आज मिस्र की जनता को जो बात सबसे नागवार गुजर रही है वह यह कि ‘आर्थिक विकास’ का लाभ मुबारक और उनसे जुड़े मुट्ठीभर परिवारों तक सीमित होकर रह गया है। आम जनों की हालत ‘माया मिली न राम’ जैसी है। अरब दुनिया में मिस्र की पहचान अमेरिका के पिछलग्गू, छुटभैये दादा जैसी रह गई है। यह बात किसी निरक्षर मिस्रवासी को भी बेहद परेशान करती है
पिछिले आठ-दस दिनों से मिस्र लगातार सुर्खियों में है। लगभग तीस साल से सत्ता की बागडोर संभाले हुस्नी मुबारक का तख्त डांवाडोल स्थिति में है। ऐसा लगता है कि इस बार अपनी कुर्सी बचाने में यह तानाशाह सफल नहीं हो पाएगा। अपने लंबे शासनकाल में इसके पहले भी मुबारक को कई बार जनता के गुस्से का सामना करना पड़ा है पर ऐसा सैलाब जो सब कुछ अपने साथ बहा ले जाए, पहले नजर नहीं आया था। हजारों की संख्या में आम लोग काहिरा और सिकन्दरा जैसे बड़े शहरों में सड़कों पर उतर आए हैं और उनकी बगावत को कुचलने के लिए सरकारी बल प्रयोग नाकाम रहा है। अपनी तरफ से मुबारक ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। प्रदर्शनकारी निहत्थी भीड़ को दहलाने के लिए लड़ाकू विमान आसमान में गरज रहे हैं और सड़कों पर टैंक तैनात हैं। विडंबना यह कि सैनिक प्रदर्शनकारियों से हाथ मिलाते उनके साथ मुस्कुराते बतियाते दिख रहे हैं जिससे संकेत मिलता है कि कम से कम आम सिपाहियों का समर्थन प्रदर्शनकारियों को प्राप्त है। यहां कुछ बातों की याद दिलाना जरूरी है। हुस्नी मुबारक की छवि सख्त कुनबापरस्त तानाशाह की रही है जो अपनी कुर्सी बचाने के लिए कभी मुस्लिम बिरादरी नामक संगठन का हौव्वा खड़ा करते रहे हैं तो कभी इस बात का ढिंढोरा पीटते रहे हैं कि उनके अलावा कोई इस्रइल को अरबों के विरुद्ध मनमाने अत्याचार से रोक नहीं सकता। एक सीमा तक यह सच भी है। राष्ट्रपति पद संभालने के पहले मुबारक मिस्र की वायुसेना में अफसर थे और आरंभ में उनकी छवि फौजी तानाशाह वाली ही थी। पर यह सोचना गलत होगा कि आज जो बगावत नजर आ रही है, वह सैनिक तानाशाही के उन्मूलन और जनतंत्र की स्थापना के लिए है। कमोबेश हालत वैसी है जैसी कई दशक पहले ईरान में शाह पहलवी के जमाने में थी। जहां तक फौज का सवाल है, मिस्र की जनता को इस तरह की हुकूमत की आदत है। राष्ट्रपिता समझे जाने वाले नासिर स्वयं सेना में कर्नल थे और उनके उत्तराधिकारी अनवर सादात सेना में जनरल। पिछले तीन दशकों में जब-जब मिस्र में चुनाव हुए हैं मुबारक लगभग शत-प्रतिशत वोट हासिल करने में कामयाब रहे हैं और इन चुनावों की प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगते रहे हैं। बहरहाल इस देश में तब तक शांति बरकरार रही जब तक आम जनता का जनजीवन इस तानाशाही से प्रभावित नहीं हुआ। शहरों में रहने वाला बुद्धिजीवी वर्ग भले ही दबी जुबान में नागरिकों के अधिकारों के हनन की शिकायत करता रहा हो पर कस्बों और गांव-देहात में रहने वालों को इससे फर्क नहीं पड़ता था। जब तक दो जून की रोटी और इससे ज्यादा कुछ मिलते रहे। आज जो बात मिस्र की जनता को सबसे नागवार गुजर रही है वह यह है कि ‘आर्थिक विकास’ का लाभ मुबारक और उनके साथ जुड़े मुट्ठीभर परिवारों तक ही सीमित होकर रह गया है। आम जनों की हालत ‘माया मिली न राम’ जैसी रही है। आज अरब दुनिया में मिस्र की पहचान अमेरिका के पिछलग्गू, छुटभैये दादा जैसी रह गई है। यह बात किसी निरक्षर मिस्रवासी को भी बेहद परेशान करती है। उसे इस बात का गहरा एहसास है कि वह हजारों साल पुरानी सभ्यता का वारिस है। यह बात भुलाई नहीं जानी चाहिए कि अमेरिका की गोद में