Monday, February 14, 2011

तख्त और ताज बदलने का दौर


मिस्र में शांतिपूर्ण क्रांति के बाद जहां सत्ता की बागडोर थामने वाली फौज और प्रशासन ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने के तरीकों पर विचार करना शुरू किया है, वहीं लोगों की चौकसी तहरीर चौक की सफाई से लेकर फेसबुक और हर उपलब्ध माध्यम से अब तक हुए बदलावों की समीक्षा तक में दिखाई देती है। आधुनिक दौर में यह पहली बड़ी जनक्रांति है, जिसमें सूचना तकनीक के नवीनतम साधनों का बड़े पैमाने पर प्रयोग हुआ है। उम्मीद करनी चाहिए कि यह चौकसी बदलाव की प्रक्रिया को एक नतीजे पर लाकर ही चैन लेगी। जो काम टूनीशिया की जास्मिन रेवोल्यूशन से शुरू होकर अरब जगत के सबसे बड़े मुल्क तक में बदलाव लाने में सफल रहा, उसके आगे पसरने के संकेत भी दिखने लगे हैं। काहिरा में सत्ता पलटते ही कम से कम आधा दर्जन अरब मुल्कों में लोग बदलाव के लिए सड़कों पर निकल पड़े-बेशक अभी मिस्र या टूनीशिया जैसे हालात नहीं दिखते, पर बदलाव की चिनगारी को शोला बनने में वक्त कहां लगता है। अल्जीरिया तानाशाही और मजहबी कट्टरता का गढ़ बना हुआ है, लेकिन वहां भी राष्ट्रपति के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए। चेंज ऑफ डेमोक्रेसी नामक गठबंधन में राजनीतिक समूह, मजदूर संगठन और मानवाधिकार संगठन शामिल हैं। पर इनसे भी ज्यादा आलोड़न धुर अमेरिकापरस्त तानाशाह अली अब्दुल्ला सालेह के मुल्क यमन में है। बेटे को उत्तराधिकारी न बनाने और 2013 के चुनाव में हिस्सा न लेने की उनकी घोषणा के बाद भी उनको हटाने की मांग जारी है। जॉर्डन में राजशाही है, पर जनविरोध की लहर देखकर शाह अब्दुल्लाह-द्वितीय ने अपना मंत्रिमंडल भंग कर दिया। सीरिया, सूडान और सऊदी अरब तक में बदलाव की सुगबुगाहट है। मिस्र के विपरीत इनमें से कई देशों में दरिद्रता और अभाव नहीं है, लेकिन गैरबराबरी और तानाशाही सबको चुभती है। सूचना क्रांति ने हर किसी को दुनिया का हाल बता दिया है-सो सबको अपार प्राकृतिक संपदा, श्रम बल के साथ अपनी बेकारी-तंगहाली और अपने शासकों के कर्मों-कुकर्मों का काफी कुछ पता होने लगा है। इसलाम में बंधुत्व और बराबरी बुनियादी मूल्य हैं, पर इसलाम के असली गढ़ में ये चीजें सदा से नदारद रही हैं। फिर अमेरिका और पश्चिमी जगत के जीवन की झलक देखना-समझना और अपने तानाशाहों से उनके रिश्ते के प्रति क्रोध भी वर्तमान बदलाव के पीछे प्रेरक रहा है। संभव है, इन आंदोलनों में मजहबी कट्टरपंथी तत्व भी हों, पर अभी कहीं उनका एजेंडा ऊपर नहीं दिखता। फौज की ताकत है, पर जब बादशाह-तानाशाह लोगों की ताकत से उलटने लगे, तो फौज क्योंकर जनप्रतिरोध के सामने आएगी।


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