Thursday, February 17, 2011

दिल्ली की अजीबोगरीब चुप्पी


भारत की सत्ताओं को जन विप्लव से डर लगता है। उन्हें खतरा यह है कि अगर मिस्र में परिवर्तन का समर्थन किया गया और कल भारत में भी ऐसी स्थिति पैदा हो गई, तो वे किस मुंह से उसका विरोध करेंगे
अरब जगत में मिस्र की घटनाओं ने खलबली मचा रखी है। पश्चिमी देशों की राजधानियों में राजनियक गुफ्तगू शुरू हो गई है। अखबारों के पन्ने मिस्र की जनता के स्वत:स्फूर्त विद्रोह की खबरों से रंगे जा रहे हैं पर भारत की राजनीति अजीबो गरीब ढंग से खामोश है। भारत में भी बड़ी तादाद में मुसलमान रहते हैं इसलिए यह एक वाजिब उम्मीद है कि मिस्र की घटनाओं की प्रतिध्वनियां यहां भी सुनी जाएं। अहले-मजहब तो खामोशी अख्तियार किए ही हुए हैं, सेक्युलर मुस्लिम बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ भी चुप्पी साधे हुए हैं। मामला सिर्फ इस्लामी दुनिया का नहीं है, सेक्युलर राजनीति की दृष्टि से भी यह एक महत्वपूर्ण घटना है। असली मुद्दा तानाशाही बनाम लोकतंत्र का है, जिस पर पक्ष लेने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। लेकिन भारत की राजनीति इतनी ठस हो चुकी है कि वह किसी भी विषय पर कोई सैद्धांतिक स्टैंड लेने से घबराती है। अगर संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस आदि देश अपना- अपना रुख सार्वजनिक कर रहे हैं और बता रहे हैं कि मिस्र को किस तरफ बढ़ना चाहिए, तो भारत, जो हफ्ते में पांच बार विश्व शक्ति के रूप में अपने उभरने की र्चचा करते नहीं अघाता है, इतने अहम मसले पर खामोश क्यों है?
ज्यादा खामोशी भी ठीक नहीं
सिर्फ मीडिया के लोग खबर दे रहे हैं और कमेंट भी कर रहे हैं। वे भी चुप रहते, तो हम इसे चुप्पी का राष्ट्रीय षड्यंत्र कह सकते थे। ऐसी कोई साजिश दिखाई नहीं पड़ती, पर कशमकश बहुत गहरी है। अगर ज्यादा बोलना अक्लमंदी नहीं है, तो ज्यादा खामोश रहना भी शक पैदा करता है। मिस्र पर हमारी राजनीतिक और सामाजिक शक्ति के बाकी केंद्रों की खामोशी चीख-चीख कर कह रही है कि हम कुछ भी बोल कर जोखिम नहीं ले सकते। उनका नजरिया यह जान पड़ता है कि मामला एक मुस्लिम देश का है, इसलिए हमारे लिए राजनीतिक रूप से बहुत ही संवेदनशील है। हमें कोई ऐसा वक्तव्य नहीं देना चाहिए जिसके परिणामों के बारे में हम आश्वस्त नहीं हो सकते। भारत सरकार इसलिए भी पसोपेश में है कि उसके पैर इस्रइल से दोस्ती की ओर बढ़ रहे हैं और होस्नी मुबारक अरब राजनीति में इस्रइल के खैरख्वाह रहे हैं। मुबारक के जाने के बाद अरब पड़ोसियों से घिरे इस्रइल की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी लेकिन अमेरिका तक जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इस्रइल का सबसे बड़ा पैरोकार है और मिस्र को हर साल अरबों डॉलर की सहायता देता रहा है, होस्नी मुबारक को चुपके से खिसक जाने की सलाह दे सकता है, तो भारत खुल कर क्यों नहीं कह सकता है कि तानाशाही किसी की भी हो, बुरी है और लोकतंत्र के लिए जहां भी संघर्ष चल रहा है, उसका हम समर्थन करते हैं? यह तर्क हर लिहाज से फालतू है कि अगर मुबारक की सत्ता खत्म हो जाएगी, तो वहां मुस्लिम उग्रवाद हावी हो जाएगा। मिस्र के नागरिक विद्रोह या गृह युद्ध को, जिसमें सेना धीरे-धीरे नागरिकों का पक्ष लेने लगी है, शुरू में इसी नजरिए से देखा