सात महीने के लंबे इंतजार के बाद आखिर नेपाल को अपना प्रधानमंत्री मिल ही गया। यूएमएल के अध्यक्ष झालनाथ खनाल नेपाल के प्रधानमंत्री चुन लिए गए हैं, लेकिन जिन राजनीतिक विवशताओं और नाटकीय घटनाक्रमों के चलते वे इस पद पर पहंुचे हैं, उसके मद्देनजर नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता समाप्त होने के आसार बहुत ही कम नजर आ रहे हैं। शांति प्रक्रिया कछुए की चाल चल रही है और संविधान निर्माण का महत्वपूर्ण कार्य भी अधूरा पड़ा है। सबसे पहले बात करते हैं नेपाल में संयुक्त राष्ट्र विशेष मिशन की, जिसका कार्यकाल पिछले महीने समाप्त हो गया। दरअसल, यूएन विशेष मिशन को पीपल्स लिबरेशन आर्मी और नेपाली सेना के हथियारों की निगरानी रखने के साथ ही 19,000 माओवादी गुरिल्लों को नेपाली सेना में शामिल करने की रणनीति तय करने का अहम दायित्व सौंप दिया गया। यह कार्य कितना चुनौतीपूर्ण और जोखिमभरा रहा होगा, इसका अंदाज इस बात से लग सकता है कि पिछले चार सालों के दौरान मिशन का कार्यकाल सात बार बढ़ाया गया। सुरक्षा परिषद ने सितंबर 2010 में यूएन मिशन का कार्यकाल 15 जनवरी 2011 तक बढ़ा दिया था। पिछले साल जून में प्रधानमंत्री माधव कुमार की सरकार के त्यागपत्र के बाद से ही नेपाल में कामचलाऊ सरकार का शासन चल रहा था। मिशन के जाने के वक्त नजदीक आने के बावजूद नेपाल में न तो कोई स्थायी प्रधानमंत्री था और न ही कोई स्थायी सरकार थी। तब यह आशंका व्यक्त की जाने लगी कि मिशन के नेपाल से चले जाने के बाद जो राजनीतिक शून्यता उभरेगी, उसे भरने के लिए या तो सैनिक क्रांति हो जाएगी या फिर माओवादी हिंसा के जरिए सत्ता हथिया लेंगे। लेकिन जब माधव कुमार की कामचलाऊ सरकार माओवादियों से इस संदर्भ में समझौता करने में कामयाब हो गई तो सबने राहत की सांस ली। मिशन का कामकाज प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली एक विशेष समिति को सौंपा गया, जिसमें माओवादियों सहित सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल किए गए। माओवादी प्रमुख प्रचंड ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के लड़ाकों की कमान जनवरी के अंत में इस विशेष समिति को सौंप भी दी। जैसा कि सर्वविदित है कि माओवादी चाहते हैं कि पीपल्स लिबरेशन आर्मी के लड़ाकुओं को नेपाली सेना में भर्ती किया जाए, जबकि सेना और राजनीतिक दल इसके सख्त खिलाफ हैं। नेपाल में यूएन मिशन के आलोचकों का सबसे बड़ा आरोप यह रहा कि माओवादियों ने मिशन को ढाल बनाकर अपने लड़ाकुओं को सेना में शामिल करने जैसे अत्यंत संवेदनशील मुद्दे को लटकाए रखा। मिशन के कुछ कदम भी ऐसे रहे, जिससे न केवल उसकी निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगे, बल्कि वह माओवादियों का पक्षपात लेती भी नजर आई। इसलिए यह आरोप निराधार नहीं है कि राजनीतिक प्रक्रिया को पटरी से उतारने के लिए माओवादी यूएन मिशन को हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगे थे। शांति प्रक्रिया को आधा-अधूरा छोड़कर जाने के लिए यूएन मिशन को चाहे कितना भी कोसा जाए, लेकिन इसके लिए नेपाल के राजनेता खासकर माओवादी ज्यादा कसूरवार हैं। दरअसल, यूएन मिशन की मौजूदगी ने तमाम राजनीतिक दलों को बेहद लापरवाह और बेफिक्र बना दिया था। वे उन जिम्मेदारियों से दूर भागने लगे थे, जो नेपाल की जनता ने उन्हें सौंपी थी। भारत ने यह सुनिश्चित करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी कि 15 जनवरी के बाद यूएन मिशन का कार्यकाल किसी भी सूरत में नहीं बढ़ना चाहिए ताकि मिशन की गैरमौजूदगी में नेपाली