Thursday, February 17, 2011

अमेरिका का अमानवीय चेहरा


अमेरिका की ट्राई वैली यूनिवर्सिटी में भारतीय छात्रों के साथ ठगी और इसके बाद उनके पैरों में रेडियो कॉलर लगाने के अमानवीय कृत्य ने अमेरिका के दोहरे चेहरे को बेनकाब कर दिया है। ज्वलंत प्रश्न यह है कि पूरी दुनिया को मानवाधिकारों की सीख देने का ढिंढोरा पीटने वाला अमेरिका स्वयं उन पर अमल क्यों नहीं करता है? हालांकि भारत सरकार के तीखे प्रतिरोध के बाद अमेरिका ने इन छात्रों के प्रति नरम रवैया अपनाने के संकेत दिए हैं, लेकिन इससे क्षति की भरपाई होती नहीं दिखती। ट्राई वैली यूनिवर्सिटी में कुल डेढ़ हजार छात्र पंजीकृत हैं, जिनमें 95 फीसदी छात्र अकेले भारत से हैं। इनमें से अधिकांश आंध्र प्रदेश से हैं। इस यूनिवर्सिटी को यूएस इमिग्रेशन एंड कस्टम इंफोर्समेंट (आईसीई) ने इमिग्रेशन रैकेट का जरिया मानते हुए बंद करा दिया है। दरअसल, ट्राई वैली यूनिवर्सिटी गुणवत्ता का दावा करने वाली एक क्रिश्चियन मतावलंबी संस्था है, जिसकी स्थापना सूसान जियाओ-पिंग सू ने की थी। इस यूनिवर्सिटी में प्रवेश के लिए छात्रों को जीमेट, जीआरई तथा टॉफेल जैसी कठिन प्रवेश परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने की शर्त नहीं थी तथा सेमेस्टर शुल्क भी बहुत कम था। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने आई-20 नाम से ऐसे शैक्षिक दस्तावेज तैयार कर रखे थे, जिससे छात्रों को एफ-वन छात्र वीजा मिलने में आसानी हो जाती थी। इसके अतिरिक्त ट्राई वैली यूनिवर्सिटी ने अपने प्रचार दस्तावेज में यह भी उल्लेख कर रखा था कि इसमें छात्र को प्रवेश की शत-प्रतिशत गारंटी है, क्योंकि इसकी सभी कक्षाएं ऑनलाइन हैं। यूनिवर्सिटी का यह भी साफ कहना था कि कोई भी छात्र फेल नहीं होगा, बल्कि सभी को शर्तिया ए-ग्रेड प्रदान किया जाएगा। प्रवेश के प्रथम दिन से ही वर्क परमिट के आधार पर छात्रों को अमेरिका के किसी भी शहर में कार्य करने की आजादी का दावा इस विश्वविद्यालय के दस्तावेजों में किया गया था। भारत जैसे विकासशील देशों के उच्च-मध्यम वर्गीय लोग भारी-भरकम धनराशि का जुगाड़ कर अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेशी संस्थानों में भेजते हैं। यह भी सच है कि इनकी फर्जी विश्वविद्यालयों से सांठ-गांठ होती है। ऐसे सभी छात्रों को ये एजेंसियां कुछ दिन कोचिंग संस्थाओं में रखकर ट्राई वैली जैसी यूनिवर्सिटी में प्रवेश दिला देती हैं। उसी प्रवेश के आधार पर उन्हें आसानी से छात्र वीजा मिल जाता है। सस्ती व सुलभ विदेशी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के झांसे में आकर छात्र ऐसे चक्रव्यूह में फंस जाते हैं, जहां प्रवेश जितना आसान है उससे बाहर निकलना उतना ही मुश्किल। अब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि अमेरिका की ट्राई वैली यूनिवर्सिटी एक फर्जी विश्वविद्यालय है, जो भारतीय छात्रों से मोटी फीस वसूलकर गैरकानूनी ढंग से शैक्षिक प्रपत्रों के आधार पर उन्हें छात्र वीजा दिला रही थी। यहां विचारणीय प्रश्न यह है कि आखिर उन भारतीय छात्रों का क्या दोष है, जिन्हें रेडियो कॉलर पहनाया गया है। असल दोषी तो वे लोग हैं जिन्होंने प्रवेश के नाम पर ठगी की है। लगता है कि अमेरिका अभी भी अपनी औपनिवेशिक छवि से मुक्त नहीं हो सका है। ट्राई वैली यूनिवर्सिटी में भारतीय छात्रों के पैरों में मध्ययुगीन गुलामों के पैरों में डालने वाली पीतल की घंटियों की तर्ज पर इलेक्ट्रॉनिक्स घंटियों का बांधा जाना औपनिवेशिक मानसिकता की कड़वी स्मृतियों को ताजा करता है। इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि उच्च-मध्यम वर्ग के छात्र भारत की उच्च शिक्षा के ढांचे की नाकामी के चलते ही विदेशों का रुख कर रहे हैं। इसी वजह से भारत उच्च शिक्षा के क्षेत्र में देश के बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों के लिए ही नहीं, बल्कि विदेशों के लिए भी एक बहुत बड़ा बाजार बनकर उभरा है। भारत के लगभग दो लाख छात्र उच्च शिक्षा के लिए प्रति वर्ष विदेशी विश्वविद्यालयों का रुख करते हैं। पिछले कुछ वषरें में ऑस्ट्रेलिया जाने वाले छात्रों पर नस्लीय हमलों की घटनाएं हम सभी के सामने हैं। बस अंतर केवल इतना है कि ऑस्ट्रेलिया की उच्च शिक्षण संस्थाओं में अध्ययनरत भारतीय छात्र नस्लीय भेद के शिकार हुए थे, तो अमेरिका में औपनिवेशिक मानसिकता से प्रताडि़त हुए हैं। उदारीकरण के माहौल में यदि सरकारों ने उच्च शिक्षा, कारोबार, नौकरी के लिए अपने द्वार खोले हैं तो उनकी सुरक्षा का उत्तरदायित्व भी उनका ही बनता है। विलंब से ही सही रेडियो कॉलर की इस अमानवीय घटना से केंद्र सरकार गहरी नींद से जागी है। विदेशी संस्थाओं में छात्र भेजने वाली संस्थाओं के पंजीकरण से निश्चय ही उच्च शिक्षा के नाम पर होने वाली धोखाधड़ी में कमी आएगी। वैसे, एजेंसियों के पंजीकरण मात्र से शैक्षिक फर्जीवाड़ा दूर नहीं होगा, बल्कि इन संस्थाओं और बिचौलियों का सशक्त तंत्र तोड़ने के लिए फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दिए जाने शिक्षा वीजा पर भी पैनी निगाह रखने की महती आवश्यकता है। (लेखक समाजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

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