Thursday, February 17, 2011

बड़े-बड़ों को खाक कर देगी यह जन चिंगारी


निरंकुश सत्ता के खिलाफ इस तरह के विद्रोह नए नहीं हैं। दुनिया ने यूक्रेन की ऑरेंज क्रांति, जॉर्जिया की रोज क्रांति, किर्गिस्तान की ट्यूलिप क्रांति और हाल ही में ट्यूनिशिया की जैसमिन क्रांति को भी देखा है। तानाशाही सत्ता व्यवस्था को हटाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने का काम दुनिया में कहीं भी रातोरात नहीं हुआ। हर क्रांति को अपना लक्ष्य हासिल करने में वक्त लगा है
मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के खिलाफ हुए विद्रोह को अमेरिकी मीडिया भी लोकतांत्रिक क्रांति मान रहा है। हालांकि, अब भी इस बात को लेकर अनिश्चितता बरकरार है कि क्या यह क्रांति मिस्र की तानाशाही को लोकतंत्र में बदल पाएगी। वैसे विश्व इतिहास को देखा जाए तो यह पता चलता है कि निरंकुश सत्ता के खिलाफ इस तरह के विद्रोह नए नहीं हैं। फिलीपींस में 1986 में राष्ट्रपति फर्डिनांड माकरेस को सत्ता से बेदखल किए जाने को जनता की ताकत कहा गया था। वहीं 1988 में दक्षिण कोरिया में चून दू हान की सत्ता को समाप्त किए जाने को सियासी चमत्कार कहा गया था। जबकि चेकोस्लोवाकिया में 1989 में जब कम्युनिस्टों की तानाशाही समाप्त हुई थी तब उसे वेलवेट क्रांति कहा गया। दुनिया ने यूक्रेन की ऑरेंज क्रांति, जॉर्जिया की रोज क्रांति, किर्गिस्तान की ट्यूलिप क्रांति और हाल ही में ट्यूनीशिया की जैसमिन क्रांति को भी देखा है। तानाशाही सत्ता व्यवस्था को हटाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने का काम दुनिया में कहीं भी रातोरात नहीं हुआ। हर क्रांति को अपना लक्ष्य हासिल करने में वक्त लगा है।
ट्यूनीशिया से चली बदलाव की बयार
सबसे ताजा उदाहरण ट्यूनीशिया का है। वहां पिछले 23 साल से जिनेल-आबिदिन बेन अली निरंकुश शासन कर रहे थे। लगातार चले संघर्ष के बाद उनका राज खत्म किया जा सका। यह काम लोकतंत्र की पैरोकारी करने वाले किसी बड़े समूह ने नहीं किया। बल्कि यह काम तो उस देश के नौजवानों ने कर दिखाया जो बढ़ती बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और पुलिसिया जुल्म से अजिज आ गए थे। यहां इस बात पर खास तौर पर ध्यान देना चाहिए कि किसी अरब देश में पहली बार किसी तानाशाह के खिलाफ इतनी बड़ी संख्या में लोग सड़क पर आए और उसे हटाने में कामयाबी पाई। पर अब तक कोई इस बात को नहीं कह सकता है कि उस देश की हालत बदल गई। दरअसल, आज भी वहां बेन अली के समर्थक और अधिकारी कई फैसले ले रहे हैं। एक बात तो है कि जैसमिन क्रांति ने संक्रमण फैलाने का काम किया। यह संक्रमण सबसे पहले मिस्र पहुंचा।
आर्थिक बदहाली है नाराजगी की वजह
मुबारक के खिलाफ वहां जो विद्रोह हुआ है उसके लिए देश की आर्थिक बदहाली को भी जिम्मेदार माना जा रहा है लेकिन ट्यूनीशिया में हुई क्रांति के असर को नकारा नहीं जा सकता। यह इतना जल्दी हुआ कि पचिमी देशों की खुफिया एजेंसियां भी इसे भांपने में नाकाम रहीं। हालांकि, आबादी के लिहाज से ट्यूनीशिया काफी छोटा देश है। मिस्र की राजधानी की जितनी आबादी है, उतनी आबादी पूरे ट्यूनीशिया की भी नहीं है। मुबारक राज में मिस्र के साथ कदमताल करने वाला अमेरिका इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। वहीं मुबारक राज की मजबूती के लिए जिम्मेदार वहां की सेना खुलकर न तो मुबारक के समर्थन में सामने आ रही है और न ही विरोध में। मुबारक को यह पता है कि अब उन्हें बगैर कोई वक्त गंवाए गद्दी छोड़नी होगी। पर वे बेइज्जत होकर सत्ता से बेदखल नहीं होना चाहते। उन्होंने तुरंत उपराष्ट्रपति की नियुक्ति की, दागी मंत्रियों को हटाया, चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा की और यहां तक कह डाला कि उनका बेटा उनकी जगह नहीं लेगा। उम्मीद की जा रही है कि कुछ और सुधारों की घोषणा जल्द ही हो।
