Thursday, February 3, 2011

मिस्र पहुंची लोकतंत्र की लहर


इस आंदोलन की सफलता की कामना के साथ फौजी ताकत के खतरों के प्रति सचेत रहने की भी जरूरत है।

अनवर सादात की हत्या के बाद से लगातार कुरसी पर विराजमान मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक अब भी अपनी गद्दी बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं, पर उन्हें या उनके मुट्ठी भर साथियों को छोड़कर दुनिया में शायद ही किसी को यह भरोसा बचा है कि अब वह अपनी गद्दी बचा पाएंगे। उनकी उलटी गिनती तो काफी दिनों से जारी है और इसी क्रम में उनके पुत्र और कई सहयोगी भारी संख्या में अटैचियां भर-भर कर धन लेकर विदेश भाग भी चुके हैं-ज्यादातर दुबई गए हैं। और जिस तरह की प्रतिक्रिया अमेरिका और पश्चिमी जगत से आई है, उससे भी नहीं लगता कि अब इस डूबते जहाज को ज्यादा सहारा मिलेगा। मुबारक का 30 साल का शासन निश्चित रूप से पश्चिम और अमेरिका के सहयोग पर टिका था। और इस बार टूनीशिया की जास्मिन क्रांतिके बाद दसियों अरब राज्यों में बदलाव की जो सुगबुगाहट है, उसमें एक बहुत साफ स्वर अमेरिकापरस्ती के विरोध का है, जबकि अरब जगत के ज्यादातर तानाशाह और बादशाहों-शाहों को अमेरिका खुला समर्थन देता रहा है। युवा, मेहनती आबादी और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद अगर ज्यादातर अरब देश घोर दरिद्रता, बेरोजगारी, धर्मांधता और दकियानूसी का अखाड़ा बने हुए हैं, तो यह इन्हीं शासकों और उसके मुट्ठी भर समर्थकों के चलते, जिनका मुल्क की ज्यादातर संपत्ति पर कब्जा है। भयंकर गैरबराबरी वाले इन मुल्कों और इनके शासकों के साथ अमेरिका और पश्चिम को घनिष्ठ संबंध रखने में परेशानी नहीं थी, क्योंकि तेल से लेकर बाकी संसाधनों की व्यावसायिक लूट में उनको अच्छी हिस्सेदारी मिलती रही है। सिर्फ रॉयल्टी पर ही शाहों-बादशाहों-दरबारियों का कब्जा था। पर टूनीशिया से लेकर यमन तक में दिख रही लोकतांत्रिक लहर में अभी कोई राजनीतिक रंग नहीं दिख रहा है-इसी चलते इसे जास्मिन नाम दिया गया है। पर इस आंदोलन के पीछे लोकतांत्रिक इच्छा और बराबरी की चाह सबसे प्रबल है। वैसे इसके पीछे धार्मिक अनुदारवादी जमातों की ताकत भी है, जो अपने शासकों की पश्चिम-परस्ती से नाराज रहे हैं। एक खतरा फौज की ताकत झपट लेने का भी है और संगठित विरोध आंदोलन न होने से यह खतरा मिस्र में भी बना हुआ है। अभी सारे बदलाव के बावजूद टूनीशिया में भी इसका खतरा टला नहीं है। इसलिए इन आंदोलनों और लोकतंत्र की सफलता की कामना के साथ इन खतरों के प्रति भी सचेत रहने की जरूरत है। पर बराबरी और भाईचारे के मूल दर्शन वाले इसलाम की सरजमीं पर 30 साल, 40 साल और सैकड़ों साल की राजशाहियों-तानाशाहियों के लिए अब वास्तविक खतरा तो पैदा हो ही गया है।



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