गया था। लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि जन विद्रोह का पलड़ा बहुत भारी है और राजा का बाजा बज चुका है, तब मुबारक के अंतरराष्ट्रीय शुभचिंतकों के पांव भी कांपने लगे। आखिर कोई भी सत्ता अतीत से नहीं, वर्तमान और भविष्य से संवाद बनाती है। मुबारक अब मिस्र के लिए अतीत माने जा सकते हैं। उनका वर्तमान रेत की इमारत की तरह धंस रहा है और अपनी भविष्यहीनता को उन्होंने खुद देख लिया है। इसलिए उन पर दांव लगा कर अमेरिका को क्या हासिल होना है? लेकिन भारत की सत्ताओं को जन विप्लव से डर लगता है। उन्हें खतरा यह है कि अगर मिस्र में परिवर्तन का समर्थन किया गया और कल भारत में भी ऐसी स्थिति पैदा हो गई, तो वे किस मुंह से उसका विरोध करेंगे?
ऐसा सेक्युलरवाद किस काम का
जहां तक होस्नी मुबारक के सेक्युलर होने का सवाल है, यह उतना सीधा मामला नहीं है जितना मान लिया गया है। सेक्युलरवाद के नाम पर अगर कोई शख्स अपने देश में लगातार इमरजेंसी बनाए रखे, विपक्षी दलों को काम न करने दे, सेंसरशिप को जारी रखे और राष्ट्रपति पद के हर चुनाव में अपने सिवाय किसी और को उम्मीदवार न बनने दो, तो ऐसे सेक्युलर शासन का अभिनंदन करना किसी भी दृष्टि से नैतिक नहीं हो सकता। सेक्युलर होने का मतलब लोकतंत्र को तिलांजलि दे देना नहीं होता, न ही शासन को निरंतर भ्रष्टतर बनाते जाना होता है। दुर्भाग्यवश भारत में भी ऐसा ही सेक्युरवाद चल रहा है, जिसे बौद्धिक वर्ग का पूर्ण समर्थन है। समर्थन के पीछे डर यह है कि कांग्रेस को बेदखल किया गया, तो भाजपा सत्ता में आ जाएगी। यह डर भी एक तरह की सांप्रदायिकता नहीं तो गिरोहबद्धता जरूर है। जिस तरह सांप्रदायिक शक्तियां लोकतंत्र की बुनियादी मान्यताओं का तिरस्कार करती हैं, उसी तरह सेक्युलरवाद भी लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों की अवहेलना कर रहा है। इसलिए मिस्र से तानाशाही को तो विदा होने ही देना चाहिए, इससे पैदा होने वाले शून्य को भरने के लिए चाहे जो भी आए। जिस जनता में इतना दम है कि वह मुबारक की तीन दशक पुरानी और सख्त तानाशाही के पांव उखाड़ सकती है, वह धार्मिंक कट्टरपंथ से भी निबट लेगी।
जन विद्रोह प्रेरणा तो बनेगा ही
फ्रांसीसी क्रांति के बाद इंग्लैंड के बुद्धिजीवी एडमंड बर्क ने उसे भीड़तंत्र की विजय कहा था। बर्क का कहना था कि कोई भी राज्य तभी चल सकता है जब नागरिक अनुशासित हों। उस समय के प्रगतिशील और मानववादी विचारक टॉमस पेन ने बर्क की स्थापनाओं का तीव्र विरोध किया और कहा कि फ्रांसीसी क्रांति मानव अधिकारों की स्थापना के लिए एक महान संघर्ष है। अंतत: बर्क जैसे राज्यवादियों की आशंका गलत निकली और पेन की भविष्यवाणी सही साबित हुई। आज मिस्र में जन आक्रोश का जो उभार दिखाई दे रहा है, हो सकता है, वह तत्काल सफल न हो या भटक जाए, पर इसके पीछे कुशासन को बर्दाश्त न करने की जो भावना है, वह अरब जगत में ही, अन्य देशों में भी, जहां धर्म या किसी वाद के नाम पर तानाशाही चलाई जा रही है, भूकंप की लहरें पैदा करेंगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। जब राज्य का चरित्र जन-विरोधी हो जाए, तो इतिहास अराजकता को भी अपना औजार बना लेता है। आखिर होस्नी मुबारक का शासन भी क्या मूलत: अराजक नहीं रहा है ?

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