जा बैठने का काम हुस्नी मुबारक ने नहीं साधा। कैम-डेविड समझौते के बाद मध्यपूर्व में शांति स्थापना की उपलब्धि के लिए राष्ट्रपति सादात को नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था और तभी से अमेरिका के साथ मिस्र के संबंध काफी करीबी हो गए थे। सादात की नीतियों को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त नहीं था और एक सलामी परेड के दौरान उनकी हत्या कर दी गई थी। तभी से फौजी शासक इस्लामी और जनतांत्रिक तत्वों के प्रति आशंकित रहे हैं और बड़ी क्रूरता के साथ असहमति का स्वर मुखर करने वालों का दमन करते रहे हैं। अमेरिका मिस्र में जनतंत्र और मानवाधिकारों के हनन की निरंतर अवहेलना करता रहा है। वह इसी से खुश था कि कम से कम गाजा पट्टी में अरब इस्रइली सैनिक मुठभेड़ की या सर्वनाशक विस्फोट की संभावना को मुबारक की मौजूदगी काफी हद तक कम कर चुकी है। और जब तक कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद से उसकी लड़ाई इराक और अफगानिस्तान जैसे मोर्चों पर जारी थी- उबलते मिस्र की तरफ ध्यान देने की फुर्सत उसे नहीं थी। इसी का खमियाजा अब उसे भुगतना पड़ सकता है। जहां तक मुबारक के जाने या बने रहने का सवाल है, इसे महत्वपूर्ण नहीं समझा जा सकता। आज 82-83 वर्ष की उम्र में मुबारक यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह शतायु होने तक अपने पद पर बने रहेंगे। देर-सबेर किसी न किसी को उन्हें सत्ता सौंपनी ही थी। वह इस काम के लिए अपने पुत्र को तैयार कर रहे थे पर उसमें वह कूवत नहीं दिखती। समाचार मिले हैं कि संकट के आसार नजर आते ही वह सपरिवार विदेश प्रवास के लिए कूच कर चुका है। इस घड़ी मुबारक के लिए एक और बड़ी मुसीबत है। न केवल मिस्र बल्कि अड़ोस-पड़ोस का पूरा अरब भू-भाग इस तरह के राजनीतिक भूचाल के झटकों से परेशान है। ट्यूनीशिया में जनता ने क्रांतिकारी तेवर दिखा कर सत्ता परिवर्तन को अंजाम दे दिया है। भले ही वहां अभी राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। सूडान जनमत संग्रह के बाद दक्षिण में नये राज्य के रूप में जन्म ले रहा है। यमन में लंबे समय से सब्र कर रही उत्पीड़ित जनता सड़कों पर उतर आई है। आधुनिकता और प्रगतिशीलता का दंभ पालने वाला जॉर्डन का राजवंश घबराया हुआ है। सीरिया फिलहाल शांत है पर वहां भी उत्तराधिकार का फैसला कुनबापरस्त तानाशाही की परंपरा में ही हुआ है अत: स्थिति कतई निरापद नहीं समझी जा सकती। अल्जीरिया और मोरक्को में कट्टरपंथी इस्लामी शक्तियां अरसे से सक्रिय हैं और इनके उन्मूलन का प्रयत्न करने में शासक वर्ग असफल रहा है। कुल मिलाकर मध्यपूर्व में तेल संपदा के कारण अमेरिका इसे भूराजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण समझता रहा है और इस पर कब्जा बनाए रखने के लिए इसके शासकों को कठपुतले के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। कट्टरपंथी इस्लाम की चुनौती उसके लिए बड़ा सिरदर्द रही है। इस रक्तबीज का जन्म अमेरिका के मित्र राष्ट्र सऊदी अरब में ही हुआ है और अरब इस बात को अनदेखा नहीं कर सकते कि इराक, अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक में अमेरिका का आचरण इस्लाम और अरबों के दुश्मन जैसा ही रहा है। कुल मिलाकर मिस्र का राजनीतिक भूकंप हो या अरब जगत में उत्तरी अफ्रीका में इसके डरावने झटके, इसके लिए कहीं न कहीं अमेरिकी नीतियां जिम्मेदार नजर आती है। यह सोचना तर्कसंगत है कि कुछ समय तक हालात ऐसे ही रहेंगे।
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