तिब्बतियों के काग्यू संप्रदाय के धर्म प्रमुख करमापा उग्येन त्रिनले दोरजी के बौद्ध मठ में मिली अथाह विदेशी मुद्रा से यह आशंका प्रबल हो गई है कि कहीं भारत में ही तिब्बत देश का अस्तित्व कायम न हो जाए, क्योंकि इस धन का प्रयोग तिब्बती समुदाय अपनी संस्कृति के संरक्षण के नाम पर हिमाचल प्रदेश में बनाए जा रहे बौद्ध मठों के निमार्ण पर कर रहा है। दलाईलामा की निर्वासित स्थली मैक्लोडगंज को तो अभी ही लोग मिनी ल्हासा के नाम से पुकारने लगे हैं। करमापा की बौद्ध मठ पर मिली अथाह विदेशी मुद्रा भी एक भूमि खरीद के मामले को लेकर ही बेनकाब हुई है। इस खरीद को लेकर यह हवाला दिया जा रहा है कि करमापा उग्येन त्रिनले दोरजे के स्थायी निवास के लिए भूमि खरीदने के लिए प्रक्रिया जारी थी, लेकिन जिस प्रकार से तिब्बती समुदाय ने धर्मशाला के आसपास ही कहीं तांत्रिक विश्र्वविद्यालय तो कहीं बौद्ध विश्र्वविद्यालयों व बौद्ध मठों के नाम पर संपत्तियां बनाने का क्रम शुरू किया है, उससे अब आम लोगों के मन में यह धारणा भी शुरू हो गई है कि धीरे-धीरे इन क्षेत्रों में तिब्बती प्रतिष्ठानों की बढ़ती संख्या से स्थानीय लोग अल्पसंख्यक हो जाएंगे और निर्वासित तिब्बतियों की आबादी इस कदर बढ़ जाएगी कि भारत के इस हिमाचल प्रदेश में ही एक तिब्बत का निर्माण हो जाएगा। इसकी एक खास वजह यह भी मानी जा रही है कि विदेशों से आ रहे धन के बल पर यह समुदाय महंगे दामों पर भूमि खरीदने में सक्षम है। भूमाफिया भी इस समुदाय से मिल रही मोटी रकम के चलते आम लोगों की संपत्तियां खरीद कर इस समुदाय को बेच रहे हैं।
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