वर्षो से अरब दुनिया में जो सत्ताएं चल रही थीं उनके आगे एकाएक संकट खड़ा हो गया है। इन सत्ताओं के विरोध में जो उग्र-आंदोलन हो रहे हैं उनकी कुछ समय पहले तक कोई कल्पना भी नहीं कर पा रहा था। जनता के बीच पसरता विक्षोभ इतना तीव्र हो जाएगा और जन विरोध सीधा सड़कों पर आ उतरेगा इसका अनुमान वहां के सत्ताधारियों को भी नहीं था। अभी वहां उथल- पुथल जारी है लेकिन ऊं ट किस करवट बैठेगा इसका सही आकलन अभी कोई नहीं कर पा रहा है। क्या ये जन विक्षोभ वास्तविक लोकतंत्र की नींव रखेगा अथवा विक्षोभ ग्रस्त राष्ट्रों को अराजकता के भंवर में धकेल देगा। यह भविष्य के गर्त में है। इन्हीं सब अटकलों, अनुमानों को केंद्र में रखकर अरब दुनिया की स्थिति की पड़ताल कर रहा है इस बार का हस्तक्षेप
जब से मिस्र में राष्ट्रपति मुबारक के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाती बेचैन और बौखलाई जनता सड़कों पर उतर आई है तब से यह अटकलबाजी गर्म है कि इस भूचाल के बाद पूरे अरब जगत की काया पलट हो जाएगी और कुनबापरस्त भ्रष्ट तानाशाही का सफाया होने के बाद जनतंत्र के बिरवा लहलहाने लगेंगे। हमारी समझ में इस नतीजे तक पहुंचने में जल्दबाजी नहीं की जानी चाहिए।
अलग-अलग विशिष्टताएं
दुनिया के नक्शे पर जो विस्तृत भू-भाग अरब दुनिया के नाम से पहचाना जाता है उसमें स्थित राज्य एक जैसे नहीं है। एक ओर मिस्र और इराक जैसे देश हैं जो हजारों साल पुरानी सभ्यता के वारिस हैं तो सउदी अरब और जॉर्डन आदि ऐसे कृत्रिम राज्य भी हैं जिनका निर्माण प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेजों ने अपनी सामरिक जरूरतों के अनुसार टी इ लॉरेन्स नामक दुस्साहसिक की मदद से किया था। सिर्फ यह बात काफी नहीं कि अरब राज्यों में रहने वाले इस्लाम के अनुयायी है। शिया और सुन्नी सम्प्रदायों के बीच की खाई भी कम गहरी और खतरनाक नहीं है। खासकर तब जब शासक और जनता की मान्यताओं में फर्क हो। कुछ अरब देश अपनी भू-राजनीतिक स्थिति के कारण यूरोप के अधिक निकट रहे हैं और अभी हाल तक यह माना जाता था कि अल्जीरिया-मोरक्को, लीबिया और मिस्र जैसे देशों में राजनैतिक-सामाजिक जीवन अपने दूसरे बिरादरों की तुलना में कही अधिक आधुनिक और उदार है। सबसे बड़ा फर्क जो अरब दुनिया में हैं वह तेल संपदा की मिल्कीयत से जुड़ा हुआ है। जो देश विराट तेल भण्डार पर बैठे हैं उन्हें समृद्धि की मद ने आत्मघातक अहंकार से भर दिया है। वह निर्धन अरब देशों को हिकारत की नजर से देखते हैं। शीत युद्ध के वर्षो में जो अरब देश इस्रइल के साथ लड़े जाने वाले संग्राम के मोर्चे पर पहली पंक्ति में थे उन्हें सामरिक दृष्टि से अमेरिका और सोवियत संघ खास अहमियत देते थे। अरब जगत का एक छोर ईरान तक पहुंचता है जो फारसी संस्कृति का स्रेत और शिया अस्मिता का मुख्य केन्द्र है। इस भौगोलिक क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए ईरान और इराक के बीच लंबा संघर्ष भी चला है।
अमेरिका का अवसरवाद
