Friday, February 4, 2011

चीन के प्रति चौकसी की जरूरत


तिब्बती समाज में चीनी घुसपैठ को समय रहते रोकना जितना भारत की सुरक्षा के लिए जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा यह निर्वासन में रहने वाले तिब्बती समाज की राष्ट्रीय उम्मीदों और उनके अभियान को जिंदा रखने के लिए जरूरी है। इस मामले को किसी एक वरिष्ठ धर्मगुरु के खिलाफ दुराग्रहपूर्ण कार्रवाई न मानकर इसे करमापा के लिए अपनी विश्वसनीयता सिद्ध करने का एक अवसर माना जाना चाहिए। इस अग्नि परीक्षा से यदि करमापा बेदाग बाहर आते हैं तो वह तिब्बती समाज के लिए यकीनन एक वरदान साबित होंगे। आम तिब्बती परिवारों द्वारा बेनामी जमीनें खरीदने और उन पर घर बनाने की समस्या से हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और दूसरे कई राज्यों की सरकारें काफी समय से दो-चार हो रही हैं। ऐसे हर सौदे में भारतीय दलालों की मदद से नकद भुगतान ने गैरकानूनी लेनदेन को और आगे बढ़ाने में मदद की है। मठों-मंदिरों के लिए बेनामी तरीके से कई एकड़ जमीन खरीदने तथा उस पर करोड़ों रुपये के भवन निर्माण ने तो इस पूरी समस्या को एक और गंभीर आयाम दे दिया है। धर्मशाला में तिब्बती धर्मगुरु करमापा के निवास पर करीब 12 करोड़ रुपये नकद पाए जाने की घटना ने आजादी के संग्राम में जुटे तिब्बती शरणार्थी समाज के लिए एक अजीबोगरीब धर्मसंकट खड़ा कर दिया है। दलाई लामा जैसे शांतिवादी नेता की शालीन छवि के बूते दुनिया भर से समर्थन पाने वाला यह समाज यह देखकर भौचक है कि उसके धार्मिक नेताओं का एक वर्ग गैरकानूनी तरीके से विदेशी मुद्रा रखने और बेनामी संपत्तियां खरीदने के आरोपों में घिर गया है। कुछ साल पहले यही करमापा तिब्बत में चीनी चंगुल से भागकर भारत आने के साहसिक कारनामे के कारण दुनिया भर में चर्चा का केंद्र बने थे, लेकिन इस बार बिना खाते वाली बड़ी धनराशि और उनके मठ द्वारा खरीदी गई संपत्तियों के आरोपों से यह संदेह भी उछाला जा रहा है कि कहीं करमापा की चीन सरकार के साथ कोई साठगांठ तो नहीं है? इससे पहले भी करमापा विवादों के घेरे में रहे हैं। 2000 के शुरू में अचानक चीनी नियंत्रण से भागकर भारत आने पर कुछ लोगों ने यह आशंका जताई थी कि वह चीनी योजना के तहत भागकर आए हैं ताकि वह चीनी इरादों को अंजाम दे सकें। करमापा की चीन के साथ साठगांठ का आरोप कितना सही है या कितना गलत, इस नाजुक सवाल पर जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाए जांच एजेंसियों की जांच पूरा होने का इंतजार करना शायद एक बेहतर विकल्प होगा, लेकिन पैसे से जुड़े कई गंभीर सवाल हैं, जिन पर तिब्बत की निर्वासन सरकार, उसके नेताओं, तिब्बती समाज, भारत सरकार और तिब्बत से सहानुभूति रखने वालों को गंभीरता से विचार करना होगा। अब तक की जांच में करमापा और उनके सहयोगियों की दलील है कि यह धन उन्हें देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के चढ़ावे का है, जो पिछले कई सालों से मठ में नकद रखा जाता रहा है। हालांकि पत्रकारों के सवालों के जवाब में दलाई लामा ने करमापा पर चीनी एजेंट होने के आरोप से अपनी असहमति जताई है, लेकिन उन्होंने पैसे के मामले में लापरवाही बरतने और कानून का पालन न करने के लिए करमापा और उनके सहयोगियों की आलोचना की है। लेकिन यह तय है कि करमापा से जुड़े इस कांड ने न सिर्फ तिब्बत के एक बड़े धार्मिक नेता और वहां के धार्मिक संगठनों की साख पर बट्टा लगाया है, बल्कि शरणार्थी समाज द्वारा मुश्किलों के बीच पचास साल से खड़े किए जा रहे आजादी के आंदोलन को भी कमजोर किया है। इस कांड से उठे सवालों की बारीकियों को समझने के लिए तिब्बत की धर्म व्यवस्था, निर्वासित तिब्बती समाज की स्थिति और चीन की भूमिका जैसे कुछ पहलुओं पर एक नजर डालना जरूरी होगा। तिब्बती बौद्ध परंपरा के अनुसार एक धर्मगुरु या मठाधीश के मरने पर उसके अवतार को उसके पद पर बिठाया जाता है। मठों की विशाल संपत्ति और उनके राजनीतिक प्रभाव के कारण मठ के प्रभावशाली अधिकारियों के बीच नया अवतार ढूंढ़ने के सवाल पर कई बार जोरदार उठापटक और हिंसा होने की घटनाएं भी होती रही हैं। तिब्बती इतिहास में ऐसे कई मौके आए, जब तिब्बती राजाओं ने चीन के कई हिस्सों पर शासन किया और कई बार चीनी शासकों का तिब्बत में दबदबा रहा। इसलिए मौका पड़ने पर कई बार चीनी शासकों ने भी नए धर्मगुरु के अवतार की खोज को अपने हितों के लिए प्रभावित किया। अब तिब्बत पर चीनी कब्जे के बाद वहां की धार्मिक संस्थाओं पर कब्जा जमाने की चीनी इच्छा और बलवती हो चुकी है। 