Thursday, February 17, 2011

भारत की नीति सं तुलित


भारत पर मिस्र में चल रही उथल-पुथल का क्या असर पड़ेगा और इसके प्रति भारत का रवैया क्या हो, यह प्रश्न हर चितंनशील भारतीय के दिमाग में उठ रहा है। इस प्रश्न का सही उत्तर खोजने के लिए हमें काफी व्यापक क्षितिज की यात्रा करनी होगी, क्योंकि भारत और मिस्र दोनों ही अपने-अपने क्षेत्रों के सबसे बड़े देश हैं और पिछले 50 वर्षो में दोनों ने नेता-राष्ट्र की भूमिकाएं निभाई हैं। यदि हम सिर्फ भारत-मिस्र द्विपक्षीय संबंधों के सीमित कोण से विश्लेषण करेंगे तो उक्त प्रश्नों का उत्तर मिलना कठिन होगा।
भारत पर नहीं होगा खास असर
मिस्र की उथल-पुथल का सीधा असर भारत पर क्या पड़ सकता है? बहुत कम, शायद कुछ नहीं। इसके कई कारण हैं। पहला तो यह कि भारत की आम जनता के लिए मिस्र काफी दूर है। वह पाकिस्तान, नेपाल या बांग्लादेश नहीं है। मिस्र की घटनाएं टी.वी. चैनलों पर भारतीय जनता देख तो रही है लेकिन वह यह मानकर चलती है कि पश्चिमी एशिया के देशों में इस तरह की घटनाएं होती ही रहती हैं। कभी शाहंशाहे-ईरान, कभी सद्दाम हुसैन, कभी जाहिर शाह, तो कभी मुशर्रफ जैसे लोग या तो जनाक्रोश या किसी तख्ता-पलट के द्वारा हटा दिए जाते हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि मिस्र जैसे दूर-दराज देश में पहुंचकर कई भारतीय टीवी चैनल हमारी जनता को वहां का आंखों देखा हाल दिखा रहे हैं। स्वयं भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इस नाते भारत की जनता की सहानुभूति मिस्र की जनता के साथ जरूर है लेकिन उससे वह कुछ प्रेरणा ले, इसका कोई कारण नहीं है। भारत की जनता ने आपात्काल में जो संघर्ष किया और फिर इंदिरा गांधी जैसी महाप्रतापी प्रधानमंत्री को सूखे पत्ते की तरह हवा में उड़ा दिया, वह मिस्र तथा अन्य तानाशाही व्यवस्था वाले राष्ट्रों के लिए प्रेरणादायक प्रसंग है।
अल-कायदा होगा कमजोर
माना जा रहा है कि मिस्र की इस उथल-पुथल में से जो सबसे सबल बनकर उभरेगा, उस संगठन का नाम है- इखवान यानी इस्लामी ब्रदरहुड! इखवान की शाखाएं दुनिया के लगभग सभी मुस्लिम राष्ट्रों में है। क्या ये कट्टरपंथी लोग भारत के लिए खतरा बन सकते हैं? भारत को इनसे डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इखवान ने हिंसा का स्पष्ट विरोध किया है और वह संसदीय लोकतांत्रिक राजनीति में विश्वास करती है। मिस्र की पिछली संसद में इखवान के 88 सदस्य थे। कई अरब राष्ट्रों में इखवान के कार्यकत्र्ता स्थानीय चुनाव लड़ते हैं। इखवान एक मजहबी संगठन है लेकिन अल-कायदा से बिल्कुल अलग है। अल-कायदा के कुख्यात नेता ओसामा बिन लादेन और अल-जवाहिरी पहले इखवान में ही सक्रिय थे लेकिन अब वे इखवान को अपना दुश्मन मानते हैं। अल- कायदा भारत को भी अपना दुश्मन मानता है। वह पाकिस्तानी और अफगान आतंकवादियों से भारत पर हमले करवाता रहता है। यदि इखवान पार्टी मजबूत होगी तो अल-कायदा कमजोर होगा। दोनों में सीधा द्वंद्व होगा। इसमें में भारत का क्या नुकसान है?
इस्रइल के चलते अमेरिका का विरोध
