पिछले एक दशक में जीडीपी में लगभग पांच गुना वृद्धि कर चीन सबसे तेजी से आर्थिक विकास करनेवाला देश बन चुका है। क्रय शक्ति क्षमता के आधार पर इसकी जीडीपी दुनिया में दूसरे स्थान पर पहुंच चुकी है। यदि यही गति रही, तो 2012 तक आर्थिक मामलों में यह दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बन जाएगा। अमेरिका सहित दुनिया के बड़े-बड़े देश चीन की बढ़ती आर्थिक ताकत से भयभीत हैं। विश्व बैंक के आंकड़ों पर नजर डालें, तो 2009 में अमेरिका की जीडीपी में जहां दो प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, वहीं चीन की जीडीपी में 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है।
पहले चीनी अर्थव्यवस्था केंद्रीय योजना के आधार पर सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों द्वारा संचालित होती थी। पिछले लगभग दो दशकों से यह तेजी से बाजार के रास्ते पर चल रही है। हालांकि अब भी चीनी सरकार का अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण बना हुआ है, मगर बाजार वहां की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग बन चुका है। हालांकि पिछले लगभग दो वर्षों से चीन के नीति-निर्माताओं में एक खलबली-सी मची है। दरअसल चीनी अर्थव्यवस्था में कुछ ऐसे चिह्न दिखाई देने लगे हैं, जिससे लगता है कि यह देश अपनी विकास यात्रा को बहुत आगे नहीं ले जा पाएगा। बाजार आधारित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की एक विशेषता होती है कि उस पर पकड़ बनाए रखने के लिए घरेलू अथवा विदेशी मांग की पूर्ति करते हुए अतिरिक्त क्षमता और नए प्रकार के उत्पादों का निर्माण जरूरी होता है। पर यदि मांग में व्यवधान आता है, तो सृजित क्षमता का भरपूर उपयोग नहीं हो पाता। मंदी के चलते चीन भी आज विदेशी मांग की कमी से जूझ रहा है और उसकी क्षतिपूर्ति घरेलू मांग से हो रही है।
लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि अर्थव्यवस्था की यह तेजी सरकारी बैंकों की अंधाधुंध साख निर्माण और सरकार द्वारा भारी सहायता देने से आई है। चीन की आर्थिक बढ़ोतरी के आंकड़े साफ बताते हैं कि उत्पादन अब भी तेजी से बढ़ रहा है, जिसके चलते वह अपना माल दूसरे देशों में ‘डंप’ करने को मजबूर है। जबकि बीजिंग ने प्रांतों की सरकारों के ऋणों के आधिक्य पर रोक लगाई है, दूसरा घर खरीदने वालों के लिए उनकी हिस्सेदारी में इजाफा किया है और डेवलपरों के लिए पूंजी की अनिवार्यता बढ़ा दी है। ये सब उपाय गृह निर्माण क्षेत्र के विकास पर अंकुश तो लगाएंगे ही, आंतरिक मांग पर भी भारी असर डालेंगे। किसी भी देश में आंतरिक मांग वहां के आर्थिक विकास की प्राथमिक शर्त होती है और यह बात चीन पर और भी ज्यादा लागू होती है।
चीन सरकार ने ये कदम लगातार बढ़ती मुद्रा की पूर्ति से चिंतित होकर उठाए हैं। ‘पीपुल्स बैंक ऑफ चायना’ ने फिर ब्याज दर 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 6.06 प्रतिशत कर दिया है। यह वृद्धि नौ फरवरी, 2011 से लागू हो गई है। पिछले वर्ष भी अक्तूबर और दिसंबर महीने में बैंक दर में वृद्धि की गई थी। इस वर्ष केंद्रीय बैंक ने बैंक दर में कुल 0.25 प्रतिशत बिंदु की वृद्धि की है, जबकि बैंकों के नकदी जमा अनुपात में यह वृद्धि 0.5 प्रतिशत बिंदु की गई। यानी एक ओर तो बैंक दर बढ़ाकर केंद्रीय बैंक ने उधार की लागत को बढ़ाने का काम किया है, दूसरी ओर ‘सीआरआर’ बढ़ाकर बैंकों की उधार देने की क्षमता को भी कम कर दिया है।
जनवरी 2009 से दिसंबर 2010 के बीच चीन की मुद्रा की आपूर्ति में 61.4 प्रतिशत की वृद्धि (26 प्रतिशत वार्षिक) हुई, जबकि इस दौरान जीडीपी की वृद्धि दर लगभग 10 प्रतिशत वार्षिक के आसपास ही रही। जाहिर है कि मुद्रा आपूर्ति में अत्यधिक प्रसार से चीन में मुद्रास्फीति बढ़ती जा रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मुद्रास्फीति की दर 2010 में पांच प्रतिशत रही। पर चीन सरकार और केंद्रीय बैंकों की घबराहट से लगता है कि मुद्रास्फीति उससे कहीं ज्यादा है।
अमेरिका की मुद्रा की आपूर्ति मात्र 1,832 अरब डॉलर है और चीन में 4,008 अरब डॉलर है, जबकि चीन अमेरिकी अर्थव्यवस्था का लगभग आधा है। वैश्विक मंदी से निपटने की कवायद के कारण चीन की मुद्रा की पूर्ति में खासी वृद्धि हुई। लगातार बढ़ती मुद्रास्फीति, सार्वजनिक उद्यमों में अतिरिक्त क्षमता, घटती धातुओं की मांग-सभी चीनी सरकार की चिंता के सबब हैं। ऐसे में जो उपाय सरकार अपना रही है, उससे अर्थव्यवस्था में गिरावट की पूरी आशंका है। ऐसे में ‘ड्रैगन’ का दबदबा कितना रह पाएगा, यह समय ही बताएगा।
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