अमेरिका के ट्राई वैली विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने वाले भारतीय छात्रों ने अमेरिका में गैरकानूनी ढंग से प्रवेश नहीं किया है और न वे किसी राजनीतिक गतिविधि में शामिल हैं। उन्हें उसी तरह वीजा दिया गया जैसे किसी और यात्री को दिया जाता है। अब अगर अमेरिकी सरकार को पता लगा है कि ट्राई वैली विश्वविद्यालय गैर कानूनी है तो दोषी वे लोग हैं जिन्होंने यह ठगी की है। असली दोषी पर ध्यान देने के बदले उसके शिकार को परेशान करना मानवाधिकार के हिमायती अमेरिका का यह कैसा न्याय है?
बहुत पहले, सत्रहवीं शताब्दी में जब संयुक्त राज्य अमेरिका नाम का कोई देश नहीं था, यह क्षेत्र अंग्रेजों का एक उपनिवेश था और यहां गुलामों का व्यापार हुआ करता था। अमेरिका में बड़े-बड़े रैंच यानी पशु पालने वाली जागीरें हुआ करतीं थीं। लोग अक्सर एक-दूसरे के पशु चुराते रहते थे और गाय-बैल के मुद्दों पर मालिकों के बीच खूनी जंगें हुआ करतीं थीं। इसके लिए हर जागीरदार अपनी छोटी-मोटी फौज रखता था। ये पशुपालक और हथियारबद्ध रक्षक ही खूंखार काउ बॉय कहलाते थे। उस दौर में हजारों गाय-बैलों के बीच यह पहचान करना बड़ा मुश्किल होता था कि कौन किस की गाय या बैल है, इसलिए पहचान के उनको दागा जाता था। उनके शरीर पर गरम लोहे से अपने मालिक का निशान लगाया जाता था। इसे ब्रांडिग कहते थे। चोर कभी-कभी इन ब्रांडों को बदल भी देते थे। यह इन पशुओं की यातना का दौर था। इसी से ब्रांड शब्द चल निकला जो आज की विकसित दुनिया का बड़ा प्रभावकारी शब्द है। अब तो ब्रांड दवाई की भी होती है, कपड़ों की भी और स्कूलों व अस्पतालों की भी। इससे भी पहले यूरोप में कुष्ठ रोगियों के गले में घंटियां बांधी जाती थीं ताकि दूर से सुनाई दे जाए कि कोई कुष्ठ रोगी आ रहा है और समय रहते रास्ता बदल दिया जाए। यह तो इतिहास है जिसको जानकर हैरानी होती है कि मनुष्य दूसरों को दबाने के लिए किस प्रकार स्वयं भी पशुवत ही रहा है लेकिन सदियां बीत जाने के बाद भी अमेरिका में निदरेष विद्यार्थियों के पैरों में सोलहवीं सदी के यूरोपीय कुष्ठ रोगियों की तरह घंटियों की तर्ज पर रेडियो कॉलर बांध कर ही चलनेिफरने की अनुमति दिया जाना कल्पनातीत सा लगता है। ट्राई वैली विश्वविद्यालय के छात्रों के पैरों में मध्यकाल की पीतल की घंटियों की तर्ज पर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक घंटिया बांधी गई हैं जो दूर से ही अधिकारियों को अपनी तरंगों से बताती रहती हैं कि अमुक व्यक्ति कहां है और कहां जा रहा है। लगता है, अमेरिका की पुरानी औपनिवेशिक काल की वह आदत अभी गई नहीं है, भले ही उस का रूप बदल गया हो। आज इसे रेडियो कॉलर कहा जाता है जो उन खूंखार अपराधियों की ऐड़ियों में बांधा जाता है जिनके भाग जाने का खतरा होता है जैसे माफिया सरगना, हत्यारे, आतंकवादी या सुपारी लेने वाले । बहरहाल, ट्राई वैली में प्रवेश लेने वाले छात्रों का दोष यह है कि वे भी अन्य हजारों छात्रों की तरह इस भ्रमजाल में फंस गए कि अच्छी नौकरी पाने के लिए अमेरिकी विश्वविद्यालय का प्रमाणपत्र ही एकमात्र साधन है। कुछ शायद यह सपना भी पालते रहे हों कि अमेरिकी डिग्री पाने के बाद अमेरिका में ही रहने का मौका मिलेगा। इसके लिए वे शायद छोटे-माटे अपमान सहने