Tuesday, February 22, 2011

चीन से बढ़ती चिंता


चीन हमेशा से एक विस्तारवादी देश रहा है। अन्य देशों के साथ भारत भी चीन के इस नापाक रवैये का शिकार रहा है। अब चीन ने एक नया हथकंडा अपनाया है। दक्षिण पूर्व एशिया के जिन पड़ोसी देशों की जमीन हड़पने में वह विफल रहा है उसे वह समझा रहा है कि वह उनके क्षेत्र में मजबूत और आधुनिकतम रेल लाइन बिछाएगा जिसके कारण उनका भरपूर विकास होगा। एक वर्ष पहले चीन ने आसियान देशों के साथ मुक्त व्यापार का एक समझौता किया जिसके मुताबिक चीनी सामान पर दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में नाममात्र का शुल्क लगेगा। उसी तरह से दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का जो सामान चीन में बिकेगा उस पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। चीन ने अपने पड़ोसी दक्षिण पूर्व एशियाई देशों को यह समझाया है कि यदि वह उन्हें अपने क्षेत्र में मजबूत और आधुनिकतम रेल लाइनें बिछाने की अनुमति देता है तो इससे लाभ केवल उन देशों को है और चीन को नाममात्र का लाभ है। इन रेल लाइनों को बिछाने में जो खर्च आएगा वह इन देशों को सस्ते ब्याज पर कर्ज के रूप में देगा। कई देश चीन के इस प्रस्ताव से सहमत नहीं हुए हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि चीन किस तरह बहाना बनाकर अपने पड़ोसी देशों में घुसपैठ करता है और वहां हमेशा के लिए जम जाता है। बहुत समझाने- बुझाने पर कई देश राजी हो गए हैं। चीन ने उन्हें यह भी समझाया है कि चीन की आबादी बहुत बड़ी है और उसके पास एक विशाल बाजार है। यदि दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में आधुनिकतम रेललाइनें बिछा दी गईं तो उन देशों से कच्चा माल या तैयार माल आसानी से चीन की मंडियों में भेजा जा सकता है। इससे उन्हें भरपूर लाभ होगा। लाओस को चीन यह समझाने में सफल हो गया है कि उसके तैयार माल को समुद्र तट ले जाने के लिए कोई पड़ोसी देश तैयार नहीं होता है। अब चीन पहल करके उसके तैयार माल को समुद्री बंदरगाह तक ले जाएगा जिससे उसके निर्यात को भरपूर बल मिलेगा। एक बार लाओस में रेल लाइनें बिछाने के नाम पर यदि चीन उस देश में घुस गया तो वहां के प्राकृतिक संपदा का वह भरपूर दोहन करेगा। आखिर बर्मा में भी तो उसने यही किया है। आज बर्मा छटपटा कर भी चीन के शिंकजें से बाहर नहीं निकल पा रहा है। वियतनाम और कंबोडिया जैसे देश चीन भी के झांसे में आ गए हैं। चीन ने उन्हें आश्वस्त किया है कि इन रेल लाइनों पर पैसेंजर ट्रेनें तथा मालवाहक गाडि़यां एक घंटे में 200 किलोमीटर की रफ्तार से चलेंगी। वैसी हालत में ये देश आसानी से अपने कच्चे माल या तैयार माल को चीन की मंडियों में भेज सकेंगे या निर्यात कर सकेंगे। इन रेल लाइनों को बिछाने में जो खर्च आएगा उसका एक भाग कर्ज के रूप में सस्ती ब्याज दर पर चीन देगा और दूसरा भाग एशियन डेवलपमेंट बैंक देगा। दुनिया में अब तो सभी देश चीन की आर्थिक प्रगति का लोहा मान चुके हैं। इसलिए दक्षिण-पूर्व एशिया के देश चीन के प्रस्ताव से सहमत हैं। यह सोचकर कि इससे उनके कच्चे और तैयार माल को चीन का बाजार मिल जाएगा तथा विदेशों में भी वह निर्यात हो सकेगा। इन सभी देशो में लाओस और बर्मा की तरह अकूत प्राकृतिक संपदा है। चीन एक शक्तिशाली देश है और दक्षिण पूर्व एशिया के सारे देश उससे डरे-सहमे रहते हैं। परंतु आर्थिक उन्नति के लोभ में दक्षिण पूर्व एशिया के ये गरीब देश जिस तरह चीन के लिए अपना दरवाजा खोल रहे हैं भविष्य में उसके भयावह परिणाम होंगे। चीन का यह इतिहास रहा है कि जहां-जहंा उसने घुसपैठ की है वहां के स्थानीय निवासियों को उस देश की सरकार के खिलाफ भड़काकर विद्रोही बना दिया है। इसका जीवंत उदाहरण भारत के उत्तर पूर्वी राज्य हैं। चीन यहां के विद्रोहियों को अस्त्र-शस्त्र देता है और उन्हें भारत सरकार के खिलाफ विद्रोह करने के लिए उकसाता है। (लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं)

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