इसमें शक नहीं कि इस्लामी ब्रदरहुड यानी इखवान के लोग अमेरिका का विरोध करते हैं। इसका मूल कारण इस्रइल है। अमेरिका इस्रइल का जीवनदाता है, इसीलिए इखवान उसका विरोधी है। इस्रइल का जैसा संबंध अमेरिका से है, भारत से कतई नहीं है। इसलिए इखवान के भारत से नाराज होने का कोई कारण नहीं है। इखवान के नेता मुस्लिम देशों के शासकों से इसलिए खफा हैं कि वे इस्लाम के आदशरे का उल्लंघन करते हैं। यह कसौटी भारत पर लागू नहीं होती। इसके अलावा मिस्र तथा अन्य देशों में इखवान का असर ऐसा नहीं है कि वह चुनाव लड़कर अपने दम पर सरकार बना ले। यही कारण है कि मिस्र के जनोत्थान में मिस्री इखवान के नेताओं ने अन्य सभी दलों के साथ सह-अस्तित्व कायम किया है और वह दादागीरी की मुद्रा धारण किए हुए नहीं है। यदि मिस्री बगावत के फलस्वरूप अरब देशों में इखवान का बोलबाला हो भी गया तो भारत के साथ उसके संबंध सहज ही रहेंगे। अफगानिस्तान के तालिबान नेताओं का अपने आखिरी दौर में जब पाकिस्तान से मोह- भंग हुआ तो उन्होंने भारत से गोपनीय संबंध बनाने की कोशिश की थी। कोई आश्र्चय नहीं कि सत्तारूढ़ होने के बाद इखवान भारत और अमेरिका के साथ भी सहज संबंध बनाने की कोशिश करे।
प्रगाढ़ बने रहेंगे भारत-मिस्र संबंध
जहां तक भारत-मिस्र द्विपक्षीय संबंधों का प्रश्न है, वे सदैव उत्तम ही रहे हैं। अब्दुल गमाल नासिर, अनवर सादात और होस्नी मुबारकतीनों राष्ट्रपतियों का लंबा दौर भारत के लिए कभी कष्टदायक नहीं रहा। एक-दूसरे के प्रति दोनों देशों में इतनी सद्भावना रही है कि वर्तमान उथल-पुथल के दौरान मिस्र में रहने वाले भारतीयों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया है। सैकड़ों भारतीय सुरक्षित लौट आए हैं। लगभग तीन बिलियन डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार और भारत के लगभग 20 बिलियन डॉलर के विनिवेश को भी कोई खतरा नहीं है। चाहे मुबारक की सरकार चली जाए या टिक जाए, भारत-मिस्री संबंधों में ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं आनेवाला है।
संतुलित है भारत सरकार की नीति
मिस्र की उथल-पुथल के दौरान भारत सरकार ने फूंक-फूंककर कदम रखा है। उसने ओबामा प्रशासन या उससे भी ज्यादा ईरान के आयतुल्लाह खामेनई की तरह मुबारक के विरूद्ध अपनी तोप के गोले नहीं बरसाए हैं। उसने जनोत्थान और जनाकांक्षा का समर्थन जरूर किया है यानी उसने दोनों टोकरियों में अपने आम रख दिए हैं। भारत सरकार इस बात को भली-भांति समझती है कि जिन देशों में बगावत खदबदा रही है, उनके अलावा भी कुछ देश ऐसे हैं जिनसे उसे बड़े पैमाने पर तेल खरीदते रहना है और अपने संबंध मधुर बनाए रखना है। उसे पता है कि सारे मुस्लिम राष्ट्रों में न तो बगावत होने जा रही है और न ही वे ट्यूनीसिया, मिस्र, जॉर्डन या लीबिया की तरह तानाशाही हैं। उसे अमेरिका की तरह बार-बार शीर्षासन करने और अपने आप को अंतरराष्ट्रीय विदूषक बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। दिल्ली में बैठी सरकार का सर्वप्रथम दायित्व है, भारत के राष्ट्रहितों की रक्षा करना, जो वह बखूबी कर रही है। यह भारत के विदेश मंत्रालय की परिपक्वता है कि मिस्र के मामले में उसने अमेरिका और ईरान की तरह कोई अतिवादी रूख नहीं अपनाया।

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