भ्रष्टाचार, भूख, बेरोजगारी और सरकार के जनविरोधी रवैये से कोफ्त खाई मिस्त्र की जनता ने भी ट्यूनीशिया की तर्ज पर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करना शुरू कर दिया है। हालांकि मिस्त्र की सरकार ट्यूनीशिया की तरह लचर नहीं है कि राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक भी काहिरा छोड़कर भाग जाएंगे। मिस्त्र के लिए यही काफी हुआ कि 1981 से सत्ता में बने हुए मुबारक ने जनता के असंतोष को भांपते हुए अपने मंत्रिमंडल को बर्खास्त कर दिया और लोगों को यह भरोसा दिलाया कि देश में सामाजिक, लोकतांत्रिक और आर्थिक सुधारों को जल्द ही लागू किया जाएगा। अब जनता पर लाठियां बरसाकर जिस तरह के लोकतांत्रिक सुधार वह लाएंगे, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। मिस्र में एक हजार से ज्यादा लोग पुलिसिया दमन में घायल हो चुके हैं और अब तक कई जानें जा चुकी हैं। मिस्त्र में ही नहीं, सरकार से असंतुष्ट लोगों का प्रतिरोध ट्यूनीशिया से शुरू होकर लेबनान, जॉर्डन, अल्जीरिया और यमन जैसे कई ऐसे अरब-देशों में जंगल की आग की तरह फैल रहा है, जहां पिछले कई सालों से लोग गरीबी और भ्रष्टाचार के कारण खस्ताहाल रहे हैं। उथल-पुथल झेल रहे इन अरब देशों में जो शासन व्यवस्था है, उसे लोकतंत्र तो नहीं कहा जा सकता, पर तानाशाही कहना भी भ्रामक होगा। क्योंकि कोई भी तानाशाह अपनी मर्जी का मालिक होता है और ऐसी स्थिति कम से कम अरब के देशों में तो नहीं है। अरब के शासकों के लिए तानाशाही शब्द का प्रचलन पश्चिमी मीडिया की देन है और हकीकत यह है कि इन इलाकों में कठपुतली सरकारें काम करती हैं। इनका शासन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के इशारों पर वैश्विक पूंजी के हित में काम करता है। पूंजीवादी ताकतें पेट्रो-ईधन की अपनी भयंकर भूख के लिए अरब देशों पर बुरी तरह से आश्रित हैं और अपने हितों को साधने के लिए अरब-देशों में ऐसी सरकारें चाहते हैं, जिनकी बागडोर उनके हाथों में हो। यह बहस का दीगर मुद्दा है कि जनता ने अगर ऐसे कठपुतली सरकारों को उखाड़ भी फेंका तो देश में कठमुल्लाओं के सत्ता हथियाने के खतरे से उन्हें कौन बचाएगा। बहरहाल, बदहाली से बौखलाई हुई मिस्त्र, लेबनान, जॉर्डन, अल्जीरिया और यमन जैसे अरब देशों की जनता अपनी-अपनी सरकारों के खिलाफ खुलेआम यह कह रही है कि अब ट्यूनीशिया ही एक उपाय है। ट्यूनीशिया की जनता ने अपने शासक जनरल जिने अल अबेदीन बेन अली को खदेड़ दिया, बाकी अरब देश के लोग भी अपने यहां इस परिघटना को दोहरा कर रहेंगे। लेकिन सवाल कौंधता है कि जिस इंकलाब-ए-यास्मीन के बाद 23 सालों से लगातार राष्ट्रपति रहे अबेदीन को राजपाट छोड़कर राजधानी से पलायन करना पड़ा, क्या सही में, इस इंकलाब का अब तक मिला कुल हासिल वहां के जनता की जीत है? दुनिया भर ने इस रक्तहीन क्रांति का खुले दिल से स्वागत किया है, पर यकीन मानिए यह तहकीकात का मौजू सवाल हो सकता है कि ऐसा क्या हुआ कि अबेदीन ट्यूनीशिया से भागने के लिए मजबूर हो गए? क्योंकि तख्तापलट के लिए किया गया कोई प्रतिरोध दूध-भात का कौर तो नहीं है कि लोग सड़क पर उतर आए और इससे डर कर वर्षो से हुकूमत करने वाला दुम दबाकर भागने को मजबूर हो जाए। इस पूरे परिघटना को और गहराई से समझने की जरूरत है। वर्ष 1987 में विदेशी साजिशों के तहत ट्यूनीशिया में सरकार का तख्तापलट कराया गया और कठपुतली के तौर पर जनरल अबेदीन को राष्ट्रपति बनाया गया। कहा गया कि हबीब बुर्गिबा की मौज़ूदा सरकार नकारा है। बुर्गिबा न तो तानाशाह था, न