अमेरिका-चीन होड़ के मद्देनजर संतुलन रखना होगा भारत को
जबसे बराक ओबामा अमेरिकी राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल हुए, भारत और चीन को बहुधा उनके अंतरराष्ट्रीय संबंधों से संबंधित विचारों में जगह मिलने लगी। उनके ये विचार उनकी नीतियों में तब परिलक्षित होने लगे, जब चुनाव जीतकर उन्होंने इचिहास रचा और पहले अफ्रीकी-अमेरिकन बनकर ह्वाइट हाउस में प्रवेश किया था।
ओबामा ने बार-बार चीन और भारत को बढ़ती हुई वैश्विक शक्ति बताया है और कहा है कि वह नहीं चाहते कि अमेरिका दुनिया में अपनी शीर्ष स्थिति खो दे। हालांकि भारत और चीन को लेकर उनके नजरिये में अंतर है। वह जानते हैं कि चीन जमकर अमेरिका के साथ प्रतिस्पर्द्धा कर रहा है, जबकि भारत उसका स्वाभाविक रणनीतिक भागीदार है। उन्होंने अपने पहले राजकीय अतिथि के रूप में हमारे प्रधानमंत्री को 2009 में आमंत्रित किया। फिर 2010 में दोनों देशों के बीच उभरते सामरिक गठजोड़ को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से खुद भारत आए। चीन के साथ रिश्ते निभाना ओबामा के लिए आसान नहीं है। लिहाजा उनकी चीन यात्रा दोनों देशों के रिश्तों के लिए कोई उपलब्धि नहीं थी और न ही चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ की हालिया वाशिंगटन यात्रा अनूठी घटना थी।
फिर भी हू-ओबामा शिखर सम्मेलन पर दुनिया भर की नजर थी, खासकर नई दिल्ली की। हाल के वर्षों में भारत, अमेरिका और चीन के बीच के त्रिकोणीय समीकरण विश्व राजनीति में भू-राजनीतिक संतुलन के बदलने के महत्वपूर्ण संकेत हैं। चीन ने ओबामा की भारत यात्रा के दौरान उनकी हरेक गतिविधियों का निरीक्षण किया और भारत में दिए गए उनके हर बयान की व्याख्या की।
चीनी राष्ट्रपति जिंताओ की वाशिंगटन यात्रा ओबामा की बेमिसाल भारत यात्रा के कुछ महीनों बाद हुई। जाहिर तौर पर चीन ओबामा की भारत में की गई घोषणाओं-वह भारत के सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का समर्थन करेंगे, वह चाहते हैं कि भारत अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, जैसे-परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह और मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था का एक सदस्य बने, उनका प्रशासन कई भारतीय संस्थाओं पर से प्रतिबंध हटाकर परिष्कृत दोहरे उपयोग प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण की सुविधा देगा-से असहज महसूस कर रहा था। भारत और अमेरिका केबीच असैन्य परमाणु सहयोग के 123 समझौते के परिणामस्वरूप ऐसे बयानों ने दोनों के रिश्ते को ऐसी ऊंचाई पर पहुंचा दिया, जिससे चीन चिंतित हो सकता है।
महत्वपूर्ण बात है कि अमेरिका के साथ भारत की सामरिक सहभागिता बढ़ने के साथ-साथ आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों को लेकर चीनी-अमेरिकी मतभेद भी बढ़े हैं। दलाई लामा के साथ ओबामा की मुलाकात, ताइवान को हथियार बेचने की अनुमति और चीन का यह मानना कि अमेरिका उसे घेरना चाहता है, जैसे मुद्दों ने चीन को अपनी झुंझलाहट दिखाने के लिए कुछ कदम उठाने के लिए उकसाया। मसलन, चीन ने अमेरिका के मित्रों व सहयोगियों, जैसे जापान, भारत और कुछ दक्षिणपूर्व एशियाई देशों से दक्षिण चीन सागर के द्वीपों पर संप्रभुता का दावा करके झगड़ा मोल ले लिया। दूसरी तरफ, वाशिंगटन बौद्धिक संपदा अधिकार कानून के उल्लंघन, बाजार में अपर्याप्त पहुंच देने और मुद्रा के पुनर्मूल्यांकन से इनकार करने के चीन के रुख को लेकर काफी चिंतित है।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था भारी बेरोजगारी और सस्ते चीनी उत्पादों के बरक्स अपने उत्पादों के बाजार में प्रतिस्पर्द्धा न कर पाने के कारण लगातार मंदी से जूझ रही है। चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ कई बार बाजार की स्थितियों के मद्देनजर मुद्रा के पुनर्मूल्यांकन के अमेरिकी आग्रह पर विचार करने पर सहमति जता चुके हैं। मगर चीन से कोई सकारात्मक जवाब न मिला।
जिंताओ की यात्रा की पूर्व संध्या पर अमेरिकी व्यावसायिक घरानों ने राष्ट्रपति ओबामा से आग्रह किया कि वह चीन पर कठोर रुख अपनाएं। अमेरिका में चीनी विशेषज्ञों ने लिखा कि चीन शीघ्र ही एक राजनीतिक परिवर्तन से गुजरेगा और जिंताओ ज्यादा दिनों तक गद्दी पर नहीं रहेंगे।
दूसरी ओर, चीनी विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका में दो वर्षों तक राजनीतिक अनिश्चितता की स्थिति रहने वाली है, क्योंकि वहां राष्ट्रपति चुनाव होनेवाले हैं। इसकी कोई गारंटी नहीं है कि ओबामा फिर राष्ट्रपति बनेंगे। इन तमाम बातों ने वाशिंगटन में चीनी-अमेरिकी शिखर सम्मेलन को फीका कर दिया। जहां ओबामा ने बार-बार चीन में मानवाधिकार के मुद्दों को उठाया और दलाई लामा से बात करने के लिए हू से अपील की, वहीं हू ने मानवाधिकार मुद्दों पर चीन की स्थिति में संशोधन का संकेत दिया और कहा कि चीन अब कुछ सार्वभौमिक मानवाधिकारों में विश्वास करता है। हालांकि यह स्पष्ट है कि चीन अपनी मानवाधिकार नीति को नहीं बदलेगा और अमेरिका हू को दलाई लामा से बातचीत के लिए नहीं समझा पाएगा।
ऐसे में जाहिर है कि अब तक की महाशक्ति और नई महाशक्ति के बीच निकट भविष्य में एक अनूठा रिश्ता बनेगा। चीन अपनी अर्थव्यवस्था का विस्तार कर रहा है और तुलनात्मक रूप से अमेरिकी गिरावट को लेकर तेजी से मुखर हो रहा है। यह एक नए तरह के शीतयुद्ध की शुरुआत करेगा, जो सहयोग की मजबूरियों और मुद्दों एवं घटनाओं के अनिवार्य तनाव से चलेगा।
जाहिर है, ऐसे में भारत को एक तनी हुई रस्सी पर चलना है। नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच बढ़ती नजदीकियों को लेकर चीन की चिंता बढ़ रही है। भारत उभरती हुई शक्ति है। इसे किसी केसाथ विवाद की जरूरत नहीं है। क्या ऐसी कोई नई गुटनिरपेक्ष विदेश नीति की संभावना है?
No comments:
Post a Comment