Thursday, February 3, 2011

कारगिल से धर्मशाला तक


करमापा मठ की कहानी गुप्तचर एजेंसियों की नाकामी को एक बार फिर साबित कर रही है। यह सिर्फ कुछ करोड़ रुपये मिलने का मामला नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है। विदेशी करेंसी से करमापा का खजाना भरा हुआ है। मगर हमारे गुप्तचरों को इसकी भनक तक नहीं लगी। ऊना में रूटीन चेकिंग के दौरान एक कार से एक करोड़ मूल्य की करेंसी मिलने के बाद इस खजाने का सुराग लग सका। हिमाचल प्रदेश की खुफिया एजेंसी सीआईडी ने मान लिया है कि उसे इसकी भनक नहीं लग सकी। केंद्र की गुप्तचर एजेंसियां भी क्या इतनी ही साफगोई से स्वीकार कर सकेंगी अपनी यह चूक?
करमापा कह रहे हैं कि यह विदेशी करेंसी उन्हें अपने भक्तों और अनुयायियों से दान में मिली है। सफाई देते ही वह इस सवाल पर फंस गए हैं कि दान में एक सीरीज के नोट कैसे मिल सकते हैं? मान लेते हैं कि करोड़ों की विदेशी मुद्रा दान में ही आई। मनीऑर्डर से तो नहीं आई होगी। जाहिर है, वहां हजारों विदेशी आ-जा रहे होंगे। दान देने वाले उन विदेशियों की करमापा से मुलाकात का कोई रिकॉर्ड क्या हमारी सुरक्षा एजेंसियों के पास है? ऐसे में फिर कैसे यह भरोसा कर लिया जाए कि ऐसे मठों को जासूसी के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है?
देश की सुरक्षा से जुड़ी गुप्तचर एजेंसियों को इन सवालों के जवाब देने ही पड़ेंगे। इस मामले में केंद्रीय गृह और विदेश मंत्रालय की लापरवाही भी सतह पर आ गई है। गृह मंत्रालय पर आंतरिक सुरक्षा को लेकर और विदेश मंत्रालय पर नीतिगत कारणों से प्रश्नचिह्न लगा है। हिमाचल सरकार ने केंद्र को दो टूक कह दिया है कि इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लिया जाए। खासकर सीमा से लगा राज्य होने के कारण हिमाचल की अपनी चिंताएं हैं। मगर यह अकेले हिमाचल प्रदेश का नहीं, बल्कि पूरे देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा से जुड़ा सीधा सवाल है।
केवल सुरक्षा एजेंसियां ही नहीं, केंद्र और राज्य सरकारों के बाकी महकमे भी तिब्बती मसले को अकसर हलके में लेते रहे हैं। आयकर विभाग को ही ले लें। कोई भारतीय नागरिक 25 लाख की कार ले आए, तो वह आयकर विभाग के निशाने पर आ जाता है। लेकिन तिब्बती शरणार्थी बीएमडब्ल्यू, ऑडी या फिर मर्सिडीज कारों में घूम रहे हैं, तो कोई उनसे पूछने वाला नहीं है। गौर किया जाना चाहिए कि तिब्बत के पठारों से हिमालय को लांघकर भारत में हर साल तिब्बतियों का आना बदस्तूर जारी है। ये सारे लोग कुछ ले-देकर पहले नेपाल की सीमा में प्रवेश करते हैं और उसके बाद भारत की सीमा में आसानी से चले आते हैं। कितने तिब्बती या फिर चीनी नागरिक भारत में इस रास्ते से दाखिल हो रहे हैं, इसका कोई विश्वसनीय आंकड़ा हमारी सरकार के पास उपलब्ध नहीं है। हिमाचल में 33,306 तिब्बती पंजीकृत हैं। यह आंकड़ा हर साल बढ़ रहा है और संदिग्ध भी है। आखिर कितने और तिब्बतियों को अतिथि बनाएगा भारत? अपने देश के करोड़ों लोगों को दो वक्त की रोटी मुहैया कराने की गारंटी दिए बिना इस अतिथि सत्कार के आखिर क्या मायने हैं?
यह देखे बगैर कि कौन किस भेष में आ रहा है और उनके आने का असली मकसद क्या है, हम उन्हें जगह देते चले जा रहे हैं। केंद्र सरकार का अभी तक करमापा से संदेह दूर नहीं हुआ। फिर किसने कहा था करमापा को शरण देने के लिए? चीन से भागकर तिब्बतियों के दो-चार और धर्मगुरु भारत में चले आते हैं, तो क्या उन्हें भी करमापा की तरह बिना किसी हील-हुज्जत के रहने की जगह दे दी जाएगी? आखिर किसके दबाव में यह दरियादिली दिखा रही है केंद्र सरकार और क्यों? विदेश नीति के जरिये कुछ तय किया जाएगा या फिर भारत के एक बड़े हिस्से को शरणार्थी शिविर बनाने की छूट जारी रहेगी?
कारगिल में क्या हुआ? बहुत दिनों तक तो हमें पता ही नहीं चला कि पाकिस्तानी सेना और आतंकी भारतीय सीमा के भीतर घुसपैठ कर चुके हैं। कारगिल में देश ने धोखा खाया, लेकिन सबक नहीं लिया। कारगिल के फौरन बाद करमापा चीन से भागकर धर्मशाला पहुंच गए। वह कैसे यहां तक पहुंचे, हमें पता नहीं चला। हम फिर धोखा खा गए। अब 25 देशों की करेंसी कैसे उनके पास पहुंच गई, इस मामले में भी गच्चा खा गईं हमारी सुरक्षा एजेंसियां। कारगिल से धर्मशाला तक धोखा ही धोखा खा रहे हैं। आखिर कितने सतर्क हैं हम और कब तक करते रहेंगे लापरवाही?


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