ट्यूनीशिया को 1957 में फ्रांस से आजादी मिली, लेकिन फ्रांस ने जाते-जाते अपने प्यादे हबीब बुर्गिबा को देश की सत्ता पर आसीन कर दिया। हबीब ने 1987 तक शासन किया। उन्हें जनरल जिने अल अबेदीन बेन अली ने सत्ता से बेदखल किया। ट्यूनीशिया की जनता ने यह सितम भी चुपचाप सह लिया। अबेदीन ने फ्रांस के इशारे पर सत्ता संभाली थी। उनके सिर पर फ्रांस के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन सहित कई शक्तिशाली पश्चिमी देशों का हाथ रहा। समय ने करवट ली और तीन सप्ताह तक चले विरोध प्रदर्शन के बाद 14 जनवरी 2011 को ट्यूनीशिया की जनता ने तानाशाह जनरल अबेदीन की सत्ता को उखाड़ फेंका। लोकतंत्र के पैरोकार अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ट्यूनीशिया के लोगों को बधाई दी। वह भूल गए कि अबेदीन के वर्षो के क्रूर शासन को समर्थन देने वालों में व्हाइट हाउस भी शामिल था। ट्यूनीशिया में तानाशाही के अंत ने मुस्लिम जगत में नया उत्साह फूंक दिया। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि बगैर सशस्त्र संघर्ष या विदेशी मदद लिए केवल सड़कों पर उतरने मात्र से तानाशाही का अंत हो सकता है। इससे पहले अरब देशों के लोग सत्ता से टकराने को पहाड़ में सिर मारने जैसा मानते थे। ट्यूनीशिया के बाद सबसे पहले यमन फिर मिस्र और जॉर्डन में प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हुआ। ट्यूनीशिया की तरह यमन, जॉर्डन और मिस्र की सरकारों को भी अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का समर्थन प्राप्त है। बराक ओबामा और हिलेरी क्लिंटन मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक पर दबाव बना रहे हैं कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हिंसक कार्रवाई न करें, लेकिन दूसरी तरफ अमेरिका मुबारक को बचाना भी चाहता है। इजराइल-फिलीस्तीन विवाद में मिस्र की अहम भूमिका है। मुबारक अमेरिकी प्यादे के तौर पर काम रहे हैं। अमेरिका को ईरान के खिलाफ अरब लीग का समर्थन दिलाने में भी मुबारक की अहम भूमिका है। अमेरिका को मुबारक जैसा वफादार दोस्त पूरे मिस्र में नहीं मिलेगा। मिस्र ही क्यों यमन, जॉर्डन की भी स्थिति ऐसी ही है। सऊदी अरब, कुवैत और ओमान से अमेरिका के रिश्ते भी किसी से छिपे नहीं हैं। अमेरिका ने कभी भी इन देशों की जनता के अधिकारों को नहीं उठाया। इसके विपरीत तानाशाहों के हाथ जरूर मजबूत किए। अमेरिकी नेता चीन, रूस, उत्तर कोरिया, म्यांमार और ईरान की सरकारों के खिलाफ मानवाधिकारों के नाम पर अभियान चलाए हुए हैं। चीन अगर सूडान के तानाशाह उमर अल बशीर को समर्थन देता है तो पश्चिमी देश उसकी अलोचना करते हैं। उनका कहना है कि चीन मानवाधिकारों को नजरअंदाज कर सूडान की तानाशाह सरकार को हथियार दे रहा है। दूसरी तरफ अमेरिका अरब देशों में तानाशाही सत्ता को वर्षो से समर्थन देता आ रहा है। अमेरिकी प्रशासन तिब्बत, ताइवान और शिनजियांग के यूघुर मुसलमानों की भी मानवाधिकारों के नाम पर पक्षधरता करता है। ऐसा नहीं है कि ईरान, चीन और उत्तर कोरिया में तानाशाही का विरोध नहीं होना चाहिए, लेकिन अमेरिका को भी मानवाधिकारों के