असमंजस में अमेरिका
मिस्र को अमेरिका से हर साल डेढ़ अरब डॉलर का आर्थिक सहयोग मिलता है। इसलिए देश में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया में ओबामा प्रशासन का दखल स्वाभाविक है। बराक ओबामा जनभावना के खिलाफ नहीं जाना चाहते और इसलिए उन्होंने तुरंत सत्ता हस्तांतरण की बात कही है। पर उन्होंने मुबारक का इस्तीफा मांगने से परहेज किया। 1979 में ईरान में जनभावना का समर्थन नहीं करना अमेरिका को महंगा पड़ा था। फिलस्तीन में लोकतांत्रिक चुनाव के समर्थन की भी कीमत अमेरिका ने चुकाई है क्योंकि वहां चुनाव जीत कर हमास सत्ता पर काबिज हो गया। ऐसे में ओबामा के असमंजस को समझा जा सकता है। अगर काहिरा की सत्ता पर कोई अमेरिका विरोधी सरकार काबिज हो जाती है तो यह मध्य-पूर्व में अमेरिकी नीतियों के लिए खतरनाक साबित होगा।
तेज हो सक ती है परिवर्तन की हवा
सबसे ज्यादा चिंताजनक है विद्रोह के संक्रमण के विस्तार की आशंका। हालत यह है कि कुछ और अरब देशों में तानाशाह सत्ताधारियों को बदलाव की खातिर लोगों के विरोध-प्रदर्शन का सामना करना पड़ रहा है। यमन, सीरिया और जॉर्डन के लोग भी सियासी बदलाव चाहते हैं। ट्यूनीशिया और मिस्र ने दुनिया के निरंकुश शासन वाले देशों में कुछ सवाल तो खड़े कर ही दिए हैं। रूस के विश्लेषकों ने भी वहां के भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ लोगों में व्याप्त गुस्से की बात की है। चीन की सरकार ने यह बंदोबस्त कर लिया है कि मिस्र की घटनाओं की खबर चीन के लोगों तक नहीं पहुंचे। इस्रइल ने गाजा और फिलस्तीन के लिए विकास संबंधी नीतियों की घोषणा की है। पाकिस्तान में भी सत्ता व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह की सभावना व्यक्त की जा रही है।
बदलेगी भारत की विदेश नीति
मिस्र की सत्ता अगर बदलती है तो दुनिया के कई देशों को अपनी विदेश नीति में बदलाव करना होगा। इन देशों में भारत भी शामिल है। मुबारक ने अपने राज में भारत से अच्छी मित्रता की और उनके सत्ता से बेदखल होते ही दोनों देशों के संबंध अनिश्चितता की ओर बढ़ेंगे। मुबारक 1982, 1983 और 2008 में भारत आए। उन्हें 1995 में वैश्विक समझ के लिए जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार भी दिया गया। अफ्रीकी देशों में मिस्र मुबारक के राज में भारत का अहम कारोबारी साझीदार बना। तीन हजार से ज्यादा भारतीय मिस्र में काम करते हैं। वहां भारतीय कंपनियों ने तकरीबन 45 परियोजनाओं में तीन अरब डॉलर निवेश कर रखा है। भारत मिस्र में बेहद अहम विदेशी निवेशक है। दोनों देशों के करीबी रिश्तों का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वहां की तीन सड़कों का नामकरण महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और जाकिर हुसैन के नाम पर किया गया है।
नई रणनीति की जरूरत
असल काम अब विदेश मंत्रालय को करना होगा। मंत्रालय को दोनों देशों के बहुआयामी रिश्ते को बरकरार रखने के लिए नई रणनीति तैयार करनी होगी। इसके अलावा इस बात पर भी खास तौर से ध्यान देना होगा कि आने वाले कु छ हफ्तों या महीनों में कुछ और देशों में सत्ता परिवर्तन हो। ऐसी किसी संभावना पर निगाह रखना भारत के लिए बेहद जरूरी है। क्योंकि इन देशों में बड़ी संख्या में भारतीय मौजूद हैं और इन देशों से भारत के आर्थिक हित सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। साथ ही भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में ये देश अहम भूमिका निभाते हैं।


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