एक दौर था जब मिस्र का शुमार गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के संस्थापकों में किया जाता था। जिस समय नासिर ने सत्ता ग्रहण की, उनके तेवर वास्तव में क्रांतिकारी थे। जब उन्होंने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण किया तब यह आशा जगी थी कि शायद पूरे उत्तरी अफ्रीका और इससे संलग्न अरब इलाके में समाजवादी विचारधरा का प्रसार होगा। आस्वान बांध के निर्माण के लिए मिस्र ने बेहिचक रूस से सहायता ली थी और पश्चिम को धता बता दी थी। तब से अब तक जाने कितना पानी नील नदी और दजला-फरात में बह चुका है। कैम्प डेविड समझौते के बाद अमेरिका, मिस्र को इस्रइल के करीब लाने और दूसरे समाजवादी रूझान के अरब देशों से दूर करने में सफल हुआ है। कभी ईरान के शाह अमेरिका के बड़े समर्थक साथी समझे जाते थे आज वहां कट्टरपंथी इस्लाम के दर्शन होते हैं। जिसके तेवर कोई तीस साल से अमेरिका विरोधी रहे हैं। अरबों के तेल पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए अमेरिका गिरगिट की तरह रंग बदलता रहा है। उसे इराक और मिस्र में भले ही जनतंत्र की फिक्र हो सउदी अरब के संदर्भ में यह सवाल उठाने की हिम्मत उसकी नहीं हो सकती। सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि कभी लीबिया को आतंकवादी राज्य करार देने वाला अमेरिका आज झकमार कर उसे गले लगाने को मजबूर हुआ है। जनतंत्र और मानवीय अधिकारों की दुहाई देते हुए दूसरे राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने को आतुर अमेरिका को कभी फिलीस्तीनी शरणार्थी याद नहीं आते।
अरब देशों की आपसी फूट
ऐसे हालत में जब लेबनान में इस्रइल के अत्याचारों का बदला लेने के लिए हिजबुल्ला का उदय होता है या अल्जीरिया, मिस्र, मोरक्को और जॉर्डन में कट्टरपंथी इस्लामी तत्व सिर उठाने लगते हैं तब इसे जनतंत्र की संभावना के रूप में देखने वाला नादान ही कहा जा सकता है। कई बरस पहले अरब लीग नामक एक संस्था का गठन हुआ था। आज यह नाम मात्र को ही शेष रही है। इसी तरह तेल उत्पादक और निर्यातक अरब देश भी अपना राजनयिक वजन बढ़ाने में असमर्थ रहे हैं। इसका असली कारण आपस की फूट और सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक क्षेत्र में व्याप्त विषमता और बुनियादी अंतर है। इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि अधिकांश अरब राष्ट्रों में या तो अमेरिका द्वारा समर्थित राजवंश शासन कर रहे हैं जैसे मॉरक्को, जॉर्डन, सउदी अरब तथा अन्य खाड़ी देशों में या वंशवादी फौजी तानाशाही की जकड़ आधी सदी से भी अधिक समय से बरकरार है। लीबिया, मिस्र, सीरिया इसी के उदाहरण है। अल्जीरिया की स्थिति में कुछ फर्क है। ट्यूनिशिया और यमन अभी अस्थिर है, सूडान का विखंडन हो रहा है और आसार यह नज़र आते हैं कि लंबे समय तक यह भू-भाग संकटग्रस्त रहेगा। अरब चाहे वह रेगिस्तानी हो या दलदली, बेशुमार अमीर हो या निर्धन, दुर्भाग्य से दकियानूसी कबाइली मानसिकता से ग्रस्त है। सिर्फ राजनयिक शिष्टाचार के नाम पर इस कड़वे सच को अनदेखा करना हमारे लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि टूटे दर्पण के टुकड़ों में बिखरे अक्स अलग-अलग देखने-पहचानने की कोशिश करें और जब इनमें हाथ लगाए तो यह सावधानी बरतें कि कोई किरच चुंभ न जाए।
भारत के लिए चुनौती भरे दिन
भारत के लिए आने वाले वर्ष बेहद चुनौती भरे होंगे। कुनबापरस्त तानाशाही के उन्मूलन के बाद यदि वहां फौज और उग्र इस्लाम का सन्नीपात ही उभरता है तो यह स्थिति निश्चय ही हमारे लिए चिन्ताजनक होगी। इस बात को भुलाया नहीं जा सकता कि हम अमेरिका के साथ करीब आने के चक्कर में फिलीस्तीनियों से दूर होते गए हैं तथा ईरान के मामले में आंख मूंदकर अमेरिकियों का अनुसरण करने के कारण अरब दुनिया में हमारी साख घटी है।
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