हर बदलाव को संकुचित नजरिए से देखना सही नहीं है। अरब र्वल्ड में बदलाव की बयार बह रही है। यह पूरी दुनिया के लिए अच्छी खबर है। मुस्लिम र्वल्ड में प्रजातंत्र की हवा बह रही है यह तो बहु त ही अच्छी बात है। और उससे भी अच्छी बात यह है कि इसके पीछे कट्टरपंथियों का हाथ नहीं है। मुस्लिम र्वल्ड में जिस बदलाव का इंतजार हमें बरसों से था, वह अब हो रहा है और हमें इसका स्वागत करना चाहिए
अरब क्षेत्र में शांतिपूर्ण क्रांति हो रही है। न तो कोई खून खराबा और न ही कोई गुरिल्ला लड़ाई। काहिरा के तहरीर स्क्वायर में 12 दिन के शांतिपूर्ण प्रदर्शन ने मिस्र में 30 साल से राज कर रहे होस्नी मुबारक की सत्ता हिलाकर रख दी है। इसी प्रदर्शन का नतीजा है कि मुबारक ने ऐलान कर दिया है कि सितम्बर 2011 के बाद वे मिस्र के राष्ट्रपति की कुर्सी छोड़ देंगे। न तो वे चुनाव लड़ेंगे और न ही उनके बेटे को यह मौका दिया जाएगा। लेकिन मिस्र की जनता इतने से खुश नहीं है। उसका कहना है कि होस्नी मुबारक तत्काल गद्दी छोड़ें और राजनीतिक बदलाव का रोडमैप तैयार हो। मिस्र में हो रहे प्रदर्शन का असर पूरे अरब र्वल्ड में दिखने लगा है। यमन के राष्ट्रपति ने ऐलान कर दिया है कि वे 2013 के राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार नहीं होंगे। साथ ही उन्होंने यह भी साफ कर दिया है कि उनके बेटे भी राष्ट्रपति की कुर्सी की रेस में नहीं होंगे। अल्जीरिया में 19 सालों से चली आ रही इमरजेंसी को खत्म कर दिया गया है। सूडान और जॉर्डन में बदलाव की मांग हो रही है। ट्यूनिशिया में भी बदलाव हो रहे हैं। अरब र्वल्ड पहले भी बदला है। इराक में सत्ता परिवर्तन हुआ, लेबनान में बंदरबांट चलती रही है, अल्जीरिया और तुर्की में कट्टरपंथियों ने जोर-आजमाइश पहले भी की है। लेकिन वे ऐसे बदलाव थे जिनका कोई दूरगामी असर नहीं हुआ। इसकी वजह यह थी कि इससे पहले अरब र्वल्ड में सारे बदलाव अमेरिका में तय हुए। इराक में सद्दाम हुसैन को इसीलिए जाना पड़ा क्योंकि उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश सद्दाम हुसैन से नफरत करते थे। सद्दाम हुसैन की गलती थी कि उन्होंने 1991 में कुवैत पर हमला किया था। लेकिन इस हमले की सजा उन्हें कई सालों बाद अपनी जान गंवा कर देनी पड़ी। और इस दौरान कई लाख इराकियों की जानें गई। किसी ने यह जानने की जहमत नहीं उठाई कि इराकी जनता क्या चाहती है। जोर इस बात पर रहा कि अमेरिका क्या चाहता है। हुआ वही जो अमेरिका चाहता था। लेकिन 1979 की ईरान की क्रांति के करीब 32 सालों बाद बदलाव की मांग करने के लिए लोग सड़क पर आ गए हैं। आखिर इस बदलाव के पीछे की वजह क्या है? मैं कोई अरब र्वल्ड का एक्सपर्ट नहीं हूं और न ही अंतरराष्ट्रीय मामलों का विशेषज्ञ हूं। लेकिन टेलीविजन स्क्रीन के जरिए जिस बदलाव की बयार को मैं देख रहा हूं, उससे उम्मीद जग रही है। उम्मीद इसलिए है क्योंकि पहली बार अरब र्वल्ड में बदलाव की मांग कट्टरपंथी नहीं बल्कि सेक्युलर जमात के लोग कर रहे हैं। उनके हथियार भी सेक्युलर हैं। ट्विटर, फेसबुक और मोबाइल के जरिए एसएमएस उनके हथियार हैं। मिस्र में प्रदर्शनकारियों की अगुवाई में मुस्लिम ब्रदरहुड नाम की संस्था भी है। मुस्लिम ब्रदरहुड को कट्टरपंथी