Thursday, February 3, 2011

अरब देशों में जनक्रांति का आधा मकसद पूरा


अरब देशों में जारी सत्ताविरोधी आंदोलन को नौ दिन पूरे हो चुके हैं। मिस्र, यमन और जॉर्डन में हो रहे प्रदर्शनों ने तानाशाहों के सिंहासन हिलाकर रख दिए हैं, लेकिन क्या सिर्फ इतना ही पर्याप्त है? कम से कम मिस्र की जनता तो इतने से संतुष्ट नहीं। वह तो पूर्ण परिवर्तन चाहती है। मिस्र और यमन में 9वें दिन के घटनाक्रम बेहद खास रहे। बुधवार को मिस्र और यमन के राष्ट्रपतियों ने मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद सत्ता त्यागने का वादा किया। मिस्र की सेना ने प्रदर्शनकारियों से घरों की ओर लौटने की अपील कर संकेत दे दिया कि उसने अभी सारे पत्ते नहीं खोले हैं। दूसरी तरफ अमेरिका ने पहली बार एहसास कराया कि पश्चिम एशिया में उपस्थिति बनाए रखने के लिए उसके तरकश में कई तीर बाकी हैं। मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक, यमन के राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह और जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला द्वितीय अमेरिका के लिए बेहद अहम हैं। मंगलवार को इजराइल ने मुबारक का साथ छोड़ने के लिए अमेरिका की आलोचना की। इजराइल को अकेला पड़ने से बचाने के लिए मुबारक को बचाना जरूरी है तो सालेह यमन में आतंकवाद के विरुद्ध अमेरिका के सहयोगी हैं। अमेरिकी सरकार ने मुबारक से अगला चुनाव नहीं लड़ने की अपील की। ओबामा से वार्ता के बाद मुबारक ने ऐसा ही किया। मुबारक की राह पर चलते हुए यमनी राष्ट्रपति ने भी 2013 के बाद सत्ता त्यागने की घोषणा कर दी। इससे पहले जॉर्डन के किंग ने प्रदर्शन तेज होने से पहले ही कैबिनेट बर्खास्त कर दी। इन उपायों से यमन व जॉर्डन में जनविद्रोह का तूफान थमता दिख रहा है। मिस्र में स्थिति अलग है। वहां मुबारक की घोषणा पर जनता का रुख सामने आना बाकी है। बुधवार को प्रदर्शनकारियों और मुबारक समर्थकों के संघर्ष से तो साफ है कि जनता सितंबर तक इंतजार नहीं करेगी, लेकिन अमेरिका कुछ भी करके उन्हें सितंबर तक सत्ता पर बनाए रखने का हरसंभव प्रयास करेगा। ट्यूनीशिया तो अमेरिका के लिए महत्वहीन था, लेकिन इनमें से किसी को देश छोड़ भागना पड़ा तो बाकी अरब देशों में भी विद्रोह पनप सकता है। अमेरिका की वैश्विक कूटनीति रसातल में चली जाएगी। यही कारण है कि अमेरिका संतुलन बनाकर चल रहा है। वह चाहता है कि उसे कुछ समय मिले, जिससे भावी सहयोगी तलाश कर सके। यही कारण रहा कि मिस्र की सेना ने मुबारक की सत्ता त्यागने की घोषणा के बाद तेवर बदले। इससे पहले मिस्र के सैनिक जनता के साथ प्रदर्शन कर रहे थे। खबरें आ रही हैं कि सैकड़ों सैनिक प्रदर्शनकारियों में शामिल हो गए हैं। इससे यह साफ है कि मिस्र के प्रदर्शनकारियों के लिए आगे की ही राह आसान नहीं है। उनके लिए सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि मिस्र में विपक्ष बहुत सक्षम नहीं है। इसके बावजूद जनता ने केवल जज्बे के बूते परिवर्तन का आधा सफर तय कर लिया है। बुधवार को यमन और मिस्र के राष्ट्रपतियों की ओर से सत्ता त्यागने की घोषणाएं इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।


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