ही किसी की कठपुतली, उसे देश लोगों ने ही चुना था। और तो और, यह वही था जिसने ट्यूनीशिया को फ्रांस के कब्जे से मुक्त कराने के लिए ऐतिहासिक भूमिका अदा की थी। वह अपने मुल्क में साम्राज्यवादी ताकतों के हितों के लिए हमेशा चुनौती बना रहा। बुर्गिबा को बेदखल करने के बाद अबेदीन ने कहा कि आर्थिक उदारीकरण के जरिए ही लोगों के हालात सुधरेंगे और फिर उसने अपने यहां तीस वर्षो से तैयार हो रही स्वदेशी शासन व्यवस्था को ही नहीं तबाह किया, बल्कि उदारीकरण के नाम पर राष्ट्रीय संपत्तियों को निजी हाथों में बेचने में भी कोई गुरेज नहीं रखा। तब से चौदह जनवरी 2011 तक बिन अली अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के इशारे पर काम करता रहा, लेकिन दूसरी ओर लोगों में भी लगातार सरकार के प्रति असंतोष भी बढ़ रहा था। पिछले सितंबर की बात है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने देश में बची-खुची सब्सिडी को खत्म करने का आदेश दिया, जिसके कारण महंगाई आसमान छूने लगी थी। फिर क्या था? त्रस्त जनता को मजबूर होकर सड़कों पर उतरना पड़ा। इस बीच मीडिया भी राजनीतिक परिवर्तन की मांग को हवा देने लगा। साथ ही, विकीलीक्स के खुलासों ने चिंगारी को हवा दी है। ट्विटर और फेसबुक सरीखे सोशल नेटवर्किग वेबसाइटों पर इस तरह की कई बहसें हुई, जिससे देश में यह जनमानस तैयार हुआ कि अब सत्ता में फेरबदल होना ही चाहिए। टेलीविजन चैनलों, खासकर अल-जजीरा की भूमिका भी इस मामले में बदलाव के मौसम को और सघन करने वाली ही रही। आधुनिक तकनीकों ने बहस-मुबाहिसों के लिए एक नया स्पेस गढ़ा है, पर इन बहस-मुबाहिसों को कौन शुरू और नियंत्रित करता है? क्या लोगों की सारी मांगें, स्वत:स्फूर्त होती हैं या उन्हें प्रेरित करने का सायास प्रयत्न किए जाते हैं? जो भी हो, ट्यूनीशिया में हुआ यों कि लोग अबेदीन के इस्तीफे की मांग करने लगे। अब तक जो ताकतें मलाई काट रही थीं, उन्हें लगा होगा कि कहीं अगर सच में यह प्रतिरोध इंकलाब बन गया और ट्यूनीशिया में जनता की सरकार बन गई तो फिर वहां उसके हितों को खतरा है। अगर यह राष्ट्रपति बदल दिया जाए तो लोगों का गुस्सा भी ठंडा हो जाएगा और उनके इशारे पर जो नए लोग शासन संभालेंगे, वह भी पहले के ही तरह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के जरिए वैश्विक पूंजी के हितों का भी ख्याल रखेंगे। दूसरी तरफ, अबेदीन को भी मालूम था कि सत्ता से हटने के बाद अगर वह ट्यूनीशिया में ही रहा तो जितनी ज्यादतियां उसने की है, उसका बदला उससे लिया जाएगा। सो, उसने अपना रास्ता नापना बेहतर समझा। इस तर्क को इससे और मजबूती मिलती है कि अबेदीन के जाने के बाद जो अंतरिम सरकार बनी, उसमें भी प्रधानमंत्री मोहम्मद गशूनी को ही बनाया गया, जो 1999 से प्रधानमंत्री रहा है। कार्यकारी राष्ट्रपति फोआद मेबाजा पिछली सरकार में संसद के अध्यक्ष थे। अंतरिम सरकार में मंत्री वगैरह भी लगभग वहीं हैं। यानी इस यास्मीनी इंकलाब से अबेदीन को तो जाना पड़ा, लेकिन व्यवस्था वही बनी रही। लोग कुछ दिनों तक रूमानियत में रहेंगे कि बहुत कुछ बदल गया, लेकिन सब कुछ पहले जैसा ही चलता रहेगा। यानी कुल मिलाकर ट्यूनीशिया में चल रहे शासन व्यवस्था में अपने आप में वही परिवर्तन लाए गए, जैसा कि एक सांप अपना केंचुल बदलकर लाता है। केंचुल बदल जाने के बाद सांप के पास अपनी पुराने मंशाओं को पूरा करने की और अधिक ताकत और ताजगी आ जाती है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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