तालिबान के वर्गीकरण पर लेखक की टिप्पणी
कुछ लोग पाकिस्तान और अफगानिस्तान को गृह युद्ध से बचाने के लिए कथित अच्छे तालिबान से बातचीत करने की पैरवी करते हैं, तो कुछ का मानना है कि दोनों तालिबानों में बुनियादी अंतर नहीं है और किसी भी तालिबान से बातचीत करने का कोई औचित्य नहीं है। लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तालिबान हैं और वे उन मुस्लिम देशों में अपने पंजे फैला सकते हैं, जहां तानाशाह और जन-विरोधी शासकों के खिलाफ व्यापक जन आंदोलन हो रहे हैं। इन हालात में सवाल उठ रहे हैं कि अच्छे तालिबान कौन हैं, कहां हैं और एक अच्छे तालिबान ने अब तक क्या अच्छा किया है? इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि तालिबान की कोई राष्ट्रीयता नहीं है और उन्हें इसका कोई पछतावा भी नहीं है। उनका एकमात्र एजेंडा आतंक के जरिए सत्ता हासिल करना है। सर्वविदित है कि तालिबान अच्छे हों या बुरे वे उग्रवाद, असहिष्णुता और कट्टरपंथ का ही पाठ पढ़ाते हैं और उनके जिहाद के यही तीन साधन हैं। हाल ही में, पाकिस्तान पंजाब के उदारवादी गवर्नर सलमान तसीर की उनके कट्टरपंथी अंगरक्षक मुमताज कादरी ने हत्या कर दी थी। उनकी हत्या से दो बातों का खुलासा होता है। पहली, पाकिस्तान के पुलिस प्रशासन में आतंकियों की घुसपैठ हो गई है। दूसरी, ये लोग पाकिस्तान में उदारपंथियों की आवाज को दबाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। सलमान तसीर की हत्या पर अच्छे तालिबान की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है और वे सामने आ कर अपने अच्छेपन का सबूत देने की हिम्मत नहीं कर रहे हैं। वे किस प्रकार के अच्छे पाकिस्तानी और अच्छा पाकिस्तान बनाना चाह रहे हैं? जहां कहीं भी अलगाववाद, आत्मघाती बम हमले और सड़कों पर हिंसा की घटनाएं होती हैं, तालिबान वहां अवश्य ही मौजूद होते हैं। पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान तथा अफगानिस्तान के विभिन्न पख्तून, ताजेक और उज्बेक इलाकों तथा विवादास्पद उत्तरी इलाकों में विभिन्न तालिबान समूहों में तरह-तरह के मुखौटे ओढ़े जातीय अलगाववाद के विभिन्न सूत्र नजर आते हैं। इन दिनों उत्तरी और पश्चिमी पंजाब बनाने के लिए पंजाब के एक और विभाजन की मांग करने वाले सेराइकी आंदोलन की आड़ में तालिबान आतंकवादी और उनके पिछलग्गू अपनी गतिविधियां चला रहे हैं। लश्कर-ए-झंगवी ऐसा ही एक कुख्यात कट्टरपंथी आतंकवादी संगठन है। सितंबर 2009 में स्वात का नियंत्रण फिर से सेना के हाथ में आ जाने के बाद से तालिबान द्वारा सार्वजनिक रूप से कोड़े मारने और फांसी पर लटकाए जाने की घटनाएं लगभग बंद हो गई हैं। इसके बावजूद, ह्यूमन राइट्स वाच को जिले में सेना और पुलिस द्वारा उत्पीड़न की खबरें मिल रही हैं। इनमें मार डालने, मनमर्जी से हिरासत में लेने, जबरन बेदखल करने और घरों को गिरा देने की घटनाएं शामिल हैं। ह्यूमन राइट्स वाच ने इनमें से कुछ आरोपों की जांच की और कई लोगों को मौत के घाट उतारे जाने के मामले भी दर्ज किए हैं। ह्यूमन राइट्स वाच की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान सुरक्षा बलों पर संदिग्ध बलूच उग्रवादियों को जबरदस्ती गायब करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। उग्रवादी संगठनों ने गैर-बलूची नागरिकों, शिक्षकों और शिक्षा सुविधाओं पर हमले तेज कर दिए। 2010 में जनवरी-अक्टूबर के दौरान नौ शिक्षाकर्मी मारे गए। क्या तालिबान के साथ समझौते से पाकिस्तान और अफगानिस्तान में सुरक्षा और स्थिरता मजबूत होगी? तब तक तो नहीं, जब तक कि सुशासन या समझौतों के जरिए नागरिक व सैन्य प्रतिष्ठान तथा धार्मिक व आतंकवादी संगठनों को मानवाधिकारों के उल्लंघन से नहीं रोका जाता। दुश्मन से गलबहियां डालने से बात नहीं बनेगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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