कुल्लू से तिब्बतियों के धर्म गुरु करमापा दोरजी के मठ से मिली करोड़ों की विदेशी मुद्रा के सिलसिले में भले ही जांच चल रही हो, लेकिन तिब्बती शरणार्थियों की मानें तो करमापा अवतार उस राजनीति के शिकार हुए हैं, जो सिक्किम और हिमाचल में रह रहे करमापाओं के गुरुओं के बीच प्रतिद्वंद्विता से उपजी है। करमापा का संप्रदाय सबसे बड़े तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के संप्रदाय से भी पुराना है। करमापा मठ में मिली राशि किसकी है, किसकी नहीं, यह भले ही जांच का विषय है, लेकिन तिब्बती समाज मानता है कि इस घटनाक्रम को दो करमापाओं की प्रतिद्वंद्विता से जोड़कर देखा जाना चाहिए। प्रसिद्ध इतिहासकार और तिब्बती शरणार्थी छेरिंग दोरजी का भी यही मानना है। करमापा के अवतारवाद को लेकर शमर और ताई सीतू रिंपोछे का आपसी द्वंद्व कई वर्षो से जारी है। ताई सीतू रिपोंछे करमापा के गुरु और बेहद चुस्त भी माने जाते हैं। उन्हें एक बार भारत से निकलने के आदेश दिए गए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद उन्हें भारत में रहने दिया गया। उनका केस जानेमाने वकील राम जेठमलानी ने लड़ा था। ताई सीतू का संबध चीन से भी गहरा बताया जाता है। छेरिंग दोरजे के मुताबिक उग्येन त्रिनले दोरजे को 17वें करमापा के रूप में मान्यता ताई सीतू रिंपोछे के इस दावे के बाद मिली कि उनके पास 16वें करमापा का वसीयतनुमा पत्र है। वह उग्येन त्रिनले दोरजी को उनके बचपन में चीन भी घुमा लाए थे, जब उग्येन अभी थुरफू (तिब्बत) में रहते थे। ताई सीतू के कुछ भारतीय अफसरों से भी गहरे संबंध बताए जाते हैं। उधर, सिक्किम वाले करमापा के गुरु शमर का संबंध भूटान के राज परिवार से है। लाहौल-स्पीति में दलाईलामा से अधिक करमापा के अनुयायी हैं। बौद्ध धर्म का इतिहास बताता है कि करमापा 12वीं शताब्दी वाले काग्यू संप्रदाय से ताल्लुक रखते हैं, जबकि दलाईलामा 15वीं शताब्दी के जिलुपा संप्रदाय से हैं। बकौल दोरजे, करमापा भारतीय चौरासी सिद्धों में सरापा से अस्सी प्रतिशत मिलते हैं। ऑस्टि्रया के वियना विश्वविद्यालय, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, रूस, मंगोलिया सहित कई देशों में बौद्ध धर्म पर शोध पत्र पढ़कर लौटे 76 वर्षीय वयोवृद्ध साहित्यकार छेरिंग दोरजी मानते हैं कि लाहुल स्पीति में करमापा उग्येन त्रिनेल दोरजी के अनुयायी दलाईलामा से ज्यादा हैं। उनके लिए करमापा आज भी सम्मान के योग्य हैं। बकौल छेरिंग दोरजे करमापा बनाने के लिए शंबर और ताई सीतू रिपोंछे की आपस में खींचतान का भी हालिया घटनाक्रम से संबंध हो सकता है। छेरिंग दोरजी इस बात को भी नहीं नकार रहे कि इसके पीछे शमर का भी हाथ हो सकता है, क्योंकि जंग वर्चस्व की है। हिमाचल में करमापा अवतार को मानने वाले अधिक हैं। किन्नौर में कनम गांव के पास इनका करीब 300 साल पुराना मठ है। दोरजे कहते हैं कि करमापा के अनुयायी सबसे अधिक ताईवान में हैं और अनुयायी की आड़ में कई चीनी भी यहां की खबरें लेने आते हैं। हालिया घटनाक्रम से अनुयायियों को ठेस अवश्य ही पहुंची है, लेकिन करमापा के प्रति सम्मान बरकरार है। दोरजी बौद्ध धर्म से भी पुराने बोन धर्म के इतिहास पर पुस्तक लिख चुके हैं। छेरिंग दोरजी का कहना है कि पहले करमापा कारमा पक्षी के देहावसान के बाद ही करमापा अवतार की परंपरा शुरू हुई। उससे पहले मठों पर लोगों का गद्दीनशीन किया जाता था।
No comments:
Post a Comment