंकि हमारे यहां काफी सचेत प्रतिक्रिया होती है। क्योंकि यहां भी चुनावी वोटबैंक की चिंता पार्टयिों को ज्यादा होती है, खासकर मुस्लिम फैक्टर को देखते हुए। खासतौर पर पश्चिम एशिया एक महत्वपूर्ण संदर्भ समूह है यहां के मुसलमानों के लिए। वहां क्या हो रहा है, नहीं हो रहा है, इस हिसाब से लोग यहां देखते हैं। तो इस राजनीति के कारण भारत यह नहीं चाहता कि उसके बयानों से मिस्र की स्थिति पर कोई प्रभाव पड़े। भारत की ज्यादातर कोशिश यथास्थिति को बरकरार रखने की होती है, यानी जो चल रहा है चलता रहे। अगर वहां कोई बदलाव आता है तो हम सावधानी से निरीक्षण करते हैं और उसी हिसाब से अपना बयान देते हैं। लेकिन अगर वहां बदलाव होता है तो उसे किसी न किसी मोड़ पर भारत को समर्थन देना ही होगा। इसके अलावा ऑयल फैक्टर भी है। साथ ही दूसरे अरब देश क्या रु ख अपनाएंगे उसको भी ध्यान में रखकर थोड़ा सावधानी से हमें अपनी नीतियों को बनाना पड़ता है।
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