Thursday, February 3, 2011

अरब में अशांति


लोकतंत्र के नाम पर उथल-पुथल पूर्वी यूरोप की पुनरावृत्ति तो नहीं?

चर्चित विचारक फरीद जकारिया अरब जगत में लोकतंत्र न होने के दो कारण बताते हैं-पहला, लोकतंत्र को संस्थागत आधार प्रदान करने के लिए उदार संविधानवाद और पूंजीवाद का अभाव और दूसरा, इनमें से कुछ देशों काट्रस्ट फंड देश होना’, जहां गरीबी नहीं, बल्कि आसानी से मिलने वाली समृद्धि ही समस्या है। जहां तक पहले का संबंध है, उन्होंने पाया कि पश्चिम को वहां लोकतंत्र के लिए शीघ्रता नहीं करनी चाहिए और दूसरे के संबंध में उन्हें लगा कि बाजार पूंजीवाद के अभाव ने लोकतंत्र के संस्थानीकरण को मुश्किल बना दिया है। पहले टूनीशिया और अब मिस्र में लोगों के हालिया स्वत:स्फूर्त विरोध के मद्देनजर जकारिया का यह आकलन अपरिपक्व लग सकता है। इस मोड़ पर कहना मुश्किल है कि यह विरोध कौन-सी दिशा लेगा और कितने समय तक चलेगा। शायद बीस वर्ष पहले पूर्वी यूरोप में जो हुआ, उसके मद्देनजर भविष्यवाणियों के बारे में सावधानी जरूरी है। हेनरी किसिंजर ने 1988 में सावधानी बरतने की सलाह देते हुए भविष्यवाणी की थी कि साम्यवाद से परिवर्तन की पूरी प्रक्रिया में 15 वर्ष लगेंगे, जबकि वास्तव में यह 24 महीनों में पूरा हो गया। हालांकि, एक चीज तो साफ है कि चूंकि हम लोकतंत्र के युग में रह रहे हैं, इसलिए गैर लोकतांत्रिक देशों के द्वीप आंखों में कांटे की तरह चुभते हैं।
टूनीशिया में 17 दिसंबर, 2010 को एक युवक ने सिडि बोउजिड शहर में बेरोजगारी और पुलिस नृशंसता के खिलाफ आत्मदाह कर लिया था। इसके खिलाफ लोगों का विरोध प्रदर्शन जब विगत 11 जनवरी को राजधानी टूनिश पहुंचा, तो राष्ट्रपति बेन अली ने उससे निपटने का आदेश सेना को देकर रात का कर्फ्यू लगा दिया। अगले दिन टूनीशिया केदूसरे शहर सफॉक्स में दसियों हजार लोग सड़कों पर उतर आए। विरोध-प्रदर्शन के पैमाने को देखकर बेन अली हतप्रभ थे और उन्होंने अगले दो वर्षों में बेरोजगार युवाओं के लिए तीन लाख नौकरियों का वायदा किया, बिना यह बताए कि कैसे। उन्होंने भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ जांच और हाल के सप्ताहों में हिरासत में लिए गए लोगों को छोड़ने का भी वायदा किया। मगर प्रदर्शनकारियों के निशाने पर तो अली और उनका पूरा ट्राबेल्सी वंश था, जिसने बीते वर्षों में बहुत से व्यावसायिक हित बना लिए थे, वह भी तब जब आम लोग गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहे थे। 14 जनवरी को बेन अली और उनका परिवार भागकर सऊदी अरब पहुंच गया। 19 जनवरी तक कई दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के फिर से खुलने पर टूनीशिया में शांति लौट आई। कांस्टिटूशन डेमोक्रेटिक रैली के प्रतिष्ठित नेता प्रधानमंत्री मोहम्मद घनौची ने घोषणा की कि वह नेशनल यूनिटी की सरकार बना सकते हैं। उन्होंने सभी प्रतिबंध हटाने, भ्रष्टाचार की जांच के लिए तीन स्वतंत्र आयोग बनाने, मानवाधिकार उल्लंघन रोकने और राजनीतिक सुधार करने, सभी राजनीतिक कैदियों को छोड़ने और छह महीनों के भीतर स्वतंत्र चुनाव की तैयारियों की घोषणा की।
टूनीशिया का असर अरब जगत के अन्य इलाकों-मिस्र, अल्जीरिया, जॉर्डन, यमन, लीबिया और सूडान तक में दिख रहा है। मिस्र 25 जनवरी से उबल रहा है। यह अरब जगत का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है। यह आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अभियान और अरब व यहूदियों के बीच शांति की खोज में अमेरिका का महत्वपूर्ण सहयोगी है। इसके 8.4 करोड़ लोगों में से ज्यादातर प्रतिदिन दो डॉलर से भी कम पर गुजारा करते हैं। इसकी बेरोजगारी दर 25 प्रतिशत है। विगत दिसबंर में वहां हुआ आम चुनाव एक धोखा था। 82 वर्षीय होस्नी मुबारक वहां 30 वर्षों से शासन कर रहे हैं। उनका बेटा जमाल अपने पिता का उत्तराधिकारी बनना चाहता है। मुख्य विपक्षी दल मुसलिम ब्रदरहुड आम चुनाव में सभी सीट हार गया था। उसके सैकड़ों सदस्य 40 वर्षों से लागू आपातकालीन कानूनों के उल्लंघन के कारण जेल में हैं। मुबारक पर भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार, पुलिस बर्बरता और सामाजिक दमन का आरोप है।
टूनीशिया की तरह मिस्र में भी सरकार ने काहिरा, अलेक्जेंड्रिया और स्वेज में रात का कर्फ्यू लगा दिया, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने आपातकालीन कानून खत्म करने, गृह मंत्री को हटाने, आम चुनाव में धांधली की व्यापक निंदा के मद्देनजर नए चुनाव की जरूरत और उच्च न्यूनतम मजदूरी जैसी मांग करके इसे चुनौती दी। लोगों ने घोषणा की है कि सितंबर 2011 में होनेवाले चुनाव में न तो मुबारक और न ही उसके बेटे को भाग लेने दिया जाएगा। इस बीच, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व पर्यवेक्षक और नोबल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद अल बरदेई विपक्ष के नेता के रूप में मिस्र लौट आए हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सुधार की पहल करने और इस जनांदोलन का समाधान अहिंसक तरीके से निकालने के लिए मुबारक पर दबाव बनाया है। दरअसल पश्चिम में डर है कि मिस्र में इसलामी सरकार का उदय कहीं 1979 के ईरान जैसी स्थिति न पैदा कर दे। यदि ऐसी स्थिति होती है, तो इसके लिए पश्चिम ही जिम्मेदार होगा। उसी ने 1950 के शुरू में ईरान में मुस्सदक के उदार लोकतांत्रिक शासन को कुचला था।
टूनीशिया और मिस्र ने दिखाया है कि कानून का राज, जवाबदेही, नागरिक अधिकार, अल्पसंख्यक हितों की सुरक्षा आदि के रूप में जो राजनीतिक सुधार दुनिया के कई अन्य हिस्सों के लागू है, वह वहां के लोगों की भी आकांक्षा है। यह तानाशाही के अंत की शुरुआत है। आज अरब विश्व उथल-पुथल के उसी चौराहे पर है, जहां पूर्वी यूरोप बीस साल पहले था।


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