रेमंड डेविस की कार्रवाई ने बता दिया है कि पाकिस्तान धीरे-धीरे अफगानिस्तान बन चला है। वहां अमेरिकी गन लेकर चलते हैं और अमेरिकी सुरक्षा गार्ड बैठे हुए हैं। फिर अमेरिका को पाकिस्तान की संप्रभुता का कोई ख्याल नहीं है। वह कभी भी अफगानिस्तान की तर्ज पर पाकिस्तान में भी कार्रवाई कर सकता है..मेरिकी डिप्लोमेट रेमंड डेविस की कहानी सबको पता है। पिछले दिनों लाहौर में दो लोगों को गोली मार दी रेमंड डेविस ने। गोली मारने के बाद पाकिस्तानी पुलिस हरकत में आई। डेविस को गिरफ्तार कर लिया गया। उसके हाथ में हथकड़ी लगाकर कोर्ट में पेश किया गया। फिलहाल वह पुलिस रिमांड पर ही है। लाहौर हाईकोर्ट ने उसकी रिहाई पर रोक लगा दी है। लेकिन रेमंड डेविस के मसले पर पाकिस्तान और अमेरिका के बीच तनातनी बढ़ गई है। अमेरिका को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि उसकी रोटी पर पलने वाले पाकिस्तानी उसी के नागरिक को हथकड़ी लगाकर कोर्ट में पेश करें। रेमंड डेविस को लेकर पाकिस्तान की अगली जलालत देखने वाली है।
इस घटना के बाद अब नई सूचना है कि पाकिस्तान और अमेरिका के संबंधों में तनाव बढ़ गए हैं। कारण रेमंड डेविस ही है। पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के प्रस्तावित अमेरिकी दौरे की मंजूरी अमेरिकी प्रशासन ने नहीं दी। पिछले एक साल से लगातार पाकिस्तान जाकर अफगानिस्तान की लड़ाई में पाकिस्तान से सहयोग मांगने वाली हिलेरी क्लिंटन ने पाकिस्तानी विदेश मंत्री से मिलने तक से इंकार कर दिया। अमेरिका के इस व्यवहार से पाकिस्तान की संप्रभुता पर सवाल उठ गया है। क्या वाकई पाकिस्तान संप्रभु राष्ट्र है? अमेरिका ने आधार बनाया कि रेमंड डेविस के पास डिल्पोमेटिक पासपोर्ट था, इसलिए उसे पाकिस्तानी पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकती थी। अमेरिका का तर्क है कि वियना कन्वेंशन के तहत हुए समझौते के कारण रेमंड डेविस को पाकिस्तानी कोर्ट में ट्रायल से इम्यूनिटी मिली है, लेकिन पाकिस्तानी पुलिस ने इस दलील को नहीं माना। फिर भी अब यही दलील पाकिस्तान के गले की हड्डी बन गई है।
अंदेशा है कि रेमंड डेविस को लेकर पाकिस्तान में विवाद और बढ़ सकता है। कट्टपंथियों ने उसकी रिहाई का विरोध शुरू कर दिया है। इस तरह पाकिस्तान सरकार दो पाटों में फंस गई है। सरकार डेविस की रिहाई तो चाहती है, लेकिन उस पर कट्टरपंथियों समेत नवाज शरीफ का दबाव भी है। पाकिस्तानी अथॉरिटी की आंतरिक लड़ाई इस मसले पर सामने आ गई है। विदेश मंत्रालय, सेना का एक विंग और सरकार में शामिल कुछ लोग डेविस की रिहाई के लिए दबाव बना रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ एक विंग रिहाई के खिलाफ है। उधर पाकिस्तानी न्यायपालिका ने डेविस के खिलाफ स्टैंड ले लिया है। इससे सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इसके कारण भी साफ हैं। सरकार के पास सरकार चलाने के लिए धन नहीं है। सारा कुछ अमेरिकी मदद पर निर्भर है। पिछले साल बाढ़ आई, लेकिन विदेशी मदद नहीं मिली। साढ़े सात अरब डालर के कैरी लूगर प्लान से पाकिस्तान की इकोनॉमी किसी तरह चल रही है। अगर राजनयिक तनातानी बढ़ी तो आनेवाले दिनों में पाकिस्तान को मिलने वाली मदद भी अमेरिका बंद कर सकता है।