के लिए मन को तैयार करके गए होंगे लेकिन उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था कि वे ऐसे चक्रव्यूह में फंस जाएंगे जिससे निकलना आसान नहीं होगा और निकलने पर उन्हें अपने देश में भी दागी माना जाने लगेगा। वे ऐसे ही एक अमेरिकी विश्वद्यिालय के फेर में आ गए जिस ने भारत में उन्हें ऐसे सब्जबाग दिखाए थे कि छात्रों को लगा कि सस्ते में काम हो जाएगा । इसीलिए न केवल भारत से सौ छात्रों ने वहां पंजीकरण किया अपितु अमेरिका में पढ़ रहे अन्य विश्वविद्यालयों से भी बहुत से छात्रों ने अपने विश्वविद्यालय बदल कर ट्राई वैली में ही शरण ली। ये छात्र उसी प्रकार धोखे के शिकार हुए, जिस प्रकार अक्सर पश्चिम एशिया जाने वाले मजदूर होते रहते हैं। देखा जाए तो उक्त छात्रों ने अमेरिका में गैर-कानूनी ढंग से प्रवेश नहीं लिया है और न वे किसी राजनीतिक गतिविधि में शामिल है। उन्हें उसी तरह वीजा दिया गया जैसे किसी और यात्री को दिया जाता है। उन्होंने अपनी ओर से कोई गलत बयान नहीं दिया है । अब अगर अमेरिकी सरकार को पता लगा कि ट्राई वैली विश्वविद्यालय गैर-कानूनी है तो दोषी तो वे लोग हैं जिन्होंने यह ठगी की है। असली दोषी पर ध्यान देने के बदले उसके शिकार को परेशान करना मानवाधिकार के हिमायती अमेरिका का कैसा यह न्याय है? मान लेते हैं कि अधिकारियों को आरंभिक जांच में सभी पर संदेह करना होता है और उन्होंने अभी छात्रों को दोषी घोषित नहीं किया है फिर भी उन्हें अनियमित रूप से पंजीकरण का ही तो दोषी ठहराया जा सकता है। किसी अपराध को साबित करने के पहले ही छात्रों के पांव में बेड़ियां डालने का आदेश कैसे दिया जा सकता है। इस तरह तो इन छात्रों को उन शातिर अपराधियों के समकक्ष खड़ा कर दिया गया है जिनकी अमेरिका में कमी नहीं है। इस मामले में अमेरिकी अधिकारियों और भारतीय अधिकारियों के बयानों से भी एक शर्मनाक तस्वीर बनती है। विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने अमेरिकी विदेश विभाग का ध्यान इस अन्याय के बारे में खींचा तो जरूर है लेकिन ऐसी दबी जुबान में कि उससे अमेरिकियों को मजाक ही सूझा। हमारे एक मंत्री ने तो कहा कि अमेरिकी अधिकारियों को इन छात्रों को ये रेडियो कॉलर नहीं बांधने चाहिए क्योंकि ये बड़े भारी हैं और इनके साथ चलना मुश्किल होता है। रेडियो कॉलर अगर इसलिए नहीं बांधने चाहिए कि वे भारी हैं तो मामला केवल यह बनता है कि कॉलर बांधना तो ठीक हैं लेकिन वे थोड़े हल्के होने चाहिए। इसका जवाब जो होना चाहिए, वही एक अमेरिकी राजनयिक ने दिया भी है। उनका कहना है कि वे तो बड़े सुंदर हैं। हमारे बहुत से फिल्मी सितारे बड़े लोग भी जेल में कुछ दिन बैठने के बदले इन्हें पहनना सही समझते हैं। संदेश साफ है कि कॉलर हटाएंगे तो जेल भेज देगें। उन्होंने यह भी बताया कि वे तो वैसे ही हैं जैसे भारत में औरतें पांव में पहनती हैं। तो भारतीय छात्रों को बेडियां नहीं पायल पहना दी गई हैं। एक ओर से यह ऐसी प्रवृत्ति का परिचायक है जिसकी तह में अमेरिका की वही आदिम प्रवृत्ति है जिसमें अपने से भिन्न हर जाति और मनुष्य समुदाय को दोयम दज्रे का मानव समझा जाता रहा है लेकिन दूसरी और भारत की हीन भावना औेर दब्बू स्वभाव है जिसे हम राजनय कहते रहते हैं।
No comments:
Post a Comment