चीन की विस्तारवादी नीति पर रहीस सिंह की टिप्पणी
पिछले कुछ वर्षो से कभी आर्थिक तो कभी सामरिक ताकत के बूते चीन भारत को ही नहीं पूरी दुनिया को अपनी धौंस में लेने की कोशिश कर रहा है। चीन की आधिकारिक पत्रिका क्यू शी के मुताबिक चीन अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए भारत समेत सभी पड़ोसी देशों के साथ युद्ध के लिए हर समय तैयार है। इसके अलावा भारत की विदेश नीति के विदुर नीति सिद्धांत को खारिज किया गया है यानी चीन भारत से बातचीत के जरिए शांति की नीति पर भरोसा नहीं करता। दक्षिण एशिया में अमेरिका के बढ़ते प्रभाव और चीन के खिलाफ कई देशों की गुटबाजी को चीन उकसाने की कार्रवाई मान रहा है। भारत व अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंधों को चीन बर्दाश्त नहीं करता। पत्रिका के मुताबिक जापान, भारत, वियतनाम, आस्ट्रेलिया, फिलीपींस, इंडोनेशिया और दक्षिण कोरिया या तो चीन के साथ युद्ध चाहते हैं या उसके साथ संबंधों में टकराव। चीनी सरकार को सुझाव दिया गया है कि वह लातिन अमेरिका और अफ्रीका में अमेरिका विरोधी गठबंधन तैयार करे और अपनी अर्थनीति को रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करे। इसमें भारत जैसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडार वाले देशों के खिलाफ ज्यादा सख्त रुख नहीं अपनाने की सलाह भी दी गई है। पिछले दिनों जब प्रधानमंत्री पूर्वी एशियाई देशों की बैठक में शामिल होने लाओस में थे तो पीपुल्स डेली ने इसे मिशनरी ट्रिप नाम देते हुए भारत पर आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री की यात्रा का मकसद चीन के विरुद्ध नए रणनीतिक साझीदारों की तलाश करना है और कहा गया कि जापान और भारत मिलकर चीन को दबाना चाहते हैं। जापान, भारत और वियतनाम के मध्य साझेदारी को दक्षिण चीन सागर में चीनी उद्देश्यों के खिलाफ माना जा रहा है। कमोबेश यही बातें पुन: क्यू शी में दोहराई गई हैं। इससे तो यही लगता है कि चीन इस तरह के आरोप लगाकर स्वयं अपनी आक्रामकता को वैध रूप देना चाहता है। भारत के चारों ओर चीन अपनी रक्षा पंक्ति निर्मित कर रहा है। स्टि्रंग ऑफ पर्ल्स की रणनीति के तहत चीन ने भारत के चारों ओर अपने प्रभाव बिंदुओं की माला के आकार का घेरा डाल दिया है। इस माला में पाकिस्तान में ग्वादर, श्रीलंका में हंबनटोटा, मालदीव में मारओ, म्यांमार में सित्तवे, बांग्लादेश में चटगांव, थाईलैंड में क्रा नहर, कंबोडिया में रेएम और सिहनौक्विल्ले बंदरगाह और दक्षिण चीन समुद्र में नौसैनिक अड्डे आदि गुंथे हुए हैं। मोती की इस माला का बाहरी पक्ष भले ही आर्थिक हो लेकिन इसमें एक महत्वपूर्ण निहित तत्व सामरिक है। अहम बात तो यह है कि भारत के कुछ पड़ोसी भी चीन की इस विस्तारवादी नीति में उत्साहपूर्वक हिस्सा ले रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया स्ट्रेटजिक एज, 2030 नामक रिपोर्ट के मुताबिक चीन की सेना पीपल्स लिबरेशन आर्मी, लड़ाकू विमान, जंगी जहाज और बेहतरीन पनडुब्बियों, आधुनिक परमाणु हथियारों, अंतरिक्ष में युद्ध करने की क्षमता और साइबर स्पेस में अपनी क्षमता पर मोटी रकम खर्च कर रही है। इसके जरिए वह पश्चिमी प्रशांत महासागर में अमेरिकी ठिकानों पर एक साथ धावा बोलने की संभावित रणनीति पर काम रहा है। यह रणनीति उसी प्रकार की होगी जैसी 1940 में जापान द्वारा अमेरिका के खिलाफ जंग के दौरान अपनाई गई थी। चीन पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान स्टील्थ तकनीक पर गोपनीय ढंग से काम कर रहा है। दुनिया में कुछ ही देश हैं जिनके पास यह विमान हैं। इसके अलावा पिछले वर्ष चीन ने अंतरिक्ष में सटीक निशाना लगाकर अंतरिक्ष युद्ध में अमेरिका की बराबरी करने के करीब पहुंच गया है। इस तरह से सामरिक क्षेत्र में बढ़त बनाकर चीन संपूर्ण दक्षिण एशिया प्रायद्वीप में तनावपूर्ण वातावरण निर्मित कर रहा है, जिस पर दुनिया को गंभीरता से विचार करना होगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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