1990 के दशक में बीजिंग की कम्युनिस्ट सरकार अपने धर्म विरोधी विश्वासों के बावजूद पंचेन लामा और करमापा जैसे वरिष्ठ धर्मनेताओं के नए अवतारों की खोज के लिए कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारियों के नेतृत्व में अवतार खोजी कमेटी का गठन करके अपनी मर्जी के वरिष्ठ धर्मगुरुओं के नए अवतार खोजने का काम कर चुकी है। अगले दलाई लामा के अवतार को अपनी मर्जी से नियुक्त करने के अपने इरादों को भी वह दबंग तरीके से घोषित कर रही है। इस काम में उसे तिब्बती धर्मगुरुओं के समर्थन की बहुत जरूरत होगी। यही कारण है कि उचित दिन की तैयारी में वह इन दिनों तिब्बत के भीतर और बाहर छोटे-बड़े तिब्बती लामाओं को अपने प्रभाव में लाने के अभियान में जुटी हुई है। इसलिए भारत में चल रहे तिब्बती मठों के निर्माण पर किए जा रहे अंधाधुंध खर्च और तिब्बती शरणार्थियों द्वारा जमीनें खरीदने को लेकर अगर भारतीय सुरक्षा एजेंसियां चिंतित हैं तो यह चिंता स्वाभाविक है। 1959-60 में दलाई लामा और उनके साथ आए तिब्बतियों को भारत सरकार और कई राज्य सरकारों ने जमीन व सहयोग देकर उनके पुनर्वास में प्रशंसनीय पहल की थी, जो शरणार्थियों की तत्कालीन आर्थिक हालत के अनुकूल थी, लेकिन इस बीच शरणार्थियों की दो-तीन नई पीढि़यां पैदा हो चुकी हैं। आधुनिक शिक्षा और रोजगार की नई सुविधाओं से सुधरी उनकी आर्थिक हालत ने उनकी आवास और दूसरी जरूरतों को एक नया आयाम दे दिया है, लेकिन भारतीय कानून इन शरणार्थियों के विदेशी नागरिक दर्जे की वजह से उन्हें भारत में जमीन खरीदने की अनुमति नहीं देता। लिहाजा आम तिब्बती परिवारों द्वारा बेनामी जमीनें खरीदने और उन पर घर बनाने की समस्या से हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और दूसरे कई राज्यों की सरकारें काफी समय से दो-चार हो रही हैं। ऐसे हर सौदे में भारतीय दलालों की मदद से नकद भुगतान ने गैरकानूनी लेनदेन को और आगे बढ़ाने में मदद की है। पिछले पचास साल में तिब्बती मठों की लोकप्रियता पश्चिमी देशों के अलावा ताईवान, जापान, सिंगापुर, हांगकांग और कोरिया जैसे बौद्ध देशों, यहां तक कि चीन में भी बहुत बढ़ चुकी है। इसलिए धर्मशाला और बोधगया जैसे धार्मिक स्थानों पर होने वाले पूजा समारोहों में इन देशों से एक साथ हजारों श्रद्धालुओं का आना और अपनी-अपनी मुद्रा में अपने गुरुओं को चढ़ावे चढ़ाना एक आम दृश्य बन चुका है। ऐसे में करमापा के निवास से 25 देशों की करेंसी में कई करोड़ रुपये नकद मिलने के बारे में उनके सहयोगियों द्वारा इस चढ़ावे की बात तो कुछ हद तक समझी जा सकती है, लेकिन स्पष्ट भारतीय कानूनों के बावजूद इतनी बड़ी मात्रा में विदेशी करेंसी को बैंक के बजाए मठ के बक्सों में रखने की गलती को अपने मेजबान देश के प्रति समुचित जिम्मेदारी और सम्मान नहीं माना जा सकता। यह प्रश्न इसलिए भी गंभीर है कि चढ़ावे और भेंट के मामले में दलाई लामा को इन सभी धर्मगुरुओं के मुकाबले दुनिया भर में कहीं अधिक सम्मान मिलता है, लेकिन उनके यहां इस धन को न केवल कानूनी तरीके से ट्रस्ट द्वारा संचालित किया जाता है, बल्कि इसका उपयोग तिब्बती समाज की विकास जरूरतों व सार्वजनिक गतिविधियों में किया जाता है। दुर्भाग्य से कई तिब्बती मठों में ऐसे सामजिक नजरिए का अभाव है। वे इस चढ़ावे के पैसे से एक-दूसरे से बढ़कर तड़क-भड़क वाले मठ बनाने और अपने वरिष्ठ धर्मगुरुओं के लिए शानो-शौकत वाली जीवनशैली की सुविधाएं जुटाने की होड़ में लगे दिखते हैं। अब कर्मापा से जुड़ी इन घटनाओं ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान भी इस ओर खींच लिया है। वे अब यह सुनिश्चित करने में लगी दिखती हैं कि मठों में बड़े पैमाने पर पैसे के खेल में कहीं चीन की भूमिका तो नहीं? एक ओर जहां तिब्बती समाज को भावुक हुए बिना सुरक्षा एजेंसियों को सहयोग देना चाहिए, वहीं दूसरी ओर भारत सरकार को भी आधी शताब्दी से भारत में रहने वाले इस छोटे से शरणार्थी समाज की वाजिब जरूरतों को समझते हुए जमीन तथा विदेशी मुद्रा संबंधी कानूनों को लचीला बनाना चाहिए। (लेखक तिब्बती मामलों के जानकार हैं)

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