भारत चाहता है कि अमेरिका आतंक के खिलाफ लड़ाई में सहयोग के बदले पाकिस्तान को आधुनिक हथियार देना बंद करे, लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। पाकिस्तान और विदेशों में शायद ही कुछ लोगों को विश्वास होगा कि लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की सरकार अपने सेनाध्यक्ष से पूछे बिना राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में स्वतंत्र नीतिगत फैसले ले सकती है। बदकिस्मती से भारत के प्रति यह दोहरा रवैया है जिससे बेनजीर भुट्टो को भी परहेज नहीं था। तब वह शासन की त्रिकोणीय व्यवस्था का हिस्सा थीं। इसमें एक अनिर्वाचित राष्ट्रपति शामिल था जिसे प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष को बर्खास्त करने का अधिकार था। बेनजीर ने इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाई। जरदारी को ऐसे हश्र की कोई उम्मीद नहीं है इसलिए वह निश्चिंत हैं। आतंक के खिलाफ अपनी लड़ाई में अमेरिका की मदद में धीमी, लेकिन अलकायदा की अगुआई वाली यूनाइटेड जिहाद काउंसिल के आतंकवादियों के निकल भागने, उन्हें सुरक्षित पनाह देने, ट्रेनिंग और योजना बनाने में सहयोग देने में जरनल कियानी की दोहरी नीति से परेशान होकर अमेरिका अफगान-पाक सीमा के पास आतंकवादियों के ठिकानों पर ड्रोन हमलों में तेजी दिखा रहा है और इस काम में अमेरिकी सीआइए के जासूसों का जाल हमलों के लिए ठिकानों को चुनने और उनके सही स्थान के बारे में खुफिया जानकारी उपलब्ध करा रहा है। अमेरिकी सैन्य दबाव का मकसद अफगान तालिबान के हक्कानी गुट और राष्ट्रपति हामिद करजई के बीच सुलह-सफाई कराने में पाक सेना की मदद लेना है ताकि जुलाई 2011 की शुरुआत में अमेरिकी सेना की सिलसिलेवार वापसी तक यह काम हो जाए। खबर है कि करजई ने हक्कानी नेताओं के साथ अनौपचारिक रूप से संपर्क कायम कर लिया है। इस दोहरी नीति का हैरान कर देने वाला पहलू यह है कि पाकिस्तान सेना ने स्वात इलाके में अपने ही नागरिकों पर बदले की जानलेवा कार्रवाई शुरू कर दी है। स्वात में ही पाकिस्तान सेना ने तहरीक-ए-शरिया-ए-नजफ-ए-मुसलमीन के नाम से सक्रिय तालिबान को कथित तौर पर रोकने के लिए एक व्यापक सैन्य अभियान चलाया था। स्थानीय लोगों ने देखा कि किस तरह पाक सेना ने एक बड़े सैन्य अभियान का दिखावा करते हुए भारी गोलाबारी की, लेकिन आतंकी खुलेआम लोगों को परेशान करते रहे। इस नई दोमुंही रणनीति की पराकाष्ठा मुंबई हमलों के दौरान नरीमन प्वांइट पर आतंकवादियों द्वारा यहूदी दंपत्ति की हत्या के सिलसिले में रिश्तेदारों द्वारा दर्ज कराए गए एक आपराधिक मामले में देखी जा सकती है जिसमें पाक सेना और आइएसआइ के मौजूदा महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल शुजा पाशा को आरोपी बनाया गया है। अदालत ने समन भी जारी कर दिया है और अब देखना है कि जनरल कियानी की प्रतिक्रिया क्या होगी, जिन्होंने मुंबई हमलों की जांच में मदद करने के लिए आइएसआइ प्रमुख को मुंबई भेजने के जरदारी सरकार के प्रयासों को नाकाम कर दिया था। टाइम्स स्क्वयेर के नाकाम बम हमलावर फैजल शहजाद के पिता जो पाक वायुसेना के पूर्व एयर मार्शल थे, से पूछताछ की अमेरिकी कोशिशों को हालांकि रोक दिया गया था। इसमें कैरी-लूगर बिल की मुखालफत करने में सबसे आगे थे, जिसमें अरबों डॉलर की अमेरिकी मदद को पाक की जमीन से आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई के पुख्ता सबूत से जोड़ा गया। अमेरिकी सरकार की मौन स्वीकृति और शक्तिशाली यहूदी लॉबी के समर्थन के बिना यह अदालती मामला दर्ज ही नहीं हो सकता था। अगर जनरल पाशा अमेरिकी अदालत में हाजिर नहीं होते हैं तो आइएसआइ प्रमुख और उनको बचाने की कोशिश कर रहे पाक सेनाध्यक्ष के खिलाफ इंटरपोल द्वारा रेड कार्नर नोटिस जारी हो सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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