मिस्त्र में सड़कों पर उतरे सियासी सैलाब के बीच भारत फिलहाल हवा का रुख भांपने में लगा है। काइरो के हालात पर नई दिल्ली सरगर्मियां बढ़ गई हैं। जहां पुराने दोस्त राष्ट्रपति होस्नी मुबारक से रिश्तों का लिहाज है, वहीं भविष्य पर छाया अनिश्चय भी शामिल है। जानकार मानते हैं कि इससे दोनों देशों के रिश्तों पर बहुत असर नहीं पड़ेगा और आने वाली नई सरकार भी नई दिल्ली के साथ रिश्ता बनाकर ही चलेगी। मिस्त्र को लेकर भारत की अति सतर्कता और संयम को जानकार काफी हद तक जायज करार देते हैं। मिस्त्र में भारत के राजदूत रहे आरएस राठौर कहते हैं कि काइरो के राजनीतिक हालात इस समय काफी अनिश्चित हैं और कोई नहीं जानता की हालात का ऊंट किस करवट बैठेगा। लिहाजा संयम के साथ स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार फिलहाल सबसे अच्छा कूटनीतिक विकल्प है। राठौर मानते हैं कि होस्नी मुबारक भारत के तीन दशक पुराने दोस्त रहे हैं और ऐसे में नई दिल्ली का उनके खिलाफ तल्ख बयानी से परहेज लाजिमी है। साथ ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन के इस पुराने साथी से उसके रिश्ते काफी मधुर रहे हैं और भारत ने 1995 में मुबारक को अंतरराष्ट्रीय समझ के लिए जवाहरलाल नेहरू सम्मान से भी नवाजा था। भारत ने मिस्त्र के हालात पर आई अपनी पहली प्रतिक्रिया में इसे सुधार के लिए जनता की महत्वाकांक्षा करार दिया। विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने विरोध प्रदर्शनों को मिस्त्र का अंदरूनी मामला बताते हुए उम्मीद जताई कि कोई ऐसा समाधान निकल आएगा जो विरोध कर रहे लोगों को भी स्वीकार होगा। विदेश मंत्रालय के अनुसार मिस्त्र के हालात पर भारत लगातार नजर बनाए हुए है। विशेषज्ञों के अनुसार जाहिर तौर पर भारत की नजर मिस्त्र में लंबे समय से प्रतिबंधित संगठन अखवानुल मुस्लमीन या मुस्लिम ब्रदरहूड पर भी होगी जो पर्दे के पीछे मिस्त्र के विरोध प्रदर्शनों और विपक्ष की रीढ़ है। इंडिया इस्लामिक सेंटर के सलाहकार और अरब मामलों के जानकार वदूद साजिद कहते हैं कि आने वाले दिनों में मुस्लिम ब्रदरहूड की भूमिका खासी महत्वपूर्ण होगी।
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