पाकिस्तानी एजेंसियों में भी रेमंड डेविस को लेकर विवाद है। एजेंसियों के कुछ अधिकारियों ने दावा किया है कि जिन दो लोगों की हत्या हुई, वो आईएसआई एजेंट थे और रेमंड डेविस का पीछा कर रहे थे। यह बात उछाल कर कुछ आईएसआई अधिकारियों ने अमेरिका की मदद की है। इसके पीछे भी कई कारण बताए जा रहे हैं। पाकिस्तानी नेताओं, सेना के बड़े अधिकारियों और आईएसआई के अधिकारियों की संपत्ति अमेरिका समेत यूरोप में है। इसलिए वे अमेरिका से एक सीमा तक ही झगड़ा ले सकते हैं। ज्यादा झगड़ा लेंगे तो कल को उनकी संपत्तियों पर उंगली उठ सकती है। दूसरा तर्क यह है कि सेना के कई बड़े अफसर किन्हीं परिस्थितियों में अगर देश छोड़ेंगे तो उनकी शरण स्थली यूरोप या अमेरिका ही है।
मसलन, परवेज मुशर्रफ अपनी जिंदगी फिलहाल लंदन में बिता रहे हैं। पाकिस्तान में कब किस नेता और सैन्य अधिकारी को देश छोड़ना पड़े, इसकी गारंटी नहीं है। बेनजीर भुट्टो हत्याकांड में आरोपी मुशर्रफ भगोड़ा होने की स्थिति में भी लंदन में हैं। इसी तरह लंबे समय तक बेनजीर भुट्टो को भी मुल्क छोड़कर लंदन में रहना पड़ा था। नवाज शरीफ को भी मुल्क छोड़ दुबई और लंदन में रहना पड़ा था। हालांकि यह सच्चाई है कि आईएसआई और अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के बीच पाकिस्तानी धरती पर जंग चल रही है और अमेरिकी खुफिया अधिकारी इस्लामाबाद समेत कई शहरों में डेरा डाले हुए हैं। इसे आईएसआई का एक धड़ा बर्दाश्त नहीं करता है। पिछले दिनों सीआईए के एक वरिष्ठ अधिकारी को इस कारण ही इस्लामाबाद छोड़ना पड़ा था, क्योंकि आईएसआई के कुछ साजिशी अधिकारियों ने अमेरिकी ड्रोन हमले के एक मामले में सीआईए समेत अमेरिकी दूतावास को एक पीड़ित से नोटिस भिजवा दिया था। इसके बाद ही इसका खुलासा हो गया कि सीआईए के अधिकारी इस्लामाबाद में अपना सेंटर बनाकर बैठे हैं।
रेमंड डेविस की कार्रवाई ने बता दिया है कि पाकिस्तान धीरे-धीरे अफगानिस्तान बन चला है। वहां अमेरिकी गन लेकर चलते हैं और अमेरिकी सुरक्षा गार्ड बैठे हुए हैं। फिर अमेरिका को पाकिस्तान की संप्रभुता का कोई ख्याल नहीं है। वह कभी भी अफगानिस्तान की तर्ज पर पाकिस्तान में भी कार्रवाई कर सकता है। अगर अपने दोषी नागरिक को लेकर आज अमेरिका इतना बड़ा स्टैंड ले सकता है तो कल को अगर उसके नागरिक मारे गए तो पाकिस्तान पर वह हमला भी कर सकता है। यह तय है कि अमेरिकी अपने हितों के लिए दूसरे राष्ट्र की संप्रभुता में विश्वास नहीं रखते। फिर कई आपदाओं से जूझ रहे पाकिस्तान को अपनी समस्या से निपटने में भारी समस्या आ रही है।
इस घटना के बाद अब नई सूचना है कि पाकिस्तान और अमेरिका के संबंधों में तनाव बढ़ गए हैं। कारण रेमंड डेविस ही है। पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के प्रस्तावित अमेरिकी दौरे की मंजूरी अमेरिकी प्रशासन ने नहीं दी। पिछले एक साल से लगातार पाकिस्तान जाकर अफगानिस्तान की लड़ाई में पाकिस्तान से सहयोग मांगने वाली हिलेरी क्लिंटन ने पाकिस्तानी विदेश मंत्री से मिलने तक से इंकार कर दिया। अमेरिका के इस व्यवहार से पाकिस्तान की संप्रभुता पर सवाल उठ गया है। क्या वाकई पाकिस्तान संप्रभु राष्ट्र है? अमेरिका ने आधार बनाया कि रेमंड डेविस के पास डिल्पोमेटिक पासपोर्ट था, इसलिए उसे पाकिस्तानी पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकती थी। अमेरिका का तर्क है कि वियना कन्वेंशन के तहत हुए समझौते के कारण रेमंड डेविस को पाकिस्तानी कोर्ट में ट्रायल से इम्यूनिटी मिली है, लेकिन पाकिस्तानी पुलिस ने इस दलील को नहीं माना। फिर भी अब यही दलील पाकिस्तान के गले की हड्डी बन गई है।
