जनाक्रोश के लिए केवल मुबारक नहीं, अमेरिकी नीति भी जिम्मेदार
मिस्र के भविष्य के बारे में फिलहाल भले ही ठीक-ठीक कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन ऐसा जान पड़ता है कि पिछले तीन दशक से फौलादी मुट्ठी और फौजी बूट का इस्तेमाल कर विपक्ष को कुचलने वाले तानाशाह हुस्नी मुबारक के दिन अब गिने-चुने हैं। देखना सिर्फ यह है कि जाने में देर कर वह अपने देश का कितना अहित करेंगे और कितनी मौत का कलंक अपने माथे पर लगवाएंगे। इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मिस्र में देर-सवेर जो सत्ता परिवर्तन होगा, उसका अफ्रीका, अरब जगत और शेष विश्व पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
मिस्र अब वह देश नहीं, जिसकी यादें आम भारतीय अपने मन में बड़े स्नेह से संजोए है। बेशक उसके साथ हमारे संबंध लगातार दोस्ताना रहे हैं, पर जो राष्ट्र गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत का भागीदार था, जिसके तेवर समाजवादी और स्वाभिमानी राष्ट्रवादी थे, वह अब सिर्फ इतिहास के पृष्ठों में ही बचा है। एक जमाने में मिस्र की साख अंतरराष्ट्रीय रंगमंच पर थी। नासिर ने न केवल स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण किया था, बल्कि उसके बाद हुए हमले में साम्राज्यवादियों के दांत खट्टे कर दिए थे। जब मिस्र ने आस्वान बांध का निर्माण किया, तो अरबों का माथा गर्व से ऊंचा हो गया था। हजारों साल पहले बने पिरामिड इस बात के गवाह हैं कि मिस्र की संस्कृति प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। औपनिवेशिक काल में मिस्र पर फ्रांसीसी और ब्रिटिश प्रभाव पड़ा और इसीलिए वह शेष अरब दुनिया से, सिर्फ फलस्तीन के अपवाद को छोड़कर, कहीं अधिक आधुनिक और पश्चिमी तौर-तरीकों वाला रहा है। जब तक मिस्र की जनता का नासिर से मोहभंग नहीं हुआ था, तब तक नासिर ने अपनी प्रगतिशील छवि का लाभ उठाते हुए कभी सीरिया के साथ महासंघ बनाकर, कभी लीबिया को प्रेरणा देकर या फिर पूरे अरब जगत को एक छतरी के नीचे संगठित कर अरब एकता को बढ़ावा देने का ही काम किया। बाद में राष्ट्रपति सादात ने जब मध्य पूर्व में इस्राइल के साथ शांति स्थापना का प्रयास किया, तभी से उन पर आरोप लगाया जाता रहा कि अमेरिकियों का पिट्ठू बनकर उन्होंने राष्ट्रहित को स्वार्थ की वेदी पर कुरबान कर दिए हैं। इसके बदले में उन्हें नोबल पुरस्कार मिला, और अपनी जान भी गंवानी पड़ी।
मिस्र की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हुस्नी मुबारक के शासनकाल में ही जन्मा और वयस्क हुआ है। वहां आज स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि वहां का आम नागरिक मुबारक को हटाने के लिए जान पर खेलकर सड़कों पर उतरने को मजबूर हो गया है। नारों में मुबारक को अमेरिकी दलाल कहा जा रहा है। आपातकाल जैसी इस स्थिति से वहां का पर्यटन उद्योग अस्त-व्यस्त हो चुका है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी इसका दुखद प्रभाव पड़ता है। मिस्र बड़ा कपास उत्पादक देश है और स्वेज नहर के जरिये होनेवाला नौकायन भी उसके लिए महत्वपूर्ण है।
सवाल यह है कि वहां अचानक इस आंदोलन का विस्फोट कैसे हुआ? क्या इसके पीछे कट्टरपंथी इसलामी बिरादरी का हाथ है? लेबनान में हिजबुल्ला की सक्रियता मिस्र को लंबे समय से आशंकित करती रही है। अल्जीरिया, मोरक्को और जॉर्डन में भी कट्टरपंथी इसलाम का प्रभाव बढ़ता रहा है। मुबारक गद्दी बचाने और अमेरिका से मदद पाने के लिए निरंतर यह दलील देते रहे हैं कि देश में सांप्रदायिक उन्माद का जानलेवा प्रसार रोकने में अकेले वही कामयाब हो सकते हैं।
दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि मौजूदा हालत के लिए कुटिल अमेरिकी रणनीति जिम्मेदार है। चूंकि अमेरिकी प्रशासन समझ चुका है कि भ्रष्ट और कुनबापरस्त हुस्नी मुबारक अब ज्यादा दिन सत्ता में नहीं रह सकते, इसलिए उन्हें अपदस्थ करना जरूरी हो गया है। इससे पहले कि यह काम अप्रत्याशित घटनाक्रम से हो, अमेरिका ने इस नाटक का निर्देशन अपने हाथ में ले लिया है। अमेरिका के करीबी समझे जाने वाले और परमाणु आयोग से जुड़े मिस्र के वैज्ञानिक नोबेल पुरस्कार विजेता डॉक्टर अल बरदेई अचानक मिस्र में प्रकट हो गए हैं। उन्होंने बड़ी मासूमियत के साथ कहा है कि यदि देश की जनता उन्हें कार्यवाहक या अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में काम करने की जिम्मेदारी सौंपेगी, तो वह कतराएंगे नहीं! यानी कुछ-कुछ हाल वैसा ही है, जैसा इराक और अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन के वक्त दिखाई दे रहा था। यह तो तय है कि मिस्र में अमेरिका अपनी पसंद के नेता की ताजपोशी की कोशिश करेगा। पर कौन भूल सकता है कि अमेरिका का यह मनसूबा इराक और अफगानिस्तान की तबाही का सबब बना है? संभव है मिस्र में भी वैसी ही त्रासदी देखने को मिले, जैसा ईरान में रजा शाह पहलवी के बाद वाले घटनाक्रम से सामने आया था। तब अयातुल्ला खुमैनी भले ही ईरानी जनता के लिए मुक्तिदाता के रूप में प्रकट हुए हों, पर अमेरिका के लिए तो वह दानव ही सिद्ध हुए।
मगरमिस्र को विनाश के कगार तक पहुंचाने के जिम्मेदार अकेले हुस्नी मुबारक नहीं हैं। मध्य पूर्व के तेल पर नाजायज कब्जा बनाए रखने की अमेरिकी नीतियों के कारण भी यह स्थिति आई है। मिस्र हो या हमारा पड़ोसी पाकिस्तान-फौजी तानाशाह तभी तक निरापद रह सकते हैं, जब तक उनकी पीठ पर अमेरिकी वरदहस्त हो। अमेरिका की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि फिलहाल पूरा उत्तर अफ्रीका ही उफन रहा है। सूडान और टूनिशिया का घटनाक्रम मिस्र के संकट को बेहद जटिल बना रहा है। मुबारक की विदाई के बावजूद वहां तानाशाही के खात्मे और लोकतंत्र के आगाज की संभावना नहीं जताई जा सकती। इन तमाम बातों को ध्यान में रखकर ही भारत को मिस्र में अपने हित का आकलन करना होगा।
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