राजनेताओं को संकट की गंभीरता का अहसास हो सके। साथ ही माओवादी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति और जवाबदेह बन सकें। संविधान सभा में 16 दौर के चुनाव के बाद भी नया प्रधानमंत्री चुना नहीं गया था। माओवादी प्रमुख प्रचंड जनता में माओवादियों की घटती लोकप्रियता से बेहद चिंतित थे। इसके अलावा, वे किसी भी कीमत पर माओवादी लड़ाकों को सेना में शामिल कराने पर उतारू थे। यही कारण था कि उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री पद की दावेदारी से बाहर कर लिया। हालांकि उनका यह कदम माओवादियों के ही एक प्रभावशाली वर्ग को बिलकुल रास नहीं आया। माओवादियों के दो कद्दावार नेताओं बाबूराम भट्टराई और मोहन वैद्य दोनों इस पक्ष में नहीं थे कि किसी बाहरी व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने में माओवादी अपना समर्थन दें। खनाल को प्रधानमंत्री बनाने के खिलाफ माओवादी पार्टी के 50 सांसदों ने खुलेआम अपनी असहमति जता दी है। साथ ही, जिस बात ने प्रचंड को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर होने के लिए प्रेरित किया है, वह है नेपाल से भारत के परंपरागत प्रभाव को खत्म करने की उनकी जगजाहिर मंशा। खनाल के नेतृत्व में नई सरकार बन तो गई है, लेकिन यह चलेगी कितना? अगर चल भी गई तो इसमें स्थिरता कितनी रहेगी? इन सवालों का जवाब ढूंढ़ने से पहले कुछ तथ्यों पर गौर करना होगा। पहला तो यह कि झालनाथ खनाल ने प्रधानमंत्री पद हासिल करने की भारी कीमत माओवादियों को चुकाई है। दूसरा यह कि माओवादियों की छत्रछाया में खनाल के लिए सरकार चलाना टेढ़ी खीर साबित होगा। झालनाथ खनाल और प्रचंड के बीच एक सात-सूत्रीय गुप्त समझौते के खुलासे के बाद यह शक यकीन में बदलने लगा है कि प्रचंड सरकार का रिमोट कंट्रोल अपने पास रखकर कई असंवैधानिक मांगों को भी पूरा करवाना चाहेंगे। गुप्त समझौते की एक शर्त के अनुसार माओवादी लड़ाकों को या तो सेना में थोक में भर्ती कर लिया जाएगा या फिर सेना में ही उनका एक अलग दस्ता बना दिया जाएगा। अगर खनाल सरकार प्रचंड के दबाव में ऐसा करने की कोशिश करती है तो उसे चौतरफा विरोध झेलना पड़ेगा। यही नहीं, यूएमएल के अन्य नेताओं को भी खनाल ने गुप्त समझौते की शर्तो की भनक नहीं लगने दी। इससे यूएमएल में आतंरिक खींचतान बढ़ सकती है। गृहमंत्री पद को लेकर माओवादियों और यूएमएल में हुआ मनमुटाव यह संकेत भी करता है कि दोनों दलों के लिए आपसी विश्वास कायम करना बहुत मुश्किल होगा। जहां तक मई के अंत तक नया संविधान तैयार करने की दिशा में बढ़ने का सवाल है तो अवरोध ही अवरोध नजर आ रहे हैं। संविधान के अहम प्रावधानों को दो-तिहाई बहुमत के बिना पारित नहीं किया जा सकता, जो खनाल सरकार के पास नहीं है। यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि नेपाल बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है। वहां आज एक भी सर्वमान्य राजनेता नहीं है, जो दूसरे राजनेताओं को व्यक्तिगत स्वार्थो से ऊपर उठ कर राष्ट्रहित के बारे में सोचने के लिए विवश कर सके। फिर भी यह उम्मीद की जानी चाहिए कि नए प्रधानमंत्री झालनाथ खनाल माओवादियों को सेना में शामिल किए जाने के तौर-तरीके को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने की कोशिश नहीं करेंगे। देखना होगा कि अपनी क्रांतिकारी आकांक्षाओं और राजनीतिक मुख्यधारा में भागीदारी के बीच माओवादी किस प्रकार संतुलन रख पाते हैं? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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