संस्था माना जाता है। लेकिन मुस्लिम ब्रदरहुड ने साफ कर दिया है कि वह ऐसा मिस्र चाहता है जिसमें इस्लाम को तरजीह दी जाए लेकिन लोकतंत्र का बोलबाला हो, प्रेस की स्वतंत्रता की गारंटी हो और स्वायत्त न्यायपालिका हो। उम्मीद की दूसरी वजह यह भी है कि अमेरिका के ओबामा प्रशासन का अरब र्वल्ड के प्रति नजरिया बदल रहा है। मिस्र में जनता का विरोध शुरू होने के ठीक बाद अमेरिकी प्रशासन ने साफ कर दिया कि होस्नी मुबारक को सत्ता छोड़नी होगी। मुबारक के इस बयान के बाद भी कि वे सितम्बर में गद्दी छोड़ देंगे, अमेरिकी प्रशासन खुश नहीं है। अमेरिका चाहता है कि सत्ता में बदलाव अभी हो और राजनीतिक परिवर्तन का रोडमैप भी अभी तैयार हो। अमेरिकी प्रशासन की मुश्किल यह है कि वह कोई भी समाधान मिस्र पर थोपना नहीं चाहता है। और मिस्र की जनता भी यही चाहती है कि उसके भविष्य का फैसला वाशिंगटन में लिये जाने की प्रक्रिया तत्काल बंद हो। सवाल है कि अरब र्वल्ड में बदलाव का भारत पर क्या असर होगा!
मेरा मानना है कि फिलहाल तो हमारी मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। मिस्र भले ही कच्चे तेल का बड़ा उत्पादक न हो लेकिन कच्चे तेल की आवाजाही के बड़े हिस्से पर उसका कब्जा है। कच्चे तेल की आवाजाही स्वेज कनाल के जरिए होती है। अनुमान है कि स्वेज कनाल के जरिए हर दिन करीब 20 करोड़ बैरल कच्चे तेल की आवाजाही होती है। मिस्र में अनिश्चितता की वजह से अगर कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी होती है तो हमारी अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर पड़ेगा। कच्चे तेल की जिस वेरायटी का हम इस्तेमाल करते हैं गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी कीमत 103 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चली गई। महंगाई से जूझ रही सरकार के लिए यह बुरी खबर है। पेट्रोल की कीमत में आखिरी बढ़ोतरी तब हुई थी जब कच्चे तेल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के पार गई थी। अब चूंकि कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के भी पार चली गई हैं तो सरकारी तेल कंपनियों पर कीमतें बढ़ाने का दबाव और बढ़ गया है। पेट्रोल और डीजल की कीमतें फिर से बढ़ीं तो महंगाई बेकाबू हो जाएगी। प्रधानमंत्री ने इसी हफ्ते माना है कि महंगाई इंडिया ग्रोथ स्टोरी में सेंध लगा सकती है। मतलब यह है कि मिस्र का संकट छोटी अवधि में हमारी मुश्किलें और बढ़ा सकता है। लेकिन मेरा मानना है कि हर बदलाव को संकुचित नजरिए से देखना सही नहीं है। अरब र्वल्ड में बदलाव की बयार बह रही है। यह पूरी दुनिया के लिए अच्छी खबर है। मुस्लिम र्वल्ड में प्रजातंत्र की हवा बह रही है यह तो बहुत ही अच्छी बात है। और उससे भी अच्छी बात यह है कि इसके पीछे कट्टरपंथियों का हाथ नहीं है। मुस्लिम र्वल्ड में जिस बदलाव का इंतजार हमें बरसों से था, वह अब हो रहा है और हमें इसका स्वागत करना चाहिए। जहां तक कच्चे तेल का सवाल है तो उसकी कीमत इस अनिश्चितता के बाद फिर से डिमांड-सप्लाई के अर्थशास्त्र से ही तय होगी। और उसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए।
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