लीबिया की सत्ता पर 41 वर्षो से काबिज कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के साम्राज्य में पड़ी दरार और गहरी हो गई है। सोमवार को भारत, चीन, अरब लीग में तैनात लीबियाई राजनयिकों के इस्तीफों के बाद मंगलवार को प्रदर्शनकारियों पर सैन्य कार्रवाई के विरोध में देश के न्याय मंत्री मुस्तफा अब्दुल जलील और वाशिंगटन स्थित राजदूत ने भी इस्तीफा दे दिया। इसके अलावा बांग्लादेश में तैनात लीबियाई राजदूत ए एच अल इमाम ने भी पद छोड़ दिया है। इसके अलावा उत्तर अफ्रीकी देशों में लीबिया के राजदूतों ने भी गद्दाफी की निंदा की है। मंगलवार को मिस्र के एलेक्जेंड्रिया शहर स्थिति लीबिया के वाणिज्य दूतावास में राष्ट्रीय ध्वज गिरा रहा। बीबीसी के अनुसार, प्रदर्शनकारियों पर हमले के लिए लड़ाकू विमान लेकर उड़े दो पायलटों ने कार्रवाई न करते हुए विमान पड़ोसी देश माल्टा में उतार दिए। उन्होंने माल्टा से शरण देने की गुहार लगाई है। दूसरी ओर सैन्य अधिकारियों के एक गुट ने जवानों से आग्रह किया कि वे जनता के साथ मिलकर गद्दाफी को हटाने के लिए राजधानी त्रिपोली की ओर कूच करें। अल जजीरा ने दावा किया कि प्रदर्शन रोकने में नाकाम रहे लीबियाई सेना प्रमुख जनरल अबु-बकर यूनिस जबील को नजरबंद कर दिया गया है। सीमा की रखवाली के लिए तैनात सीमा रक्षकों के भी मिस्त्र पलायन करने की खबर है। इससे लीबिया की सीमा एक तरफ से असुरक्षित हो गई है। विशेष इंटेलीजेंस रिपोर्ट्स के लिए दुनियाभर में मशहूर वेबसाइट स्ट्राटफॉर ने भी यह माना है कि गद्दाफी की गद्दी हिल रही है और वह अकेले पड़ते जा रहे हैं। उनके फैसले भी इस ओर संकेत कर रहे हैं। पहले उन्होंने वायुसेना को प्रदर्शनकारियों पर हमले करने का आदेश दिया और फिर आदेश नहीं मानने वाले सैनिकों को फांसी पर लटकाने की धमकी दी। आंदोलन से लड़ने के लिए शुरुआत में गद्दाफी को जिस प्रकार अपनों का समर्थन हासिल हुआ वह अब कम होता जा रहा है। सत्ता विरोधी आंदोलन को कुचलने के लिए हथियारों के इस्तेमाल ने यह साफ कर दिया है कि मिस्र की तरह लीबियाई सेना मध्यस्थ की भूमिका नहीं निभा सकती है। एक तो सेना दो भागों बंट गई है। दूसरे, बल प्रयोग से वह जनता की नजरों में गद्दाफी की ही तरह खलनायक बन गई है। यही कारण है कि लीबिया में शुरुआती छह दिन तक तो जो आंदोलन ट्यूनीशिया, मिस्र और बहरीन की तरह शांतिपूर्ण था वह पिछले तीन दिनों में सशस्त्र विद्रोह का स्वरूप अख्तियार कर रहा है। रविवार को सेना की गोलीबारी में 200 प्रदर्शनकारियों की मौत के बाद से लीबिया के मध्य-पूर्व क्षेत्र में मौजूद इस्लामिक मिलिशया हिंसक हो गए हैं। देश के दूसरे सबसे बड़े शहर बेंघाजी से सेना को उन्होंने ही खदेड़ा। इसके बाद त्रिपोली में आगजनी कर हाहाकार मचाया। मौजूदा हालात में गद्दाफी का सैन्य कार्रवाई का फैसला उन्हें तो नुकसान पहुंचाएगा ही, साथ ही देश को लोकतंत्र से दूर भी ले जाएगा। इस समय मध्य-पूर्व के मिलिशया आंदोलन में सबसे आगे हैं या यूं कहें कि विद्रोह की अगुआई धीरे-धीरे उनके ही हाथ में जा रही है। सैन्य कार्रवाई से शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों को तो भगाया जा सकता है और इस कार्य में लीबियाई सेना माहिर भी है, लेकिन मिलिशिया इसे चुनौती के रूप में ले रहे हैं। ऐसे में मुकाबला सेना बनाम मिलिशिया भी हो सकता है। गद्दाफी की मौत के लिए मंगलवार को फतवा जारी होना इसी बात का संकेत देता है। मिस्त्र में जन्मे एक मौलवी यूसुफ अल कारादावी ने कहा, मैं गद्दाफी की मौत के लिए फतवा जारी करता हूं, क्योंकि वह निर्दोष नागरिकों का बेहद ्रकूरता के साथ खून बहा रहा है।
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