अंदेशा है कि रेमंड डेविस को लेकर पाकिस्तान में विवाद और बढ़ सकता है। कट्टपंथियों ने उसकी रिहाई का विरोध शुरू कर दिया है। इस तरह पाकिस्तान सरकार दो पाटों में फंस गई है। सरकार डेविस की रिहाई तो चाहती है, लेकिन उस पर कट्टरपंथियों समेत नवाज शरीफ का दबाव भी है। पाकिस्तानी अथॉरिटी की आंतरिक लड़ाई इस मसले पर सामने आ गई है। विदेश मंत्रालय, सेना का एक विंग और सरकार में शामिल कुछ लोग डेविस की रिहाई के लिए दबाव बना रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ एक विंग रिहाई के खिलाफ है। उधर पाकिस्तानी न्यायपालिका ने डेविस के खिलाफ स्टैंड ले लिया है। इससे सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं। इसके कारण भी साफ हैं। सरकार के पास सरकार चलाने के लिए धन नहीं है। सारा कुछ अमेरिकी मदद पर निर्भर है। पिछले साल बाढ़ आई, लेकिन विदेशी मदद नहीं मिली। साढ़े सात अरब डालर के कैरी लूगर प्लान से पाकिस्तान की इकोनॉमी किसी तरह चल रही है। अगर राजनयिक तनातानी बढ़ी तो आनेवाले दिनों में पाकिस्तान को मिलने वाली मदद भी अमेरिका बंद कर सकता है।
पाकिस्तानी एजेंसियों में भी रेमंड डेविस को लेकर विवाद है। एजेंसियों के कुछ अधिकारियों ने दावा किया है कि जिन दो लोगों की हत्या हुई, वो आईएसआई एजेंट थे और रेमंड डेविस का पीछा कर रहे थे। यह बात उछाल कर कुछ आईएसआई अधिकारियों ने अमेरिका की मदद की है। इसके पीछे भी कई कारण बताए जा रहे हैं। पाकिस्तानी नेताओं, सेना के बड़े अधिकारियों और आईएसआई के अधिकारियों की संपत्ति अमेरिका समेत यूरोप में है। इसलिए वे अमेरिका से एक सीमा तक ही झगड़ा ले सकते हैं। ज्यादा झगड़ा लेंगे तो कल को उनकी संपत्तियों पर उंगली उठ सकती है। दूसरा तर्क यह है कि सेना के कई बड़े अफसर किन्हीं परिस्थितियों में अगर देश छोड़ेंगे तो उनकी शरण स्थली यूरोप या अमेरिका ही है।
मसलन, परवेज मुशर्रफ अपनी जिंदगी फिलहाल लंदन में बिता रहे हैं। पाकिस्तान में कब किस नेता और सैन्य अधिकारी को देश छोड़ना पड़े, इसकी गारंटी नहीं है। बेनजीर भुट्टो हत्याकांड में आरोपी मुशर्रफ भगोड़ा होने की स्थिति में भी लंदन में हैं। इसी तरह लंबे समय तक बेनजीर भुट्टो को भी मुल्क छोड़कर लंदन में रहना पड़ा था। नवाज शरीफ को भी मुल्क छोड़ दुबई और लंदन में रहना पड़ा था। हालांकि यह सच्चाई है कि आईएसआई और अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के बीच पाकिस्तानी धरती पर जंग चल रही है और अमेरिकी खुफिया अधिकारी इस्लामाबाद समेत कई शहरों में डेरा डाले हुए हैं। इसे आईएसआई का एक धड़ा बर्दाश्त नहीं करता है। पिछले दिनों सीआईए के एक वरिष्ठ अधिकारी को इस कारण ही इस्लामाबाद छोड़ना पड़ा था, क्योंकि आईएसआई के कुछ साजिशी अधिकारियों ने अमेरिकी ड्रोन हमले के एक मामले में सीआईए समेत अमेरिकी दूतावास को एक पीड़ित से नोटिस भिजवा दिया था। इसके बाद ही इसका खुलासा हो गया कि सीआईए के अधिकारी इस्लामाबाद में अपना सेंटर बनाकर बैठे हैं।
रेमंड डेविस की कार्रवाई ने बता दिया है कि पाकिस्तान धीरे-धीरे अफगानिस्तान बन चला है। वहां अमेरिकी गन लेकर चलते हैं और अमेरिकी सुरक्षा गार्ड बैठे हुए हैं। फिर अमेरिका को पाकिस्तान की संप्रभुता का कोई ख्याल नहीं है। वह कभी भी अफगानिस्तान की तर्ज पर पाकिस्तान में भी कार्रवाई कर सकता है। अगर अपने दोषी नागरिक को लेकर आज अमेरिका इतना बड़ा स्टैंड ले सकता है तो कल को अगर उसके नागरिक मारे गए तो पाकिस्तान पर वह हमला भी कर सकता है। यह तय है कि अमेरिकी अपने हितों के लिए दूसरे राष्ट्र की संप्रभुता में विश्वास नहीं रखते। फिर कई आपदाओं से जूझ रहे पाकिस्तान को अपनी समस्या से निपटने में भारी समस्या आ रही है।
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