Wednesday, February 23, 2011

अरब-अफ्रीकी देशों में जनक्रांति


ऐसा लगता है कि अरब-अफ्रीकी देश बारूद के ढ़ेर पर बैठे हुए थे। ट्यूनीशिया में एक गरीब शिक्षित सब्जी बेचने वाले युवक को पुलिस ने एक थप्पड़ लगाया। उस युवक ने आत्महत्या कर ली जो ट्यूनीशियाई टीवी पर दिखाया गया। लोग पहले से ही ट्यूनीशिया के तानाशाह राष्ट्पति जिने अल बेन अली के अत्याचारों से तंग थे। जनता भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी की शिकार हो रही थी। ऐसे में अचानक ही राष्ट्पति जिने अल बेन अली के खिलाफ विद्रोह शुरू हो गया। 23 वर्षो से काबिज अली को दूसरे देश भागना पड़ा। ट्यूनीशिया की क्रांति से मिस्र की जनता ने सबक लिया। प्राय: दो सप्ताह तक चले जनान्दोलन के कारण 30 साल से काबिज मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को पद त्यागना पड़ा। देश का शासन सेना की एक जनरल काँसिल के हाथों में आ गया है जो अंतरिम सरकार चला रही है। वह आगामी छ: महीनों में चुनाव कराकर एक चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना करेगी तथा एक नया संविधान भी बनाएगी । मिस्र के बाद दूसरे अरब देश बहरीन में जनाक्रोश की लहर फैली। छोटा सा यह खाड़ी देश अमेरिका का पिछलग्गू रहा है। यहां अमेरिका का एक सैनिक बेड़ा भी है जिसमें प्राय: 4 हजार अमेरिकी सैनिक हैं। इसके राष्ट्राध्यक्ष बादशाह हमाद बिन इसा अल खलीफा हैं। बहरीन में दो तिहाई जनता शिया मुस्लिम है और अल खलीफा और उनके मुट्ठीभर समर्थक सुन्नी हैं। सुन्नियों ने शिया मुसलमानों पर पिछले कुछ वर्षों में बहुत अत्याचार किया है। राजधानी मनाना में पर्ल चौकपर प्रदर्शनकारियों ने शाह परिवार के खिलाफ प्रदर्शन किया और देश में लोकतंत्र बहाल करने की मांग की। शाह ने टैंकों से प्रदर्शनकारियों पर गोली चलवा दी जिससे अनेक प्रदर्शनकारी मारे गये। यह खबर सारे संसार में फैल गई और अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने शाह को सलाह दी कि वे प्रदर्शनकारियों पर गोली नहीं चलावें और विपक्ष के प्रतिनिधियों से बातचीत करने का प्रयास करें अन्यथा स्थिति काबू से बाहर हो जाएगी। शाह ने भी दीवार की लिखावट को देखा और प्रदर्शनकारियों को इजाजत दे दी कि वे पर्ल चौक’ में दुबारा से शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर सकते हैं। 
प्रदर्शनकारियों के लिये यह बहुत बड़ी जीत थी। शाह ने अपने सबसे बड़े पुत्र को सलाह दी कि वे विरोधी नेताओं से बात करें परन्तु विरोधी नेता अब भी अपनी जिद पर अड़े हुए हैं और बराबर यही कह रहे हैं कि जब तक सरकार नहीं बदलेगी तब तक वे कोई भी समझौता वार्ता करने को तैयार नहीं है। बहरीन की देखादेखी लीबिया में भी जनान्दोलन शुरू हो गया है। लीबिया में कर्नल गद्दाफी पिछले अनेक वर्षों से सत्ता पर काबिज हैं। देश में भ्रष्टाचार, बेकारी और महंगाई चरम सीमा पर है। देखते ही देखते लीबिया में जनान्दोलन शुरू हो गया है और राजधानी त्रिपोली से छ: सौ मील दूर बेंधाजी शहर में प्रदर्शनकारियों ने जेलों और कई सरकारी इमारतों पर हमला कर दिया और उनमें आग लगा दी। ऐसा लग रहा है कि जनान्दोलन की यह आग धीरे-धीरे पूरे लीबिया में फैल जाएगी और संभवत: कर्नल गद्दाफी इस पर नियंतण्रनहीं पा सकेंगे। जनान्दोलन की आग दूसरे बड़े देश ईरान में भी फैल गई है जहां पर कट्टर मुल्ला और मौलवियों ने शासन पर कब्जा किया हुआ है और बन्दूक की नोक से उन्होंने विपक्ष का गला घोंट रखा है। जब देश में सन् 2009 में आम चुनाव हुए थे तब विपक्ष ने राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के चुनाव को धोखाधड़ी बताते हुए फिर से चुनाव की मांग की थी। परन्तु सरकार ने मांगें मानने के बजाए विपक्ष के मुख्य नेता मेहंदी करोबी को जेल में डाल दिया। इरान में जनान्दोलन तेजी पकड़ रहा है। यदि अन्य देशों की तरह ईरान में भी यह जनान्दोलन जारी रहा तो कोई आश्र्चय नहीं कि ईरान की सरकार को विपक्ष के सामने झुकना पड़े। ट्यूनीशिया और मिस्र से फैली हुई चिंगारी अब जंगल की आग की तरह अन्य अरब-अफ्रीकी देश मोरक्को, अल्जीरिया, यमन और जॉर्डन में भी तेजी से फैल रही है। सब जगह मुद्दे एक ही हैं, भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी। डंडे से यह आन्दोलन दबेगा नहीं। हां, इतना अवश्य है कि इन देशों में इंग्लैंड और अमेरिका की तरह का लोकतंत्र भले स्थापित न हो पाए परन्तु अफ्रीकी और अरब देशों में तानाशाही-राजशाही के दिन लद गए लगते हैं। अमेरिका और पश्चिम के देशों की सहानुभूति तानाशाहों के साथ रही है परन्तु वे भी हवा का रुख देखकर उन्हें विपक्ष की मांगों पर विचार करने की सलाह दे रहे हैं।


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