Thursday, February 10, 2011

नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव पर दिलीप घोष की …..

चीन विश्व शक्ति बनने के रास्ते में खुद के लिए भारत को एकमात्र चुनौती मानता है और यह बात पाकिस्तान को पसंद है। पाकिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका और बांग्लादेश में चीन की मजबूत पैठ है और अब यह अपने पंजे नेपाल पर भी कसने की कोशिश कर रहा है। चीन भारत को उसकी भौगोलिक सीमाओं तक ही समेटना चाहता है। चीन नेपाल में न केवल आधारभूत परियोजनाओं में भारी निवेश कर रहा है और हथियार दे रहा है, बल्कि वह नेपाली शिक्षण और सांस्कृतिक संगठनों को भारत की तरह अनुदान भी दे रहा है। लोकतंत्र समर्थक आंदोलन के दौरान जब सभी देशों ने नेपाल को हथियारों की आपूर्ति रोक दी थी, तब चीन ने उसे हथियार दिए। इनका इस्तेमाल उन्हीं माओवादियों के खिलाफ किया गया जो चीन से समर्थन की आस लगाए बैठे थे। भारत तथा दूसरे पड़ोसी देशों के साथ चीन काफी अरसे से अपने संबंध मजबूत करने में लगा है, लेकिन नेपाल के साथ उसके संबंधों में काफी देर से मजबूती आनी शुरू हुई। इसका कारण नेपाल के साथ भारत के विशेष रिश्ते रहे हैं जो 1950 की भारत-नेपाल मैत्री संधि से भी ज्यादा गहरे हैं। दूसरे चीन से नेपाल पहंुचना आसान नहीं है। इस कारण चीन अब इसके पहाड़ी इलाके में एक सड़क बना रहा है। नेपाली सीमावर्ती कस्बे सियाब्रूबेसी को चीन की सीमा से जोड़ने वाली सड़क अगले साल लोगों के लिए खोल दी जाएगी। इस 17 किलोमीटर लंबी सड़क पर चीन दो करोड़ डॉलर खर्च कर रहा है। यह पहाड़ी रास्ता न केवल तिब्बत को नेपाल से जोड़ेगा, बल्कि भारत की राजधानी दिल्ली पहंुचने का भी मार्ग खोलेगा। हाल ही में निर्माण स्थल का दौरा करने वाले बीबीसी संवाददाता का कहना है कि स्थानीय लोग तो अभी से इस मार्ग से इस इलाके में आने वाली संपन्नता के सपने देख रहे हैं। सिर्फ नेपाली ही चीन का उपकार नहीं मान रहे हैं, बल्कि तिब्बतियों का भी ऐसा ही मानना है। नेपाल में इस प्रकार की बुनियादी सुविधाओं के निर्माण से चीन अपने आर्थिक हितों को ही बढ़ावा नहीं दे रहा है, बल्कि नेपालियों और 1959 में दलाई लामा के साथ भागकर नेपाल में बसे तिब्बतियों के मन में भी अपनी अच्छी छवि बना रहा है। चीन को चिंता है कि नेपाल से असंतुष्ट तिब्बती अपनी गतिविधियां चला सकते हैं। इस बारे में चीन ने पहले ही नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल से आश्वासन ले लिया था कि उनकी सरकार नेपाल में असंतुष्टों को अपनी कार्रवाई नहीं चलाने देगी। नेपाली मानस में इस तरह अपनी छवि बनाने की चीनी कोशिशें भारत के लिए चिंता का विषय हैं। भारत के प्रभाव को कम करने के लिए चीन नेपाल में अध्ययन केंद्र भी खोल रहा है। चीन द्वारा नेपाल में अब तक बनाए गए 11 ऐसे केंद्रों में से सात भारत-नेपाल सीमा पर हैं। भारत के लिए चिंता की बात नेपाल की घरेलू राजनीति में चीन की अहस्तक्षेप की नीति में बदलाव भी है। बताया जाता है कि चीन ने प्रचंड के पक्ष में प्रधानमंत्री पद के मतदान के लिए 50 नेपाली सांसदों को खरीदने की कोशिश की थी। नेपाल की अंदरूनी राजनीति में दखल देने की इस कोशिश ने गैर-कम्युनिस्ट पार्टियों, खास तौर से मधेसियों का गुस्सा भड़का दिया था। नेपाल मीडिया को चीन की इस चाल पर जबरदस्त हैरानी हुई, जबकि वह छठे दौर के चुनाव की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री के विशेष दूत श्याम शरण को काठमांडू भेजे जाने पर भारत की तीखी आलोचना कर रहा था और भारत पर नेपाली अंदरूनी मामलों में दखल देने का आरोप लगा रहा था। उल्फा के परेश बरुआ तथा पूर्वोत्तर के अन्य उग्रवादी नेताओं को तो उसने पहले ही शरण दे रखी है। इसलिए इसका कोई कारण नजर नहीं आता कि वह भारत में माओवादियों को हथियार मुहैया कराने की कोशिश नहीं करेगा, जो देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा आंतरिक खतरा बने हुए हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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