नाम पर दोहरे मापदंड नहीं अपनाने चाहिए। ट्यूनीशिया में जो कुछ हुआ, उससे अमेरिका पर प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन जो कुछ मिस्र में हो रहा है, वह अमेरिका की पश्चिमी एशिया नीति के हित में नहीं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए व्हाइट हाउस सुर बदलता दिखाई दे रहा है। मिस्र में आई लोकतांत्रिक सूनामी ने केवल काहिरा को ही नहीं हिलाया, बल्कि अमेरिका को भी आईना दिखाया है। यह भविष्य तय करेगा कि मिस्र, यमन, जॉर्डन आदि देशों में तानाशाही खत्म होगी या नहीं, लेकिन मौजूदा प्रदर्शनों ने अमेरिका के दोहरे चरित्र को वैश्विक चर्चा का विषय जरूर बना दिया। अल्जीरिया, लीबिया, जॉर्डन, सीरिया, यमन, मोरक्को, लेबनान जैसे देशों की जनता भी मिस्र की ओर देख रही है। इन सभी देशों में तानाशाही या राजशाही है। मिस्र के आंदोलनकारी हुस्नी मुबारक के साथ अमेरिका को भी कोस रहे हैं। उनका मानना है कि मुबारक को अमेरिका के खुले समर्थन ने निरंकुश बनाया। मिस्र में हाल ही में हुए आम चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली के आरोप लगे, लेकिन अमेरिका इस संबंध में कुछ नहीं बोला। दूसरी तरफ म्यांमार चुनाव के खिलाफ उसका अभियान जगजाहिर है। अमेरिका ने म्यांमार चुनावों को मान्यता देने से मना कर दिया। खबरें आ रही हैं कि अमेरिका मिस्र के आंदोलन को समर्थन दे रहा है। इसका मतलब यह न समझा जाए कि वह मिस्र में तख्तापलट चाहता है। ऐसा करना उसकी कूटनीतिक मजबूरी है। अमेरिका उन नेताओं पर नजरें बनाए हुए है, जो मिस्र की भावी राजनीतिक व्यवस्था में कर्णधार बन सकते हैं। पश्चिमी मीडिया का एक वर्ग यह भी कह रहा है कि मिस्र में मुबारक का तख्तापलट मुस्लिम कट्टरपंथ को बढ़ावा देगा। ब्रिटेन के विदेश मंत्री विलियम हेग ने चिंता भी जाहिर कर दी है। अरब देशों पर पकड़ खो देने का डर पश्चिम जगत को सताने को लगा है। ट्यूनीशिया, यमन और मिस्र में यकायक भड़के जनाक्रोश को इस्लामिक कट्टरपंथ के विस्तार से जोड़कर देखना ठीक नहीं। इन देशों में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं, क्योंकि उनके हितों की सालों से अनदेखी हो रही है। महंगाई, बेरोजगारी, निरक्षरता तथा क्रूर शासन के खिलाफ बेबस लोगों की आवाज को ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देश पचा नहीं पा रहे हैं। अभी तक किसी भी देश में कोई एक संगठन नाम सामने नहीं आया, जिसने जनविद्रोह का श्रेय लेने का प्रयास भी किया हो। लोग स्वत: घरों से निकल रहे हैं। पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों को चाहिए कि वे हाथ बढ़ाकर जनक्रांति का स्वागत करें, लेकिन उन्हें अरब देशों की मुख्य इस्लामिक पार्टियां के अलकायदा से रिश्ते होने का डर सता रहा है। अगर मिस्र या फिर अन्य अरब देशों में तख्तापलट होता है तो वहां की भावी राजनीतिक व्यवस्था में पश्चिमी तेल कंपनियों को घाटा उठाना पड़ सकता है। लोगों का मानना है कि निजाम बदलेगा तो प्राकृतिक संपदा से हासिल होने वाली आय उनका जीवन स्तर संवारने में भी खर्च होगी।
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